शव क़ब्रों से क्यों निकाल रहे हैं लोग?

ग्रीस के थेस्सालोनिकी के मुख्य क़ब्रिस्तान में कैटरिना कित्सियाव अपने पिता की समाधि के पास खड़ी हैं. वो अपने पिता क्रिस्टोडोलस का शव क़ब्र से बाहर निकालते देखने आई हैं.

क्रिस्टोडोल्स को सात साल पहले दफ़न किया गया था, लेकिन उनके बच्चों के पास समाधि के लिए देने को पैसे नहीं हैं.

केटरिना कहती हैं, "हमने चार साल तक इसके लिए पैसे दिए, लेकिन अब हमारे पास पैसे नहीं हैं." यह उनके लिए दुखद है.

दरअसल ग्रीस के शहरी क़ब्रिस्तानों में क़ब्रों की भरमार हो गई है. वहां आमतौर पर शव तीन साल के लिए दफ़न किए जाते हैं. उसके बाद उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है.

इसके लिए परिवार वालों को ही पैसे देने होते हैं. यही नहीं, क़ब्र से निकाली गई अस्थियों को विशेष रूप से बने मकान में रखने के पैसे देने पड़ते हैं. इन मकानों को 'ओसरी' कहते हैं. लेकिन बहुत से लोग इसके लिए पैसे चुकाने की स्थिति में नहीं हैं.

पिछले 50 साल में ग्रीस की शहरी आबादी में ज़बर्दस्त बढ़ोतरी हुई है और देश की आधी से ज़्यादा आबादी मात्र दो शहरों एथेंस और थेस्सालोनिकी में आकर बस गई है.

दूसरी तरफ़, शहरों के विकास ने क़ब्रिस्तानों के विस्तार के सभी रास्ते बंद कर दिए हैं. यही वजह है कि वहां आमतौर पर क़ब्रों को तीन साल के लिए किराए पर दिया जाता है. इसके बाद उपयोग करने पर किराया वसूला जाता है. यह अतिरिक्त किराया इसलिए वसूला जाता है ताकि लोग जल्दी क़ब्रों को खाली करा लें और उनका दोबारा इस्तेमाल हो सके.

2006 में ग्रीस में श्मशान बनाने के लिए एक क़ानून पास किया गया था लेकिन कट्टरपंथी चर्चों ने इसका ज़ोरदार विरोध किया और अब क़रीब 10 साल बाद भी वहां एक भी श्मशान नहीं है.

दूसरी तरफ़ ज़्यादातर यूरोपीय देशों में क़ब्रिस्तानों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए क्रिमेटोरियम भी बनवाए गए हैं. अब ब्रिटेन और डेनमार्क जैसे देशों में तो 75 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों को क़ब्र में दफ़नाने के बजाय उन्हें जलाया जाता है.

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