सिरीज़ न हुई तो क़यामत न आएगी: पाक मीडिया

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भारत और पाकिस्तान के रिश्ते अलग-अलग विषयों के साथ पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में लगातार चर्चा का विषय बने हैं.

रोज़नामा ‘जंग’ ने दोनों देशों के बीच क्रिकेट सिरीज़ कराने की कोशिशों पर संपादकीय लिखा है- पाक-भारत क्रिकेट सिरीज़, आक्रामता की बजाय अमन की खिड़की.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने पाक-भारत क्रिकेट सीरिज़ श्रीलंका के न्यूट्रल ग्राउंड पर कराने की अनुमति दे दी है लेकिन ये सिरीज़ श्रीलंका में हो पाएगी या नहीं, इसका अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.

अख़बार लिखता है कि अगर भारत श्रीलंका में भी पाकिस्तान के साथ खेलने को तैयार नहीं होता तो फिर पाकिस्तान को हालात का जायज़ा लेकर ही कोई फ़ैसला करना होगा.

अख़बार को उम्मीद है कि भारत आक्रामता की बजाय संयम और अमन की खिड़की खुली रखेगा.

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रोज़नामा ‘दुनिया’ लिखता है कि यह बात सही है कि भारत के साथ सिरीज़ खेलने से पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को राजस्व मिलेगा, पर यह नहीं कहा जा सकता कि इससे दोनों देशों के रिश्ते बेहतर होंगे.

अख़बार ने पाकिस्तानी गृहमंत्री निसार अली ख़ान के इस बयान का भी ज़िक्र किया है कि 'हम भारत से सिरीज़ खेलने के लिए क्यों मरे जा रहे हैं जबकि दूसरे पक्ष की तरफ़ से वायदे के बावजूद नख़रे किए जा रहे हैं.'

अख़बार के मुताबिक़ ये सिरीज़ न हुई तो कोई क़यामत नहीं आ जाएगी.

'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि भारत के साथ जिस तरह क्रिकेट सिरीज़ खेलने को बेताबी दिखाई जा रही है, उससे पाकिस्तान की कमज़ोरी का संकेत मिलता है.

'एक्सप्रेस' ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने और परमाणु आपूर्ति समूह एनएसजी में शामिल होने की भारत की कोशिशों पर नाख़ुशी जताई है.

अख़बार लिखता है कि भारत और अमरीका के रिश्ते लगातार मज़बूत हो रहे हैं इसलिए भारत को उम्मीद बंधी है कि वैश्विक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अमरीका उसका समर्थन करेगा.

लेकिन इस पर अख़बार की टिप्पणी है कि पाकिस्तान एक नहीं, कई बार अपनी चिंता जता चुका है कि अगर भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह या फिर सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनता है तो इससे क्षेत्र में शक्ति संतुलन बिगड़ेगा और पाकिस्तान के लिए नई मुश्किलें पैदा होंगी.

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रोज़नामा ‘इंसाफ़’ ने पाकिस्तान में आम ज़रूरतों की कई चीज़ों समेत कुल 313 वस्तुओं पर रेग्युलेटरी ड्यूटी बढ़ाने की योजना पर संपादकीय लिखा है- जनता का ख़ून और निचोड़ने की तैयारी.

अख़बार लिखता है कि सब्ज़ी, दही, डबल रोटी और किसी हद तक मक्खन भी जनता की ज़रूरतें हैं. ड्यूटी बढ़ाने से उन पर असर पड़ेगा जबकि दूध तो पहले ही महँगा है जिसके दाम घटाने की तमाम कोशिशें बेकार गईं.

अख़बार के मुताबिक़ दालों की क़ीमतें पहले ही आसमान छू रही हैं और सरकार जनता को निचोड़कर 40 अरब रुपए का बजट घाटा पूरा करने की धुन में है.

रुख़ भारत का करें तो 'सियासी तक़दीर' ने लिखा है कि पहली बार संविधान दिवस मनाया गया लेकिन जिस तरह गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संविधान में 'सेक्युलर' शब्द को लेकर सवाल उठाया, उससे ज़ाहिर होता है कि पूरे आयोजन का मक़सद संविधान की सर्वोच्चता क़ायम रखना नहीं बल्कि इसे विवादास्पद बनाना है.

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अख़बार के मुताबिक़ कांग्रेस अध्यक्ष ने सही कहा कि संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले संविधान दिवस मना रहे हैं.

अख़बार की टिप्पणी है कि 'सेक्युलर' शब्द को लेकर राजनाथ सिंह ने जो कुछ कहा उसमें आरएसएस की सोच ही झलकती है.

अख़बार के मुताबिक़ गृहमंत्री ने 42वें संविधान संशोधन को निशाना बनाते हुए कहा कि 'सेक्युलरिज़्म' और 'सोशलिज़्म' जैसे शब्द बाद में संविधान में जोड़े गए.

'राष्ट्रीय सहारा' ने 'नीतीश कुमार का राष्ट्रीय क़द' शीर्षक से लिखा है कि बिहार के चुनावी नतीजों के बाद नीतीश कुमार को पूरे देश में लोकप्रियता हासिल हुई है.

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अख़बार कहता है कि नीतीश कुमार की कायमाबी ने राष्ट्रीय सतह पर एक बहस भी छेड़ी है कि क्या उन्हें 2019 के चुनावों की कमान सौंपी जाए. वैसे भी भाजपा ने नीतीश को मोदी के मुक़ाबले खड़ा कर ही दिया है और नतीजा सबके सामने है.

‘रोज़नामा ख़बरें’ ने बिहार में शराबबंदी लागू करने के नीतीश सरकार के फ़ैसले की तारीफ़ की है.

अख़बार लिखता है कि बीते 67 बरसों में गांव-गांव में भले नल न मिले और पीने का पानी एक-एक किलोमीटर दूर से लाना पड़े लेकिन ठेके जगह-जगह मिलेंगे.

अख़बार की टिप्पणी है कि नीतीश कुमार ने अन्य राज्यों को भी रास्ता दिखाया है कि वो भी हिम्मत करके समाज के इस कोढ़ को जड़ से मिटाएं.

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