विकसित देश ग्रीनहाउस गैसों में ज़्यादा कमी लाएँ: मोदी

  • 30 नवंबर 2015

पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर अहम सम्मेलन में जहाँ फ़्रांस, चीन और अमरीका ने आम सहमति बनने की संभावना जताई है, वहीं भारत ने स्पष्ट कहा है कि ग़रीब देशों के मुकाबले में अमीर देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में ज़्यादा कमी लाएँ.

ग़रीब देशों को डर है कि पेरिस के जलवायु सम्मेलन में समझौते की प्रक्रिया में कहीं उनके हितों की बलि न चढ़ जाए.

पेरिस में हो रहे सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन को लेकर पूरी दुनिया के लिए एक समझौते पर सहमति क़ायम करने का प्रयास हो रहा है.

इस सम्मेलन में 147 देश अपना-अपना पक्ष रख रहे हैं. लेकिन सबसे ग़रीब देशों का कहना है कि उन्हें डर है कि इस समझौते के लिए उन पर दबाव डाला जा सकता है.

इस सम्मेलन में ज़्यादातर बातचीत इस मुद्दे पर होगी कि दुनिया के तापमान में वृद्धि को औद्योगिकरण से पहले के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस ऊपर की सीमा में रखा जाए.

दुनिया के 180 देशों का आकलन इस सम्मेलन में रखा जाना है और अगर इन्हें मान लिया गया तो दुनिया के तापमान में वृद्धि लगभग 3 डिग्री सेल्सियस से आसपास होगी.

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लेकिन 48 कम विकसित या पिछड़े देशों के समूह (एलडीसी) का कहना है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा वृद्धि वाला कोई भी समझौता उनके लिए विनाशकारी साबित होगा, क्योंकि लक्ष्य अगर कम होगा तो विकसित देशों को अपने कार्बन उत्सर्जन में ज़्यादा कटौती करनी होगी.

वो ये भी कहते हैं कि इससे पिछड़े देशों को कार्बन उत्सर्जन पर मिलने वाली छूट ज़्यादा बड़ी होगी.

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Image caption जलवायु सम्मेलन के समर्थन में चमकता एफ़िल टावर

एलडीसी के नेता और अंगोला के गिज़ा गस्पर मार्टिन्स का कहना है, "अगर दुनिया 2 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य रखकर भी चलती है, तो ग़रीब देशों के लिए आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण तंत्र और उनके निवासियों का जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा."

इस सम्मेलन की अध्यक्षता करने वाले फ़्रांस के विदेश मंत्री लॉरैं फ़ाबियू ने कहा है, "दुनिया को जिस चीज़ की ज़रूरत है, उसके लिए यह सम्मेलन एक अहम मोड़ साबित होगा."

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