पाकिस्तान मीडिया के बुरे दिन आए?

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पाकिस्तान में मीडिया पर सेंसरशिप का पुराना इतिहास है लेकिन हाल के समय में देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों पर हथियारबंद हमले दिखाते हैं कि धौंस दे कर-धमकाकर सेंसर थोपने की कोशिश हो रही है.

बीते 27 नवम्बर को डॉन मीडिया समूह की एक डिज़िटल सैटेलाइट न्यूज गैदरिंग (डीएसएनजी) वैन पर हथियारबंद हमला हुआ. इसके एक दिन पहले डॉन अख़बार ने अफ़ग़ान प्रांत खोस्त में एक पाकिस्तानी चरमपंथी के मारे जाने की ख़बर प्रकाशित की थी.

इस साल तीन डीएसएनजी वैनों पर हमले हो चुके हैं. यह हमले इसलिए अहम हैं क्योंकि हिंसक हमलों के बावजूद डॉन मीडिया ग्रुप ने अभी तक 'सेल्फ़ सेंसरशिप' को लागू नहीं किया है.

इन हमलों का सबसे अधिक शिकार जियो टीवी और जंग ग्रुप हुए हैं. 19 अप्रैल 2014 को इसके प्रमुख टीवी एंकर हामिद मीर को गोली मारी गई थी.

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उनके भाई आमिर मीर खुद जंग/जियो मीडिया ग्रुप के पत्रकार हैं. उन्होंने खुलेआम आरोप लगाया कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई उनके भाई की हत्या की साजिश रच रही थी.

हालांकि इस हत्या के लिए किसी ने आरोप नहीं लगाए लेकिन पत्रकार यूनियनों ने विरोध प्रदर्शन कर इस मामले की जांच और मीडिया पर हमले बंद करने की मांग की.

वैसे केंद्रीय सूचना मंत्री परवेज रशीद निंदा करने में ज़्यादा मुखर दिखे और उन्होंने इस हमले को ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला’ कहा.

डॉन ने खोस्त में अफ़ग़ान तालिबान से जुड़े ग्रुप अल बद्र के ट्रेनिंग कैंप पर अमरीकी ड्रोन हमले में पाकिस्तानी चरमपंथी की मौत की ख़बर छापी थी.

परोक्ष रूप से यह ख़बर उस आरोप का समर्थन करती है जिसके अनुसार पाकिस्तानी चरमपंथी अफ़ग़ानिस्तान में सरकारी बलों और नाटों सैनिकों से लड़ रहे हैं.

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जिस दिन कराची में इस मीडिया समूह की वैन पर हमला हुआ उस दिन अख़बार के मुख्य सम्पादकीय में कहा गया था, “लेकिन खोस्त में ड्रोन हमले ने कुछ असहज कर देने वाली यादों और सवालों को खड़ा कर दिया है.”

इस हमले के बाद दो स्तंभकारों को हटाया गया और 'डेली टाइम्स' अख़बार के सम्पादक का इस्तीफ़ा लिया गया.

मीर मोहम्मद अली तालपुर बलूचिस्तान मामले पर कॉलम लिखते थे जबकि फ्लोरिडा में रहने वाले पाकिस्तानी डॉक्टर मोहम्मद ताक़ी पाकिस्तानी सेना के धुर आलोचक हैं.

तालपुर ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा, “आज मुझे जानकारी दी गई कि उन्हें मेरे लेख की अब ज़रूरत नहीं रही क्योंकि इनकी पड़ताल हो रही है....दूसरे शब्दों में ये प्रशासन को मंजूर नहीं है.”

मोहम्मद ताकी ने ट्वीट किया, “सेना के दबाव में डेली टाइम्स के साथ छह सालों का जुड़ाव ख़त्म हुआ.”

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लेकिन राशिद हरमान के इस्तीफ़े की कोई चर्चा नहीं हुई. पाकिस्तानी मीडिया की ख़बरें देने वाली वेबसाइट 'जर्नलिज़्म पाकिस्तान' में इस बारे में एक लाइन दी गई थी.

हालांकि नई दिल्ली में इंडियन एक्स्प्रेस ने इस पर एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया.

अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तानी चरमपंथियों की मौजूदगी ही वो विषय था जिसकी वजह से मोहम्मद ताकी का लिखना बंद हुआ.

26 नवंबर को लिखे अपने लेख में ताकी ने अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तानी जिहादियों को घुसाने के पीछे पाकिस्तानी सेना का हाथ होने की ओर इशारा किया था.

पाकिस्तान में मीडिया पर सेना का परोक्ष रूप से सेंसरशिप थोपना एक पुरानी सच्चाई है.

11 साल का जनरल जिया-उल-हक़ का शासन अप्रिय ख़बरों को दबाने के लिए दिशा निर्देश जारी किया करता था और जिन लोगों ने उनकी बातें नहीं मानी उनके ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई भी हुई.

हालांकि मौजूदा 'सेंसरशिप' का एक अहम पहलू ये है कि यह एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई ऐसी सरकार के राज में हो रहा है, जो इसे रोकने में असहाय दिखती है.

दूसरी बात ये है कि जिया-उल-हक़ के शासन में जहां मीडिया संस्थाएं प्रतिरोध के लिए तैयार रहती थीं, आज के समय में मीडिया समूहों और पत्रकारों में वो रुचि नहीं दिखाई देती.

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