'पाकिस्तान और मुसलमानों पर ही इल्ज़ाम क्यों'

  • 6 दिसंबर 2015
इमेज कॉपीरइट AP
Image caption सैन बर्नारडिनो में पुलिस की कार्रवाई में दोनों हमलावर तशफ़ीन मलिक और सैयद रिज़वान फ़ारूक़ मारे गए.

अमरीकी राज्य कैलिफोर्निया में सैन बर्नारडिनो में हुई गोलीबारी में 14 लोगों की मौत की घटना का कई पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों ने अलग-अलग कोणों से विश्लेषण किया है.

'रोज़नामा एक्सप्रेस' लिखता है कि अमरीका में होने वाले इस हमले से पता चलता है कि दहशतगर्दी की जंग अब एशिया से निकल कर यूरोप और अमरीका तक तेज़ी से फैल रही है और आने वाले दिनों में विकसित देशों को और चरमपंथी घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है.

इस सिलसिले में पेरिस हमलों का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि जिन विकसित देशों को अब तक सुरक्षित समझा जाता था, वो भी असुरक्षित हो रहे हैं.

अख़बार लिखता है कि पश्चिमी देशों के पास आधुनिक हथियार, तकनीक और प्रशिक्षित सैनिक हैं, लेकिन जब तक दहशतगर्दी को बढ़ावा देने वाले कारण मौजूद बने रहेंगे, इसका ख़ात्मा मुमकिन नहीं है.

इमेज कॉपीरइट EPA
Image caption ओबामा अमरीका में 'गन कल्चर' को नियंत्रित करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता है

'रोज़नामा पाकिस्तान' ने लिखा है कि अमरीका में होने वाली वारदात की कड़ी निंदा होनी चाहिए क्योंकि किसी को भी दूसरे लोगों का ख़ून बहाने का लाइसेंस नहीं दिया जा सकता.

लेकिन अख़बार की ये भी टिप्पणी है कि अमरीका अक्सर दहशतगर्दी के अड्डे पाकिस्तान में होने के आरोप लगाता है, लेकिन अब उसके एक अहम राज्य में हमले के बाद क्या ये नहीं कहना चाहिए अमरीका में भी दहशतगर्दी के अड्डे हैं?

अख़बार लिखता है कि अगर अमरीका जैसे विकसित देश में ऐसी घटनाएं हो सकती हैं तो फिर पाकिस्तान पर ही इल्ज़ाम क्यों?

वहीं 'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि अमरीका और यूरोप में इस तरह गोलीबारी की घटनाएं होती रही हैं जिनमें दर्जनों लोग ग़ैर-मुस्लिम सनकी लोगों का निशाना बने हैं.

अख़बार लिखता है कि कभी ऐसी घटनाओं को धर्म से नहीं जोड़ा गया लेकिन जब ऐसी घटना में किसी मुसलमान का नाम आता है तो फिर मुसलमानों पर दोषारोपण होने लगता है.

Image caption पेरिस में इस्लामिक स्टेट के हमलों में 130 लोग मारे गए थे

अख़बार का कहना है कि पेरिस हमलों के बाद फ्रांस में रहने वाले मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है.

उधर पेरिस में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों की बैठक पर रोज़नामा 'वक़्त' ने लिखा है कि मुलाक़ात के लिए नरेंद्र मोदी ख़ुद चल कर नवाज़ शरीफ के पास आए जिस पर सबको हैरानी हुई.

अख़बार लिखता है कि प्रधानमंत्री मोदी का ख़ुद चल कर आना, एक ही सोफ़े पर बैठ कर सरगोशियां करना और मुस्कराहट बिखेरना सकारात्मक माहौल का संकेत देता है, लेकिन भारत की हठधर्मिता और आक्रामक रवैये में तब्दीली आना आसान नहीं है.

अख़बार की टिप्पणी है कि भारत इस बात को समझे कि उसकी मौजूदा नीतियां उपमहाद्वीप में शांति नहीं, बल्कि जंग को दावत दे रही हैं और जंग से मसले सुझलते नहीं, बल्कि उलझते हैं.

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption हाल के महीनों में लाखों की तादात में प्रवासी यूरोप पहुंचे हैं

उधर 'औसाफ़' ने हाल में ग्रीस से 49 ग़ैरकानूनी प्रवासियों को पाकिस्तान डिपोर्ट किए जाने पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार लिखता है कि 19 लोगों की पहचान पाकिस्तानी नागिरक के तौर पर हुई तो उन्हें उतारकर बाक़ी 30 को उसी विमान से वापस ग्रीस भेज दिया गया क्योंकि उनकी नागरिकता की पहचान नहीं हो पाई.

अख़बार ने प्रवासियों को वापस भेजने के सरकार के फ़ैसले को एक दिलेर फ़ैसला बताया है.

रूख़ भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' का संपादकीय है- गुजरात में बीजेपी को झटका. अख़बार कहता है कि बिहार के बाद बीजेपी को गुजरात स्थानीय निकाय चुनावों में ज़ोर का झटका लगा है.

इमेज कॉपीरइट

अख़बार की टिप्पणी है कि शहरी इलाक़ों के नगर निगमों में बीजेपी ने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया, लेकिन देहाती इलाकों में जिस तरह कांग्रेस ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है, उससे राज्य में बीजेपी के लिए ख़तरे की घंटी बज गई है.

पीएम मोदी के चुनाव क्षेत्र रहे मेहसाणा में भी बीजेपी की हार का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि मोदी की चमक फीकी पड़ने लगी है.

अख़बार के मुताबिक 2017 में राज्य विधानसभा के चुनाव से पहले ये आख़िरी बड़ा चुनाव था.

'हमारा समाज' ने चेन्नई में भारी बारिश और बाढ़ के हालात पर संपादकीय लिखा है. अख़बार लिखता है कि अब भी हज़ारों लोग अपने मकानों में सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP

अख़बार के मुताबिक ये अच्छी बात है कि लोगों को दवाओं की जरूरत नहीं है, लेकिन राहत कार्यों में इज़ाफ़ा करें ताकि फंसे लोगों को जल्द से जल्द निकाला जा सके.

वहीं 'रोजनामा खबरें' ने चेन्नई की स्थिति को बयान करते हुए लिखता है कि भारत के संदर्भ में देखें तो जिन जगहों पर विकास के कार्य ज़्यादा हुए हैं, वहीं प्राकृति आपदाएं ज़्यादा आई हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार