ऐसा देश जहां मौज मस्ती ही जीने की राह है

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दुनिया के हर कोने में लोग मौज मस्ती करते हैं लेकिन थाईलैंड में लोगों ने इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लिया है.

हर संस्कृति में मौज मस्ती यानी फ़न का अपना अंदाज़ होता है. थाई भाषा में इसे 'सानुक' कहते हैं और यह दूसरी संस्कृतियों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सार्थक दिखता है.

बैंकॉक की किसी भी गली से लेकर ऑफ़िस तक में आपको सहज भाव में मौज मस्ती करते लोग नज़र आएंगे. इसमें हमेशा सामाजिक सद्भाव का पुट ज़ाहिर होता है.

अमरीकी मानव विज्ञानी विलियम क्लाउज़नर थाईलैंड में दशकों से रह रहे हैं. विलियम कहते हैं, "सानुक का अनुवाद फ़न भी न्यायसंगत नहीं है. फ़न शब्द में थाई संस्कृति का मौलिक अंदाज़ नहीं आ पाता है."

यहां आने वाले लोगों को सानुक की ख़ासियत का अंदाज़ा सोंगकर्ण में, नए साल के सालाना उत्सव में होता है. यह 13 से 15 अप्रैल को आयोजित होता है और इसे दुनिया का सबसे बड़ी वाटर फ़ाइट भी कहते हैं.

सोंगकर्ण की गलियों में बच्चों से लेकर बड़े बुज़ुर्ग तक हर कोई किसी को पानी में भिगोते नज़र आता है, कुछ-कुछ भारत में होली के त्योहार की तरह.

इसे बौद्धों का त्योहार माना जाता है लेकिन यह थाईलैंड का सबसे महत्वपूर्ण अवकाश होता है. एशिया का कोई भी शहर सोंगकर्ण को उस अंदाज़ में सेलीब्रेट नहीं करता है, जिस अंदाज़ में थाईलैंड के लोग करते हैं.

थाईलैंड के नामचीन आर्किटेक्ट सुमेट जुमसाई कहते हैं, "अगर सानुक नहीं हो तो कुछ भी करने का मतलब नहीं है. यहां अगर मज़ा न हो तो, लोग अच्छी नौकरियों को भी छोड़ देते हैं."

दरअसल दुनिया के दूसरे हिस्सों के लोगों को यक़ीन नहीं होगा, लेकिन थाईलैंड के लोगों के लिए मौज मस्ती कोई विकल्प भर का मसला नहीं है.

थाईलैंड के दफ़्तरों में आपको लोग उस अंदाज़ में काम करते नज़र आएंगे जैसे वे लोग आपस में मज़ाक़ मस्ती कर रहे हों, बावजूद इसके काम पूरा हो जाता है.

वैसे तो अमरीकी समाज भी मौज मस्ती के कंसेप्ट को महत्व देता है. इसलिए बिग फ़न , डिज्नी वर्ल्ड और बर्थ डे पार्टियों के चलन की शुरुआत वहीं हुई.

लेकिन जुमसाई कहते हैं, "अमरीकी अपने फ़न को बहुत गंभीरता से लेते हैं जबकि हम थार्ई नहीं लेते. हम ख़ूब काम और ख़ूब मौज मस्ती के विचार से सहमत नहीं हैं. हम दिन भर मौज मस्ती करते रहते हैं."

इसके बारे में विस्तार से पूछने पर जुमसाई कहते हैं, "हम दिन भर मुस्कुराते रहते हैं, हंसते रहते हैं. अमरीका में ऐसा नहीं होता."

कल्चर एंड कस्टम्स ऑफ़ थाईलैंड में आर्ने किस्लेंको ने लिखा है, "जीवन के मुश्किल वक़्त में सानुक भावनात्मक मरहम का काम करता है."

थाईलैंड को द लैंड ऑफ़ स्माइल्स भी कहते हैं. थाई लोगों की मुस्कान कहीं ज़्यादा कांप्लैक्स है. उनकी मुस्कान में दुख हो या सुख, वह कहीं ज़्यादा उभरता है. थाई लोग अंतिम संस्कार के वक़्त भी मुस्कुराते हुए मिल सकते हैं.

थाईलैंड के लोगों की इस जीवनशैली को आप धर्म से जोड़कर देख सकते हैं. सानुक एक बौद्धिक दर्शन है जो सब कुछ की नश्वरता और वर्तमान पल को जीने के दर्शन में यक़ीन करता है.

सानुक के दर्शन को लोग चिंता मत करो, कोई समस्या नहीं, कभी चिंता नहीं करो के भाव से लेते है, वो भी साकारात्मक नज़रिए से. चिंता मत करो, ये वक़्त भी गुज़र जाएगा.

जीवन के इस दर्शन से सद्भाव का बोध होता है, आदमी टकरावों से बचता है और जीवन की क्षणभंगुरता को समझने लगता है.

हालांकि इस नज़रिए से थाईलैंड में कारोबार करने वाले पश्चिमी लोगों को मुश्किल होती है. उन्हे लगता है कि हर कोई जब मौज मस्ती में लगा होगा तो काम का नुक़सान होगा.

लेकिन थाई लोग इस मौज मस्ती के अंदाज़ को अपनी उत्पादकता से जोड़कर देखते हैं. वे तनाव नहीं पालते, आक्रामक नज़रिया नहीं अपनाते हैं. वहां कोई शराबी से भी नहीं उलझता. लोग उसकी उपेक्षा करते है, झगड़ते नहीं.

पश्चिमी संस्कृति में जहां काम पर सीधा ध्यान ज़्यादा होता है, वहीं थाई संस्कृति में काम करने की प्रक्रिया तय कर ली जाती है और फिर अप्रत्यक्ष तरीके से भी काम होता रहता है.

इस सबके बावजूद सभी थाई लोग हमेशा ख़ुश नहीं होते. मौज मस्ती कठिन मेहनत और बदलाव का विकल्प नहीं है. लेकिन ये भी सही है कि थाई लोग कहीं ज़्यादा सहज अंदाज़ में अपना जीवन यापन करते हैं, हंसते मुस्कुराते, सुख दुख को एकसमान भाव से झेलते हैं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.

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