आख़िर पृथ्वी कितनी गर्म हो जाएगी?

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दुनिया भर के नेताओं ने पेरिस में बढ़ते तापमान पर चिंता जताई है. हकीकत ये भी है कि दुनिया भर में तापमान लगातार बढ़ रहा है.

नवंबर, 2015 को ब्रिटेन के इतिहास का सबसे गर्म नवंबर माना जा रहा है. इसके तुरंत बाद ही विश्व मौसम विभाग संस्था की ओर से ख़बर आई कि 2015 दुनिया का सबसे गर्म साल साबित हो सकता है.

दुनिया भर का तापमान ओद्यौगिक क्रांति के समय से एक डिग्री सेल्सियस ज़्यादा हो गया है. दुनिया भर के नेताओं ने 2009 में दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी पर सहमति जताई थी, लेकिन उसके आधे आंकड़े तक तो हम अभी पहुँच चुके हैं.

दुनिया भर में तापमान बढ़ रहा है लेकिन इससे पृथ्वी पर क्या असर हो रहा है?

जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिए नया मसला नही है. पृथ्वी के 4.6 अरब सालों के इतिहास में इसका तापमान अनगिनत बार बदला है.

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लेकिन इन बदलावों के बाद भी पृथ्वी समान तापमान रेंज में आ जाती रही है. क्योंकि तापमान नियंत्रण का इसका अपना तरीका है.

इसका सबसे अहम कारण है ग्रीन हाउस इफैक्ट. ग्रीन हाउस गैस यानी कार्बन डायक्साइड, मीथेन और जलवाष्प मिलकर पृथ्वी के बाहर एक ऊनी कंबल जैसा बनाते हैं.

ग्रीन हाउस इफैक्ट के बिना पृथ्वी का औसत तापमान -18 डिग्री सेल्सियस होता और पृथ्वी बर्फ से ढकी होती. यहां जीवन भी नहीं होता.

पृथ्वी पर मनुष्यों का अस्तित्व बहुत पुराना नहीं है लेकिन हमने पृथ्वी के जलवायु को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है. जीवाश्म ईंधन को जलाने और पेड़ पौधों को काटने से हम वायुमंडल में ज़्यादा से ज़्यादा कार्बन डायक्साइड का स्तर बढ़ा रहे हैं, इससे तापमान बढ़ रहा है.

2000 से 2010 के बीच कार्बन उत्सर्जन की हमारी दर पिछले दशक की तुलना में चार गुना बढ़ चुकी है. ऐसे में निकट भविष्य में पृथ्वी का क्या होगा?

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इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल के आधार पर पृथ्वी के जलवायु के बारे में अंदाजा लगाना शुरू किया है. इसका आकलन जटिल जरूर है लेकिन यह सामान्य भौतिक विज्ञान पर आधारित है जो वायु और जल की प्रकृति पर निर्भर कर रही है.

मानव निर्मित बदलावों और प्राकृतिक बदलावों के आधार पर इन मॉडलों ने जलवायु परिवर्तन के अंदाज़े का पता लगाना शुरू किया है.

इन आकलनों को इंटरगर्वनमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज़ (आईपीसीसी) ने रिपोर्ट के तौर पर 2013-14 में प्रकाशित किया. इसके मुताबिक अगर अगले 50 सालों तक मौजूदा दर से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता रहा तो दुनिया का तापमान कम से कम 4 डिग्री सेल्सियस तो बढ़ेगा ही.

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इसके मुताबिक 2200 तक ओद्यौगिक दौर शुरू होने से पहले की तुलना में दुनिया का तापमान 7 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. इसके बाद तापमान स्थिर हो जाएगा, यदि तब तक मनुष्य ने कार्बन गैसों का उत्सर्जन बंद कर दिया.

लेकिन इस पर यकीन नहीं किया जा सकता क्योंकि पृथ्वी का जलवायु बेहद जटिल मसला है. पर्यावरण की चिंता करने वालों के लिहाज से तापमान और भी बढ़ने की संभावना है.

इस तर्क के आधार पर बर्फ़ पिघलेगी और सूर्य की गर्मी से जल वाष्प बनेगा और ग्रीन हाउस इफैक्ट के चलते तापमान और बढ़ेगा.

वैसे पृथ्वी का क्या होगा, इसको लेकर अतीत के अनुभव को देखा जा सकता है.

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करीब 5.5 करोड़ साल पहले पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ा था. तब ध्रुवीय इलाकों में समुद्र तल का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस था, जो आज -2 डिग्री सेल्सियस ही है. तब ध्रुवीय इलाके में कोई बर्फ़ नहीं थी. कुछ प्रजातियां गर्मी की वजह से बेहतर तरीके से बढ़ीं लेकिन कुछ अन्य ख़त्म हो गईं.

लेकिन मीथेन गैस के बड़े पैमाने पर वायुमंडल से बाहर जाने के बाद ग्रीन हाउस इफैक्ट का प्रभाव शुरू हुआ. हालांकि मीथेन गैस बाहर कैसे गई यह स्पष्ट नहीं है.

धूमकेतू के टकराने या ज्वालामुखीय विस्फोट से ऐसा हो सकता है. ये भी साफ है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने से समुद्रतल के नीचे की मीथेन गैस अस्थिर हो जाती है.

उस दौर की तुलना आज से हो सकती है. अगर अब मौजूद सभी जीवाश्म ईंधनों को जला दिया जाए, तो उतनी ही गर्मी पैदा हो सकती है जो उस दौर में थी. इन गैसों की बदलौत कम से कम 5 और अधिक से अधिक 8 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ सकता है.

लेकिन क्या पृथ्वी इससे भी ज़्यादा गर्म हो सकती है. हमें ये भी मालूम है कि पृथ्वी के गर्म होने से ज़्यादा ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित होती है. सैद्धांतिक तौर पर ऐसा होने पर पृथ्वी का तापमान सैकड़ों डिग्री बढ़ सकता है.

लेकिन यह पृथ्वी के साथ कभी नहीं हुआ, अगर ऐसा होता तो यहां जीवन ही नहीं होता. लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसा पृथ्वी की बगल वाले ग्रह शुक्र पर तीन से चार अरब साल पहले हो चुका है.

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शुक्र सूर्य से पृथ्वी की तुलना में ज़्यादा नज़दीक है. तो वह पहले से गर्म रहा होगा. उसकी सतह पर तापमान इतना ज़्यादा हो गया कि ग्रह का पूरा जल वाष्प बनकर उड़ गया. इसके बाद कार्बन डायक्साइड को स्टोर करने का तरीका नहीं रहा.

इससे ग्रीन हाउस की स्थिति ख़राब हो गई. शुक्र ग्रह के वायुमंडल में 96 फ़ीसदी कार्बन डायक्साइड ही रह गई है. ग्रह का अब तापमान 462 डिग्री सेल्सियस हो चुका है. इस गर्मी से शीशा भी पिघल सकता है. शुक्र सोलर सिस्टम का सबसे गर्म ग्रह बन चुका है. बुध से भी गर्म.

माना जा रहा है कि पृथ्वी की स्थिति भी अगले कुछ अरब सालों में ऐसी ही होने वाली है.

सूर्य की उम्र भी बढ़ रही है और उसका ईंधन ख़त्म हो रहा है. पृथ्वी की सतह पर भी कार्बन डायक्साइड की मात्रा काफी बढ़ने वाली है. क्योंकि पानी ही नहीं बचेगा.

लेकिन यह अरबों सालों में होगा. सवाल यह है कि क्या मनुष्य उससे पहले ही ग्रीन हाउस इफैक्ट को बेतहाशा तेज़ी से बढ़ाकर ऐसा कर सकता है?

यह अध्ययन 2013 में प्रकाशित हुआ था और इसके मुताबिक यह संभव भी है. अभी हम वायुमंडल में 400 पार्ट्स पर मिलियन की दर से कार्बन गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं. बेकाबू ग्रीन हाउस इफैक्ट को अंजाम देने के लिए मनुष्य को कार्बन गैसों का स्तर 30 हजार पार्ट्स पर मिलियन करना होगा.

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यह मात्रा कितनी है, इसका अंदाजा लगाना हो तो, तो हम सारे जीवाश्म ईंधन को जला दें तो उससे उत्पन्न होने वाली कार्बन डायक्साइड की मात्रा से ये दस गुना है.

लेकिन यहां यह भी समझना होगा कि तापमान थोड़ा भी बढ़ने पर पृथ्वी पर इसका असर दिखने लगेगा. कैलिफोर्निया की डेथ वैली में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है. यह ख़तरनाक स्तर है लेकिन देखभाल से इसमें जीवन संभव है.

इंसान के शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस होता है.

ग्लोबल तापमान 7 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से दुनिया के कुछ हिस्सों में रहना वाकेई मुश्किल हो जाएगा और तापमान 12 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से पृथ्वी का आधा हिस्सा रहने लायक नहीं रहेगा.

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हालांकि कुछ लोग बड़े एयरकंडीशनर उपकरण लगाकर जीवन के उपयुक्त हालात बनाने की बात कर सकते हैं लेकिन एक तो यह बहुत महंगा होगा और दूसरे इसके लिए लोगों को हफ़्तों महीनों तक इन इमारतों के अंदर ही रहना होगा.

वैसे ऐसी सूरत ना भी हो तो भी मौजूदा हालात के मुताबिक पृथ्वी का तापमान इस शताब्दी के अंत तक 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. इससे मानव समुदाय सीधे प्रभावित नहीं भी हो तब भी जीवन कष्टदायक हो जाएगा.

20 हज़ार साल पहले, पृथ्वी का तापमान अब से 4 डिग्री सेल्सियस कम था. उस वक्त कनाडा, उत्तरी यूरोप और ब्रिटिश द्वीप समूह सबके सब बर्फ़ से ढके हुए थे.

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तब से अब तक 4 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा है और यह यूरोप और उत्तरी अमरीका की बर्फ़ की चादर को हटाने के लिए काफ़ी साबित हुआ. बर्फ़ के पिघलने से समुद्र के जल का स्तर 10 मीटर बढ़ा है और कई समुद्रतटीय इलाके डूब गए हैं.

इस पर विचार करते हुए अगर आप तापमान में चार डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी की कल्पना करेंगे तो उन परिस्थितियों में आसपास की दुनिया का सहज अंदाज़ा हो जाएगा.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.

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