होनहार छात्रा थी गोलीबारी करने वाली

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अमरीका के कैलिफोर्निया के सैन बर्नारडिनो में गोलीबारी की घटना को अंज़ाम देने वाली तशफीन मलिक एक पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी की छात्रा थी, लेकिन यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने तशफीन मलिक के बारे में कोई भी सूचना देने से इंकार कर दिया है.

सैन बर्नारडिनो में गोलीबारी के बाद 29 साल की तशफीन मलिक और उनके 28 साल के पति रिज़वान फारूक़ पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे.

सैन बर्नारडिनो में गोलीबारी के दौरान 14 लोग मारे गए थे और 21 लोग घायल हुए थे.

बीबीसी ने यूनिवर्सिटी में उनको जानने वालों से बात की है.

तशफीन मलिक ने बहाउद्दीन ज़कारिया यूनिवर्सिटी में 2007 से 2012 तक फार्मेसी की पढ़ाई की थी. यह यूनिवर्सिटी पाकिस्तान के मुल्तान में स्थित है.

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यूनिवर्सिटी प्रशासन ने तशफीन के मामले में चुप्पी बनाए रखी है.

पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने यूनिवर्सिटी से जुड़े उनके सारे दस्तावेज़ अपने कब्जे में ले लिए हैं.

पत्रकारों को कैंपस के अंदर उनके प्रोफेसरों और क्लास के सहपाठियों से बात करने से मना कर दिया गया है.

यूनिवर्सिटी के एक प्रवक्ता ने कहा कि तशफीन के बारे में कुछ भी खास नहीं था.

प्रोफेसर ग़ुलाम शब्बीर ने पत्रकारों से कहा, "वो एक आम छात्र थी. हम अब भी उनके बारे में जानकारी जुटा रहे हैं."

लेकिन यूनिवर्सिटी के बाहर बीबीसी उन्हें जानने वालों से बात करने में कामयाब हो गया.

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प्रोफेसर निसार हसनैन शाह ने उन्हें क्लास की एक होनहार छात्र बताया. उन्होंने कहा, "वो बहुत तेज और मेहनती थी."

उनके साथ क्लास में पढ़ने वाले फरहान सिद्दीकी ने उन्हें 'एक चमकता सितारा' बताया.

उन्होंने कहा, "वे वाकई में अपने पढ़ाई पर ध्यान देती थी और क्लास की एक होनहार छात्र थी."

दूसरे छात्र मलिक की कॉपी की नकल किया करते थे.

यूनिवर्सिटी के कैंटीन में छात्र नोट्स की फोटोकॉपी कराने के लिए इकट्ठे हुए थे. हमें वहां अब भी तशफीन के क्लास नोट्स फोटोकॉपी होते हुए दिखे.

मानव शरीर के अंगों को डायग्राम की मदद से दिखाते उनकी एक नोट्स की शुरुआत अल्लाह की तारीफ के साथ हुई थी.

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Image caption 29 वर्षीय तशफीन मलिक और उनके 28 वर्षीय पति रिज़वान फारूक़ शिकागो के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर.

उस पर लिखा है, "अल्लाह में यक़ीन पहाड़ को छोटा नहीं बना देगा लेकिन उस पर चढ़ना जरूर आसान कर देगा. अल्लाह से कम वज़न के लिए प्रार्थना मत कीजिए बल्कि मजबूत पीठ देने को कहिए. "

यह उनके ख़ुदा में यकीन को दिखाता है लेकिन यह नहीं बताता कि कब या कैसे वे चरमपंथ की ओर मुड़ीं.

उनके एक सहपाठी का पहचान छुपाने की शर्त के साथ कहना है कि तशफीन कैंपस होस्टल में शुरुआत के दो सालों में रही थीं.

उन्होंने बताया, "वे मरियम हॉल की ब्लाइंड विंग में रहती थीं, लेकिन 2009 में कैंपस छोड़कर मुल्तान के अपने घर में रहने चली गईं."

रिपोर्टों के मुताबिक़ मलिक ने मुल्तान में अल-हुदा अंतरराष्ट्रीय वेल्फेयर फाउंडेशन की ओर से महिलाओं के लिए चलाए जा रहे हाई-प्रोफाइल मजहबी संस्थान से जुड़ी रही हैं.

फाउंडेशन का चरमपंथियों से कोई जुड़ाव नहीं है लेकिन अतिवादी सोच को बढ़ावा देने लिए उसकी आलोचना होती रही है.

Image caption तशफीन के सहपाठी तलाल शहीर ने बताया कि उनके दोस्त सदमे में हैं.

मलिक के एक सहपाठी ने कहा कि वे वहां लेक्चर और क्लास करने गई थीं, लेकिन कुछ ही हफ़्तों में जाना छोड़ दिया था.

सिद्दीकी ने बताया कि तशफीन मलिक अक्सर अपने महिला सहपाठियों के साथ रहती थीं.

उन्होंने बताया, "वे पुरुष सहपाठियों के साथ बातचीत करती थीं लेकिन ज़्यादातर वक्त उनसे दूर रहती थीं."

उन्होंने एक ही क्लास में पांच साल तक रहते हुए और कभी-कभी मलिक से बातचीत करते हुए भी कभी उनका चेहरा नहीं देखा था "क्योंकि वे नक़ाब पहने हुए रहती थीं."

उनके एक दूसरे सहपाठी तलाल शहीर ने बताया कि वे अपने सहपाठियों से फ़ोन और फ़ेसबुक पर संपर्क में रहती थीं.

उनका फेसबुक अकाउंट उनके पुकार के नाम से था. उनका अकाउंट 2012 में यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद कुछ समय के लिए बंद पड़ा था.

तलाल शहीर ने बताया कि उनके दोस्त सदमे में हैं.

उन्होंने कहा, "वे अपने आप को लो प्रोफाइल रख रहे हैं क्योंकि वे डरे हुए हैं और पत्रकारों से बात नहीं करना चाहते हैं."

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