अमरीकी शहर जहां बहुमत में हैं मुसलमान

  • 12 दिसंबर 2015
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अमरीका में एक तरफ़ तो इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ इन दिनों कुछ लोग ज़हर उगल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ एक शहर ऐसा है जहां स्थानीय नगर परिषद चुनावों के बाद मुसलमान बहुमत में आ गए हैं.

ये है मिशिगन राज्य का हैमट्रैमिक शहर, जहां कभी पोलिश कैथोलिक समुदाय बहुमत में था लेकिन पिछले दो दशकों में उनकी आबादी अब मुश्किल से 10 प्रतिशत रह गई है.

इस शहर के हर गली मोहल्ले में अब इस्लाम का असर दिखता है.

बुर्क़े और हिजाब में लिपटी महिलाएं, स्कूल के बाद मस्जिद में क़ुरान की तालीम ले रहे बच्चे, शहर की मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर दी जानेवाली पांच बार की अज़ान, अरबी और बांग्ला में लिखे दुकानों के साइनबोर्ड और हलाल खाना परोसने वाले रेस्तरां हर जगह नज़र आते हैं.

साथ ही दिखती है पोलिश संस्कृति की भी छाप. शहर के बीचोंबीच पोप की मूर्ति है, गिरजाघर हैं, दीवारों पर पोलैंड की परंपरागत तस्वीरें हैं, शराबखाने हैं, साल में एक बार निकलने वाला रंगबिरंगा पोलिश परेड भी है.

लेकिन कुछ लोगों को अब ये चिंता भी है कि इस्लाम इस शहर की पोलिश विरासत को ख़त्म कर देगा और स्थानीय चुनावों में मुसलमान बहुमत की जीत के बाद यह चिंता और बढ़ी है.

उनमें से कुछ का कहना है कि अब सड़कों के नाम इस्लामिक देशों के नेताओं के नाम पर किए जा सकते हैं और दूसरी इस्लामी परंपराएं शहर पर लादी जा सकती हैं.

जिस उम्मीदवार की जीत से परिषद में मुसलमान बहुमत में आए हैं उनका नाम है साद अलमासमारी. यमन से कुछ ही साल पहले अमरीका आकर बसे अलमासमारी का कहना है कि लोगों का डर निरर्थक है.

उनका कहना है कि उनके ज़्यादातर वोटर मुसलमान ज़रूर थे पर वह पूरे शहर के प्रतिनिधि की तरह काम करेंगे.

वह कहते हैं, "अगर कोई मेरे पास मदद मांगने आता है तो मैं यह नहीं पूछूंगा कि उसका मज़हब क्या है. मैं तो सिर्फ़ यह पूछूंगा कि क्या आप इस शहर के नागरिक हैं? उसके बाद मैं उसकी समस्याओं के बारे में बातचीत शुरू कर दूंगा."

शहर में सबसे बड़े मतभेद की जड़ है यहां की मस्जिदों से दिन के पांच बार गूंजने वाली अज़ान. सामाजिक कार्यकर्ता सूज़न डन इस शहर में बरसों से रह रही हैं और लाउडस्पीकर्स से होने वाली अज़ान के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती रहती हैं.

उनका कहना है कि उनके इलाक़े में अज़ान की आवाज़ काफ़ी ऊंची है.

वह कहती हैं, "मैं अपने घर के अंदर होती हूँ, खिड़कियां बंद होती हैं, टीवी चल रहा होता है, तब भी अचानक अज़ान की आवाज़ घर के अंदर पहुँचने लगती है. यह मुझे पसंद नहीं है."

इस शहर में 2004 में काफ़ी विवाद और झगड़े के बाद एक मस्जिद को अज़ान देने की क़ानूनी मंज़ूरी मिली थी. उसके बाद से शहर में कई मस्जिद हैं और सभी को अज़ान देने की आज़ादी है.

अल इस्लाह इस्लामिक सेंटर, जिसे सबसे पहले यह मंज़ूरी मिली, अब बगल की ज़मीन खरीदकर वहां एक मीनार भी बना रहा है, जहां से अज़ान दी जाएगी.

मस्जिद के सेक्रेटरी मसूद ख़ान कहते हैं कि पांचों अज़ान का वक़्त मिलाकर भी देखें, तो मुश्किल से दिन के 15 मिनट बनते हैं.

वह कहते हैं, "वे लोग शिकायत करते हैं कि उनके सुकून में हम ख़लल डालते हैं. चर्च की घंटियां भी तो ख़ूब शोर करती हैं? हम तो कभी शिकायत नहीं करते."

शहर के ज़्यादातर मुसलमान यमन, बांग्लादेश और बॉस्निया से हैं और एक दूसरे की भाषा न समझ पाने से उनका आपस में मेलजोल भी कम है. यही वजह है कि सबने अपनी अलग मस्जिदें भी बना रखी हैं.

शहर में मकानों की क़ीमत काफ़ी कम है और स्थानीय जानकार कहते हैं कि बाहर से आए लोगों के लिए यह बड़ी वजह रही है यहां आकर बसने की.

पचास के दशक में कार उद्योग की वजह से फलने-फूलने वाला ये इलाक़ा इन दिनों आर्थिक रूप से चरमराया हुआ है. यहां की सभी बड़ी फ़ैक्ट्रियां बंद हैं. लोग या तो शहर से बाहर जाते हैं काम करने या फिर दुकानें और रेस्तरां चलाते हैं.

कुछ इस्लामी संस्थाओं ने शहर के बीचोबीच बंद पड़ी बड़ी-बड़ी दुकानों की ज़मीन ख़रीद ली है.

शहर की मेयर कैरेन मायोस्की का कहना है कि मुसलमानों की बढ़ती संख्या से उन्हें कोई परेशानी नहीं क्योंकि शहर की आबादी में उतार-चढ़ाव कोई नई बात नहीं है.

उनका कहना है कि पोलिश लोगों से पहले यहां जर्मनी से आए लोग बहुमत में थे. अब मुसलमान बहुमत में हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए

लेकिन उनकी चिंता कारोबारी इलाक़ों में मस्जिदों की बढ़ती संख्या से है.

कहती हैं, "मैंने इन इलाक़ों में गिरजाघरों को भी जगह नहीं दी थी. अब जैसे-जैसे यहां धार्मिक संस्थाएं बढ़ेंगी, शहर की दिक़्क़तें बढ़ेंगी. मैं शहर के आर्थिक विकास के लिए यहां और ज़्यादा रेस्तरां और मनोरंजन की जगह खोलना चाहती हूं. अब यह संभव नहीं हो पाएगा."

राज्य के नियमों के अनुसार धार्मिक जगहों के आधे किलोमीटर के अंदर तक शराबखाने खोलने पर रोक लगाई जा सकती है और मायोस्की का कहना है कि ऐसे में रेस्तरां नहीं चल सकते.

देखें तो इस शहर में मुसलमान और ग़ैर-मुसलमान बरसों से साथ रहते आए हैं. कई बार बेमन से ही सही पर एक ही हवा में सांस लेते रहे हैं.

बांग्लादेश से बरसों पहले यहां आए मंज़ूर अहमद कहते हैं कि वो न्यूयॉर्क छोड़कर यहां आए क्योंकि यहां मुसलमान बनकर रहना आसान है. यहां वो स्थानीय मस्जिद में मुअज़्ज़िन का काम करते हैं.

कहते हैं, "मेरी बीवी और बच्चियां इस्लामी लिबास में रहती हैं और यहां कोई सवाल नहीं करता. स्कूलों में भी हलाल खाना दिया जाता है."

अमरीका में इन दिनों इस्लाम सुर्खियों में है. किसी भी चरमपंथी हमले के बाद बहस और तीखी हो जाती है.

ऐसे माहौल में और ख़ासकर चुनावी साल में इस शहर की हवा क्या रुख लेगी, इसे बहुत से लोग ग़ौर से देख रहे होंगे.

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