ब्लॉग: बाड़ क्या लगी, जीवन ही बाड़ हो गया

गुलाम हुसैन

जब विभाजन हुआ तो गुलाम हुसैन शायद दो साल का था. मां की मौत हो चुकी थी और पिता ने पाकिस्तान जाने का फ़ैसला कर लिया था.

मगर ये सोचकर कि रास्ते की मार-काट का कुछ पता नहीं, उसने नन्हें गुलाम हुसैन की उंगली अपने बड़े भाई को पकड़ाई और ख़ुद सीमा पार कर शेखुपुरा के एक गांव माजूचक में बस गया. यहाँ शादी की, बच्चे हुए और 1982 में उसकी मौत हो गई.

इन बच्चों में से एक का नाम मोहम्मद इस्लाम था. इस्लाम को ये तो मालूम था कि राजौरी में उसका बड़ा भाई गुलाम हुसैन रहता है, मगर किससे पूछे?

लगभग 18 बरस पहले राजौरी से एक मेहमान आया और उसने बताया कि वो गुलाम हुसैन को जानता है. मेहमान ने उसे अपना फोन नंबर भी दिया और उसे गुलाम हुसैन के पाकिस्तानी भाइयों और बहनों ने बहुत सारी तस्वीरें भी दीं. बाद में कई बार फोन किया, लेकिन कॉल मिलने से पहले ही कट जाती.

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जब मोहम्मद इस्लाम दुबई में नौकरी करने गया तो उसकी एक बार राजौरी में बड़े भाई गुलाम हुसैन से बात हो ही गई. पिछले हफ्ते गुलाम हुसैन को पाकिस्तान का वीज़ा मिल गया और 68 साल बाद उसकी अपने पाकिस्तानी बहन भाइयों से पहली मुलाक़ात हो ही गई.

वीज़ा महीने भर का है और गुलाम हुसैन की उम्र 70 बरस. उसे यकीन नहीं कि दोबारा अपने बहन भाइयों से कभी मिल सकेगा, लिहाजा घर वापसी से पहले ही उदास-उदास सा रहता है.

राजस्थान से सटे पाकिस्तानी ज़िले थरपारकर की छाछरो तहसील में सुमरहाड़ नाम का एक गांव जाने कब से आबाद है. दिक्कत इतनी सी है कि सुमरहाड़ के दो पाड़े भारत में और दो पाकिस्तान में रह गए हैं और गांव का कुआं नो मैन्स लैंड में हैं.

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जब तक लोहे की बाड़ नहीं थी, तब तक सुमरहाड़ वाले एक-दूसरे के खुशी और गम में शरीक हो जाया करते थे और कुएं से पानी भी भरते थे. लेकिन जब से बाड़ क्या लगी, जीवन ही बाड़ हो गया.

नई पीढ़ी तो एक-दूसरे को ठीक तरह से जानती भी नहीं. 1990 के बाद सुमरहाड़ के 3-4 लोग भारत गए ताकि अपनी शादीशुदा बेटियों से मिल सकें, जिन्हें वे रोज बाड़ के इस तरफ से देखा करते थे.

पता है ये तीन-चार लोग भारत कैसे पहुँचे?

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पहले उन्हें इस्लामाबाद जाकर वीज़ा लेना पड़ा, फिर वाघा चेकपोस्ट से गुजरकर दिल्ली जाना पड़ा. फिर दिल्ली से बाड़मेर और फिर गाँव. यानी तीन हज़ार किलोमीटर चलकर वे अपने ही गांव के दूसरे हिस्से में पहुँचे जो एक-दूसरे से लगभग 800 गज की दूरी पर थे. अब दोनों हिस्सों को सीमा से और पीछे हटा दिया गया है, लेकिन आज भी कुआं नो मैन्स लैंड में पड़ा है.

सुमरहाड़ वाले कहते हैं कि पानी खींचने वाले बैल को कुएं का एक चक्कर पूरा करने के लिए आधा भारत से और आधा पाकिस्तान से होकर गुजरना पड़ता था. अब न वो बैल रहे और न कुएं में पानी.

बस एक गोल सी भुरभुरी सी मुंडेर बची है दोहरी बाड़ के बीच.

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