पाक सेना पीठ भले थपथपाए लेकिन हमले नहीं रुके

पेशावर हमला, प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट EPA

पाकिस्तान दिसम्बर 2014 को पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में हुए हमले की वर्षगांठ मना रहा है.

ऐसे में पाकिस्तान के अख़बार न केवल उन लोगों को याद कर रहे हैं जिन्होंने इस हमले में जान गंवा दी बल्कि उसके बाद चरमपंथ को क़ाबू करने के लिए उठाए गए क़दमों की समीक्षा भी कर रहे हैं.

इस हमले में 140 लोग मारे गए थे जिनमें अधिकांश बच्चे थे. इस हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तानी तालिबान ने ली थी.

इस घटना से पूरे देश में ग़ुस्से की एक लहर दौड़ गई थी, जिसके बाद सरकार ने 20 बिंदुओं वाला नेशनल एक्शन प्लान का प्रस्ताव रखा और सेना को कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए थे.

सरकार ने कुछ विवादित फ़ैसले भी लिए, जैसे फांसी से प्रतिबंध हटाना और सैन्य अदालतों का गठन.

लगभग सभी अख़बारों ने एक स्वर से कहा है कि पेशावर की घटना के बाद से चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई में थोड़ी गति आई है और देश में सुरक्षा के माहौल में सुधार हुआ है.

इमेज कॉपीरइट AP

पाकिस्तानी सैन्य प्रवक्ता मेजर जनरल असीम बाजवा ने 12 दिसम्बर को किए गए कई ट्वीट में लिखा था कि जून 2014 में जबसे ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब शुरू हुआ है, इसे ‘काफ़ी कामयाबी’ मिली है.

उन्होंने अपने ट्वीट में कहा कि चरमपंथियों की रीढ़ को तोड़ दिया गया है और उनके मुख्य ढांचे को नष्ट कर दिया गया है.

पाकिस्तान टुडे अख़बार ने अपने 12 दिसम्बर के सम्पादकीय में लिखा, “पेशावर घटना के बाद एक साल के दरम्यान चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध में काफ़ी प्रगति हुई है. इस दुखद घटना के बाद बिना शर्त अंतिम चरमपंथी तक से युद्ध लड़ने की ज़रूरत पर देश एकजुट रहा. बाक़ी देशों को भी आख़िर मानना पड़ा कि पाकिस्तान चरमपंथ से सबसे अधिक प्रभावित देश है. और सैन्य कार्रवाई के पीछे की गंभीरता को समझते हुए पश्चिमी देशों ने भी थोड़ी और कार्रवाई की मांग को छोड़ दिया.”

इमेज कॉपीरइट Reuters

हालांकि पाकिस्तानी अख़बार इस बात को मानते हैं कि देश में चरमपंथी घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन वो ये भी कहते हैं कि चरमपंथ का ख़तरा अभी बरक़रार है क्योंकि तालिबान और अन्य चरमपंथी गुट छिटपुट हमले जारी रखे हुए हैं इसलिए.

जिस दिन पाकिस्तानी सैन्य प्रवक्ता ने कार्रवाई को कामयाब बताया उसके एक दिन बाद क़बायली इलाक़े कुर्रम के पारिचिनार क़स्बे के भीड़भाड़ इलाक़े में हुए बम हमले में कम से कम 25 लोग मारे गए और 70 घायल हुए.

पाकिस्तान के सुन्नी चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-झांगवी ने 13 दिसम्बर के इस हमले की ज़िम्मेदारी ली और कहा कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद और ईरानी सरकार का समर्थन करने के लिए शियाओं पर ये हमला किया गया था.

दि नेशन अख़बार ने 14 दिसम्बर को अपने सम्पादकीय में लिखा, “एकतरफ़, यह स्वीकार करना चाहिए कि देश में सुरक्षा हालात में अपेक्षाकृत सुधार हुआ है, लेकिन दूसरी तरफ़, पारिचिनार में हुआ हमला और इससे आम लोगों के लिए हुई तबाही ने दिखाया है कि सुरक्षा अभी भी पर्याप्त नहीं है.”

डेली टाइम्स अख़बार ने दो दिसम्बर को लिखा, “ऐसे समय जब देश 16 दिसम्बर को हमले की पहली वर्षगांठ मनाने जा रहा है, ख़बरें अभी भी नकारात्मक बनी हुई हैं...सच्चाई ये है कि अभी भी ये निश्चित नहीं है कि स्थापित की गई सैन्य अदालतों में तमाम पाबंदियों के बीच अभियुक्तों पर निष्पक्ष मुक़दमा चलेगा. अतिरिक्त क़ानूनी अदालतों के गठन से सुनवाई में तेज़ी तो आ सकती है लेकिन इससे न्याय में बाधा भी पड़ सकती है..इंसाफ़, बदले की भावना से नहीं किया जा सकता, नहीं तो न्यायिक निष्पक्षता कटघरे में खड़ी हो सकती है.”

पाकिस्तानी मीडिया के एक वर्ग का कहना है कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई की योजना के सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं को नज़अंदाज़ कर नागिरक सरकार द्वारा सेना की मांगों को लगातार मानने से सेना और ताक़तवर हो गई है.

इमेज कॉपीरइट AFP

दि नेशनल अख़बार ने तीन दिसम्बर को अपने सम्पादकीय में लिखा, “पिछले दो दशकों से हमने सेना और ताक़तवर बनाने का काम किया है और हमेशा की तरह हिंसा के दुष्चक्र के सामाजिक नुक़सान और सरकार की नुक़सानदेह नीतियों को नज़रअंदाज़ किया है. आर्मी स्कूल के बच्चों के मातापिता ने अपनी मांगों के न माने जाने के सरकारी रवैये के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा ज़ाहिर किया है... नेशनल एक्शन प्लान भी बहुत भरोसा या सुरक्षा दिलाने में बहुत सफल नहीं रहा है.”

अख़बार ने लिखा है, “हमले 16 दिसम्बर के बाद भी बंद नहीं हुए हैं. जब सेना और उसकी ताक़त की तारीफ़ करते हैं लेकिन जर्ब-ए-अज़्ब के कारण विस्थापित हुए लोगों से लेकर मारे गए 132 बच्चों के परिजनों तक, हम एक दर्द में डूबा हुआ एक देश हैं.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार