एक की मौत, दूसरा ज़ख़्मी, तीसरा स्कूल जाने ..

  • 16 दिसंबर 2015
समीना नवाज़

पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल पर तालिबान के हमले को एक साल हुआ, पर हमले का निशाना बने बच्चों और लोगों के घरवालों के घाव अभी भी ताज़ा हैं.

हमले में ज़ख़्मी हुए अहमद नवाज़ ब्रिटेन के बर्मिंघम शहर में इलाज करा रहे हैं, जहां उनकी मां शमीना नवाज़ भी उनके साथ हैं.

शमीना नवाज़ ने 16 दिसंबर 2014 को एक ही दिन जहां एक बेटा खोया, वहीं दूसरा अब तक अस्पताल में है और तीसरा सदमे से अभी तक नहीं उबर पाया है.

मैं यह जानने को बेचैन था कि इसके बावजूद शमीना नवाज़ ज़िंदगी से मायूस क्यों नहीं हुई हैं.

वह कहती हैं, 'हम ख़ूबसूरत ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. तीन बच्चे, एक अच्छा वक़्त. इन दहशतगर्दों ने हमारी ज़िंदगी तबाह करके रख दी.'

शमीना जज़्बात पर क़ाबू नहीं रख पातीं और चंद लम्हों के लिए ख़ुद मुझे भी लगा कि दूसरा सवाल पूछने की हिम्मत शायद मुझमें भी नहीं है.

इसके बाद शमीना नवाज़ कहती हैं, "मेरा एक बच्चा शहीद हो गया है और एक ज़ख़्मी है और सबसे छोटा काफ़ी दिनों तक स्कूल नहीं जाता था. अगर हम दहशतगर्दों के डर से अपने बच्चों को घर बैठा दें तो हमारे बच्चों में वह अहसास पैदा नहीं होगा."

"हम चाहते हैं कि इल्म और पढ़ाई के ज़रिए इनमें अहसास पैदा कर सकें ताकि वो उनसे इल्म के ज़रिए लड़ सकें."

अहमद नवाज़ फिलहाल बर्मिंघम के एक स्कूल में जाते हैं. वे भी हमारी बातचीत सुन रहे थे.

उनका कहना था, "दहशतगर्दी का ख़ात्मा सिर्फ़ फ़ौज के बस की बात नहीं बल्कि इसे सिर्फ़ और सिर्फ़ शिक्षा को बढ़ावा देने से ही ख़त्म किया जा सकता है."

बर्मिंघम से वापसी पर अहमद के पिता मोहम्मद नवाज़ के ये शब्द मेरे कानों में गूंजते रहे, "ख़ुदा न खास्ता अगर वो फिर आकर मारें तो भी हम अपने बच्चों को स्कूल भेजेंगे क्योंकि यही तो हमारी और उनकी लड़ाई है."

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