आख़िर आईएस को क्यों नहीं हराया जा सकता?

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इस्लामिक स्टेट के क़ब्ज़े वाले रमादी के काफ़ी बड़े हिस्से को इराक़ी बलों की ओर से छुड़ाया जाना इस जिहादी ग्रुप के लिए ताज़ा झटका है.

इससे पहले तिकरित, सिंजर और बैजी जैसे इलाक़ों से उन्हें पीछे हटना पड़ा था.

भले ही आईएस को पीछे हटना पड़ा हो और हवाई हमलों का सामना करते हुए उसे एक साल से ज़्यादा वक़्त बीता हो पर इसके बावजूद यह जिहादी संगठन बहुत ताक़तवर साबित हुआ है.

पूर्वी और मध्य सीरिया के कुछ हारे हुए इलाक़ों पर इसने फिर से क़ब्ज़ा जमा लिया है. इसके अलावा इसे उत्तरी शहर रक़्क़ा के चारों ओर के इलाक़े में अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है और इराक़ के दूसरे बड़े शहर मोसुल की घेराबंदी कर रखी है.

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इराक़ में 2007 में अमरीकी फ़ौजों में बढ़ोत्तरी और 2007-08 में सुन्नी क़बीलों द्वारा चरमपंथियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने के बावजूद सामरिक विजय को आईएस की रणनीतिक हार में नहीं बदला जा सका है.

और इसके पीछे कई कारण हैं. इसमें प्राथमिकता और केंद्रीयता दो मुख्य बाते हैं.

पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर एक पूर्व विद्रोही कमांडर ने बताया, “दाएश (अरबी में आईएस का अनादरसूचक पर्यायवाची) हर दो महीने में अपनी गतिविधियों और हमलों को बढ़ा देता है. असद और उनके सहयोगी हर आधे घंटे पर हम पर बमबारी करते हैं.”

अगर सीरियाई विद्रोहियों में राष्ट्रपति असद के ख़िलाफ़ लड़ने की मंशा साफ़ है तो विद्रोहियों के कमांड एंड कंट्रोल ढांचे को बिखेरना, अमरीकी नीत गठबंधन की प्रस्तावित आईएस को हराने की रणनीति के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है.

दुर्भाग्य से, यही एक समस्या नहीं है.

आईएस की तुलना में तालिबान सरकार पश्चिमी देशों के हमले में दो महीने में ही धाराशायी हो गई और अफ़ग़ान इस्लामी चरमपंथी और सेक्युलर विद्रोही सुरक्षा बल बिखर गए. लेकिन आईएस का प्रतिरोध ज़्यादा कड़ा साबित हुआ है.

इसकी ये प्रतिरोध क्षमता परेशान करने वाली है.

आइए ज़रा संख्या में आईएस की ताक़त को देखें. विरोधियों की तुलना में इसकी ताक़त का अनुपात बहुत कम है. अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी का आंकलन है कि सितंबर 2014 में आईएस के पास 20 हज़ार से लेकर 31 हज़ार तक लड़ाके थे.

अगर अकेले इराक़ी हथियारबंद सुरक्षा बलों की संख्या को देखें तो आईएस के मुक़ाबले इसका अनुपात 8:1 का बैठेगा.

इसमें इराक़ी सुरक्षा बलों के सहयोगियों, जैसे शिया लड़ाके, सुन्नी क़बीलाई लड़ाके कुर्द पेशमर्गा बलों और आईएस के ठिकानों पर बमबारी करने वाले 60 से अधिक देशों के गठबंधन को शामिल नहीं किया गया है, जिनकी संख्या हज़ारों में है.

लेकिन दस जून 2014 को मोसुल में मौजूद 30,000 इराक़ी सुरक्षा बलों ने आईएस के 800 से 1500 लड़ाकों के सामने हथियार डाल दिए थे.

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मोसुल में मौजूद दो इराक़ी डिवीज़नों में सुरक्षा बलों का हमलावरों के मुक़ाबले अनुपात 20:1 था.

अन्य इलाक़ों में आईस की बहुत मामूली मौजूदगी है, जैसे मिस्र के उत्तर पूर्वी सिनाई क्षेत्र में, लेकिन यहां सरकारी सुरक्षा बलों और आईएस के वफ़ादार लड़ाकों के बीच अनुपात 500:1 है.

अमरीकी डिफ़ेंस डिपार्टमेंट के मुताबिक़, जबसे हवाई हमले शुरू हुए हैं, अभी तक आईएस पर 8,000 हवाई हमले किए गए हैं और उसके 10,000 लड़ाके मारे जा चुके हैं.

लेकिन फिर भी इस जिहादी संगठन को भर्ती करने और संगठित होने में कोई दिक़्क़त नहीं आ रही है.

हवाई हमलों के समय संगठन की रणनीति होती है बिखर जाना और अपने हथियारों को छिपा देना और नागरिकों में घुल मिल जाना.

इसके पास सामरिक रूप से हैरान कर देने और संशय व उहापोह वाले युद्ध क्षेत्र का फायदा उठाने की क्षमता है.

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इसने पश्चिमी देशों की ओर अपनी हमलावर रणनीति को और उन्नत किया है.

इसका सुबूत ये है कि आईएस के ठिकानों पर हवाई हमलों से पहले पश्चिमी देशों में आईएस से संबंधित केवल एक हमला हुआ था, लेकिन इसके बाद अब तक 25 से ज़्यादा हमले हो गए हैं.

ये नहीं कहा जा सकता कि आईएस अंततः नहीं हारेगा या इसके मामले में ब्रितानी सेनाध्यक्ष सर डेविड रिचर्ड की 2010 की भविष्यवाणी सही होगी, जिसमें कहा गया था कि अल क़ायदा को हराया नहीं जा सकता.

हालांकि पश्चिमी चरमपंथ विरोधी रणनीति को कुछ क़ामयाबी मिली है.

यह रणनीति तीन बिंदुओं पर टिकी है: स्थिति पर काबू पाने के लिए थोड़े समय के लिए हवाई हमले, इसके बाद कुछ समय के लिए हथियारबंद स्थानीय सहयोगियों की मदद लेना और लंबे समय के लिए बातचीत और लोकतंत्रीकरण के मार्फ़त राजनीतिक माहौल बनाना.

इराक़ और सीरिया पर हवाई हमलों ने परंपरागत सैन्य कौशल के इस्तेमाल की आईएस की क्षमता को सीमित किया है.

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उदाहरण के लिए 2014 के मध्य में आईएस ने सैकड़ों बख़्तबंद गाड़ियों और हथियारबंद पिकअप ट्रकों के काफ़िले लेकर एक बड़े इलाक़े को क़ब्ज़ा कर लिया था.

गठबंधन के भावी स्थानीय सहयोगियों को, सिद्धांततः, ज़मीनी स्तर पर आईएस को हराने की ज़िम्मेदारी लेनी है.

लेकिन असद विरोधी विद्रोहियों पर असर डालने वाले प्राथमिकता और केंद्रीयता के मुद्दों को देखते हुए यह बिंदु थोड़ा समस्याजनक है.

इस रणनीति को झटका तब लगा जब अमरीका द्वारा हथियारबंद आईएस विरोधी विद्रोहियों पर नुसरा फ्रंट ने हमला किया और रूस ने अमरीकी समर्थक विद्रोही ग्रुपों पर हवाई हमले शुरू कर दिए.

लेकिन इस रणनीति के तीसरे हिस्से में कामयाबी और कठिन है.

यह रणनीति आईएस को इस क्षेत्र में राजनीति के पंगु हो जाने का लक्षण मानती है, न कि कारण.

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इसलिए किसी भी स्थायी समाधान के लिए राजनीतिक माहौल में सुधार करना होगा, जो पिछले चार दशकों से ज़्यादा लगातार चरमपंथियों के लिए खाद पानी मुहैया करा रहा है.

सामरिक स्तर पर आईएस को हराना, इसके पैदा होने के गहरे कारणों को अस्थायी रूप से ढंकने जैसा साबित होगा, केवल इराक़ और सीरिया में ही नहीं बल्कि मिस्र, लीबिया, यमन और सउदी अरब में भी.

इसलिए आईएस को हराना घाव पर केवल पट्टी बांधने के समान होगा.

अंततः राजनीतिक सुधार और बातचीत की प्रक्रिया ज़रूरी होगी, इसलिए सैन्य अभियान के दौरान नीति निर्माताओं को रणनीतिक लक्ष्य को आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहिए.

(डॉ. ओमर आशोर यूनीवर्सिटी ऑफ़ एक्सेटर में मिडिल ईस्ट पॉलिटिक्स एंड सिक्युरिटी स्टडीज़ विभाग में प्रवक्ता हैं और लंदन के चैथम हाऊस में एसोसिएट फ़ेलो हैं.)

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