हमारा अवचेतन कितना स्मार्ट है?

  • 16 दिसंबर 2015
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जब हम पहेली बूझते है या फिर कुछ पढ़ते हैं, तो हमें लगता है कि हम अपने दिमाग को कंट्रोल कर रहे हैं.

हम मानते हैं कि मस्तिष्क के बारे में हम काफ़ी कुछ जानते हैं, पर ये सही नहीं है. एक शोध में मनुष्य के अवचेतन के बारे में चौंकाने वाले नतीज़े सामने आए हैं.

इस अध्ययन से पता चला है कि कई बार पूर्वाभास के आधार पर लिए गए फ़ैसले, ख़ूब सोच-समझकर किए गए फ़ैसलों के मुकाबले में बेहतर सिद्ध होते हैं.

ज़्यादातर मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि हम सबके मस्तिष्क के अंदर भी एक उप-मस्तिष्क होता है, एक अवचेतन जो हमारे सोचने-समझने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है. अगर मैं ख़ुद से पूछता हूँ कि फ़्रांस की राजधानी क्या है, तो मेरे ज़हन में तुरंत आएगा, पेरिस!

अगर मैं अपनी उंगलियाँ नचाऊँ तो वो एक जटिल बेतरतीब ढंग से आगे-पीछे होने लगती हैं जिसके क्रम का मुझे अंदाजा नहीं होता. ऐसे में मेरी उंगलियों की हरकत मेरा अवचेतन तय करता है.

हमारा अवचेतन बुद्धु या स्मार्ट

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मनोविज्ञान में ये एक बड़ी बहस है कि हमारे किन कामों के लिए चेतन मस्तिष्क जिम्मेदार है और किन कामों के लिए अवचेतन मस्तिष्क.

हाल ही में एक शोध प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक है, "हमारा अवचेतन बुद्धु है या चालाक?"

इस बारे में एक राय ये है कि हमारा अवचेतन हमारी स्वतःस्फूर्त सामान्य क्रियाओं, सामान्य तथ्यों, चीज़ों की पहचान के लिए ज़िम्मेदार है और हम जिन क्रियाकलापों के आदी होते हैं उनको संचालित करता है.

वहीं, योजनाएँ बनाने, तार्किक बुद्धि का प्रयोग, विभिन्न विचारों के बीच समन्वय के जटिल वैचारिक कामों के लिए हम चेतन मस्तिष्क का इस्तेमाल करते हैं.

लेकिन इसराइल के मनोवैज्ञानिकों ने इस शोध में इस विचार के उलट नतीजे पाए.

रैन हैज़िन और उनके साथियों ने 'कॉन्टिन्युअस फ़्लैश सप्रेशन' नामक एक तकनीक विकसित की जिसमें भाग लेने वाले के दिमाग़ में कुछ ऐसी जानकारी डाली जाती है जिसके बारे में वो सचेत रूप से जागरूक नहीं होते.

सुनने में ये कोई बहुत कष्टदायक प्रक्रिया लग सकती है लेकिन असल में यह बहुत ही साधारण है.

साधारण प्रयोग, असाधारण नतीजे

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'कॉन्टिन्युअस फ़्लैश सप्रेशन' तकनीक एक साधारण तथ्य पर आधारित है कि हमारे पास दो आँखें होती हैं और हमारा दिमाग़ दोनों आँखों से दिखने वाली चीज़ों के प्रतिरूप को मिलाकर हमारे लिए एक सुसंगत छवि का निर्माण करता है.

इस तकनीक में दोनों आँखों के लिए अलग-अलग छवियाँ प्रस्तुत की गईं. इसके तहत एक आँख को चटक रंगों वाली वर्गाकार आकृतियों को तेज़ गति से दिखाया जाता है.

दूसरी आँख के सामने छिपे तौर पर ज़रूरी जानकारी पेश की जाती है जिसके प्रति व्यक्ति तत्काल सचेत नहीं होता.

ऐसे में सैद्धांतिक रूप से किसी छवि की प्रति पूरी तरह से सचेत होने में कई सेकेंड लग सकते हैं.

गणितज्ञ अवचेतन

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हैज़िन ने अपने प्रयोग में गणित की एक सामान्य गणना में अवचेतन की भूमिका की जाँच की है.

इसमें गणित के कुछ ऐसे सवाल थे, "9 - 3 - 4 = ?" और इसके साथ ही कुछ ख़ास अंकों को जवाब के रूप में प्रमुखता से पेश किया गया. साथ ही प्रयोग में शामिल व्यक्तियों से कहा गया कि वो इन्हें जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी तेज़ आवाज़ में पढ़ें.

प्रमुखता से पेश किए गए अंक सही जवाब (इस मामले में 2) भी हो सकते थे और ग़लत जवाब भी (इस मामले में 1). चौंकाने वाला नतीज़ा ये था प्रमुखता से दिखाए गए सही जवाब को, लोगों ने ग़लत जवाब की तुलना में ज़्यादा जल्दी पढ़ा.

इससे स्पष्ट हुआ कि गणित के इस समीकरण को देखने वाले व्यक्तियों ने इसे अपने अवचेतन मस्तिष्क की मदद से हल किया, भले ही वो उसके प्रति सचेत रूप से जागरूक न रहे हों.

यानी, इन व्यक्तियों का मस्तिष्क सही जवाब को पढ़ने के लिए ग़लत जवाब की तुलना में ज़्यादा जल्दी तैयार होता है.

मनोविज्ञान में 'गेम-चेंजर'

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इन नतीज़ों से पता चला कि जितना हम समझते हैं, मनुष्य का अवचेतन मस्तिष्क उससे कहीं ज़्यादा क्षमतावान है.

किसी को लग सकता है कि गणित के ऐसे सवालों का जवाब देने के लिए सचेत रूप से विचार करना होगा.

लेकिन ऐसा नहीं था और इसे मनोविज्ञान में 'गेम-चेंजर' माना गया.

क्योंकि "मनुष्य का अवचेतन उन सभी मूलभूत बुनियादी कामों को कर सकता है जो सचेत प्रक्रिया द्वारा किए जाते हैं."

यह एक बड़ा दावा है. इस शोध दल के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि मनुष्य के अवचेतन को समझने और उसकी क्षमताओं के आकलन की दिशा में अभी लंबा सफ़र तय किया जाना है.

हमारा अवचेतन भी आइसबर्ग (बर्फ़ के पहाड़) की तरह होता है, जो सतह से ऊपर जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज़्यादा सतह के नीचे होता है, जो हमें नहीं दिखता. ऐसे प्रयोग हमें अपने मस्तिष्क की अंदरूनी सतह की एक झलक देते हैं.

(टॉम स्टैफ़ोर्ड ब्रिटेन के शेफ़ील्ड विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के लेक्चरर हैं. वो साइंस की बेस्ट सेलर किताब 'माइंड हैक्स' के सह-लेखक हैं. वो एक चर्चित ब्लॉग लेखक भी हैं. उन्हें ट्विटर पर @tomstafford पर फॉलो कर सकते हैं.)

इस बारे में मूल अंग्रेज़ी लेख यहां पढ़ें जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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