क्या आईएस के 'जिन्न' के लिए सऊदी ज़िम्मेदार है?

इस्लामिक स्टेट के लड़ाके इमेज कॉपीरइट AP

क्या ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन के विकास के लिए सऊदी अरब ज़िम्मेदार है?

यह आम धारणा है कि इस्लाम का कट्टरपंथी रूप वहाबी विचारधारा सऊदी अरब में ही फला फूला और रियासत ने इसे जिस तरह मदद की, उससे चरमपंथ को बढ़ावा मिला.

लेकिन सऊदी अरब इन दोनों ही आरोपों को सिरे से ख़ारिज करता है. इसने इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए चरमपंथ विरोधी फ्रंट बना लिया है.

इमेज कॉपीरइट AFP

पांच विशेषज्ञों ने इस पर अपनी राय साझा की है.

प्रोफ़ेसर बर्नार्ड हायकल. ये प्रिंसटन विश्वविद्यालय के ट्रांसरीज़नल स्टडी ऑफ़ द कंटेपरेरी मिडिल ईस्ट, नॉर्थ अमरीका और एशिया के निदेशक हैं.

इनका मानना है कि इस्लामिक स्टेट की धार्मिक विचारधारा सीधे तौर पर वहाबी विचारधारा से जुड़ी हुई है.

इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption सऊदी अरब के शासक शाह फ़हद

ये कहते है, "इस्लामिक स्टेट की धार्मिक विचारधारा सीधे-सीधे ‘जिहादी सलाफ़ी मत’ से निकली है. इसके अनुयायी बिल्कुल कठोर हैं और वे हर उस मुसलमान की निंदा करते हैं, जो उनसे सहमत नहीं है. वे ऐसा कर हिंसा को विचारधारा के माध्यम से उचित ठहराते हैं."

उनके मुताबिक़, मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब सलाफ़ी परंपरा के थे. वे अरब के धार्मिक सुधारक थे और उन्होंने जो आंदोलन खड़ा किया, उससे एक राज्य का निर्माण हुआ.

वे कहते हैं, "उनका मानना था कि मुसलमान इस्लाम के ‘सच्चे’ संदेश से भटक गए हैं, वे ठीक से नमाज़ तक नहीं पढ़ते, वे जिस तरह प्रार्थना करते हैं, उससे इस्लाम का उल्लंघन ही होता है."

हायकल कहते हैं, “कई लोगों ने वहाबी के ख़िलाफ़ लिखना शुरू किया, उनका मानना था कि वहाबी पर्याप्त पढ़े लिखे नहीं थे. पर अंत में वे 1744 में सऊदी अरब के राज परिवार से किसी तरह जुड़ गए. इसका काफ़ मजबूत और दूरगामी असर पड़ा.”

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption शाह अब्दुल्ला, सऊदी अरब के पूर्व शासक

उन्होंने बीबीसी से कहा, "वहाबी विचारधारा पर बना पहला सऊदी राज्य उनके विचारों से काफ़ी सहमत था क्योंकि उसने उसके बल पर ही 18वीं और 19वीं सदी में लगभग पूरा अरब जगत जीत लिया." वो आगे कहते हैं, "वे एक शहर को जीतने के बाद वहां इस्लामी शिक्षक तैनात कर देते थे, किताबें छपवाते थे और उसके मुताबिक ही शिक्षा देते थे. अब इस्लामिक स्टेट उसी किताब का इस्तेमाल कर रहा है."

प्रोफ़ेसर मदवी अल रशीद. ये लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के मध्य पूर्व केंद्र में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं.

इनका मानना है कि वहाबी विचारधारा से इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ.

वे कहते हैं, "जब तक वहाबी विचारधारा मानने वाले यह कहते थे कि लोगों को सऊदी राजा के आदेशों का पालन करना चाहिए, अल सऊद परिवार उनसे खुश था."

उन्होंने बताया, "1960 और 1970 के दशक में अरब में क्रांतिकारी विचारधारा तेज़ी से फैल रही थी. सऊदी परिवार को लगा कि वहाबी विचारधारा उसके ख़िलाफ़ एक कारगर औज़ार है."

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption शाही सऊदी वायु सेना के लड़ाकू जहाज़

वे आगे कहते हैं, "सुलतान फ़हद ने 1980 के दशक में क़ुरान छापने के लिए एक प्रेस लगवा दिया, यहां छपी किताबें दुनिया के कोने कोने में मुफ़्त भेजी जाती थीं. उन्होंने इस्लाम की शिक्षा देने के लिए अल मदीना विश्वविद्यालय की स्थापना करवा दी. "

प्रोफ़ेसर मदवी के मुताबिक़, "वहाबी विचारधारा निश्चित तौर पर इस्लाम का असहिष्णु रूप है. यह एक स्थानीय परंपरा है जो समय से पहले ही पूरी दुनिया में फैल गई है. यह एक क्रांतिकारी भाषा है, जो लोगों को इस्लाम के नाम पर अत्याचार करने के लिए प्रेरित करती है."

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप.

वे कहते हैं, "सलाफ़ी मत मुख्य रूप से सऊदी अरब में ही माना जाता है. वहां इस्लाम के दूसरे मतों के प्रति ज़्यादा रुझान इसलिए भी नहीं है कि इसके ज़रिए राजनीतिक हिंसा को आसानी से कुचला जा सकता है. सऊदी अरब के धार्मिक प्रतिष्ठान ने इस्लाम के दूसरे मतों के प्रति कोई ख़ास भेदभाव नहीं किया है."

वे कहते हैं, "मैंने लोगों से यह कहते सुना है कि मुसलमान इस्लामिक स्टेट की निंदा नहीं करते, चरमपंथ के ख़िलाफ़ खड़े नहीं होते. सच तो यह है कि सिर्फ़ इसी साल सऊदी अरब में 1,850 लोगों को इस्लामिक स्टेट के सदस्य होने के संदेह में गिरफ़्तार किया गया है."

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption तेल के कई कुंओं पर इस्लामिक स्टेट का कब्ज़ा है.

वे आगे कहते हैं, "सऊदी अधिकारी पैसे उगाही के इस्लामिक स्टेट के तौर तरीकों से चिंतित हैं. उन्होंने दानदाताओं से ट्विटर पर कहा कि वे स्काइप पर संपर्क करें. उनसे प्रीपेड कार्ड खरीद कर उसका नंबर उन्हें देने को कहा ताकि पैसे का भुगतान आसानी से किया जा सके. इसी साल सऊदी अरब ने आईएस विरोधी वित्त समूह की अध्यक्षता अमरीका और इटली के साथ मिल कर की."

मोहम्मद याहया. ये लंदन स्थित सऊदी अरब दूतावास में राजनीतिक सलाहकार हैं.

इनका कहना है कि इस्लामिक स्टेट को गंभीर ख़तरा तो सऊदी अरब से ही है.

उनके मताबिक़, यह आरोप बेबुनियाद है कि आईएस को सऊदी अरब से पैसे मिलते हैं.

वे कहते हैं, "इस्लामिक स्टेट को वित्तीय मदद न मिले, इसके लिए सऊदी अरब ने कठोरतम उपाय किए हैं. पैसे बाहर भेजने की सख़्त निगरानी की जाती है. कुछ लोग इससे बच निकलने में कामयाब हुए हैं, पर वहां कठोरतम व्यवस्था की गई है."

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर बमबारी.

उनके मुताबिक़, "इस्लामिक स्टेट को अपने आप को उचित ठहराने के लिए जिस किसी विचारधारा की ज़रूरत पड़ेगी, वे अपना लेंगे. यह ज़रूरी नहीं कि वे वहाबी विचारधारा पर ही निर्भर रहें."

मैथ्यू लेविट. ये वाशिंगटन इंस्टीच्यूट फॉर निअर ईस्ट पॉलिसी में चरमपंथ विरोधी विभाग के निदेशक हैं.

इनका मानना है कि इस्लामिक स्टेट वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर है.

वे कहते हैं, "इस्लामिक स्टेट को अपने बजट का निहायत ही छोटा हिस्सा काफ़ी ज़्यादा पैसे वाले लोगों से मिलता है. किसी समय में उसे सऊदी अरब से पैसे मिलते थे, पर अब रियाद ने इससे किनारा कर लिया है."

उनके मुताबिक़, "आईएस इराक़ में अल क़ायदा के अपने शुरुआती दिनों से ही पैसों के मामले में आत्मनिर्भर रहा है. साल 2006 में अनुमान लगाया गया था कि अल क़ायदा इराक़ सालाना 70 मिलियन से 200 मिलियन डॉलर तक का इंतजाम कर लेता है. उससे बरामद काग़ज़ात से पता चलता है कि उसके पैसों का आधा से कम हिस्सा ही बाहरी देशों से आता है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार