हमने ही बनाईं दहशतगर्दी की नर्सरियां: पाक मीडिया

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Image caption आर्मी स्कूल पर हमले में लगभग डेढ़ सौ लोग मारे गए जिनमें ज़्यादातर बच्चे थे

पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए हमले को बीते हफ़्ते एक साल पूरा होने के मौक़े पर पाकिस्तान उर्दू अख़बारों में चरमपंथ की चुनौती और उससे निपटने की रणनीति चर्चा का विषय रही.

'रोज़नामा एक्सप्रेस' लिखता है कि 16 दिसंबर 2014 की त्रासदी ने जहां पूरे देश को हिला कर रख दिया था वहीं इसने दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ पाकिस्तान को एकता और इरादे की लड़ी में भी पिरो दिया.

अख़बार लिखता है कि दहशतगर्दों के ख़ात्मे के लिए उत्तरी वज़ीरिस्तान में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब शुरू किया गया, जो ख़ासा कामयाब रहा है, लेकिन ये जंग लंबी चलेगी और सब्र का इम्तिहान भी लेगी.

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अख़बार कहता है कि ये जंग सिर्फ़ सेना की नहीं, बल्कि पूरे देश की है और सबको इसमें अपना किरदार निभाना होगा.

'रोज़माना पाकिस्तान' कहता है कि ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब और इससे पहले स्वात में कार्रवाई के नतीजे में दहशतगर्दों ने भागकर अफ़ग़ानिस्तान में शरण ले ली और सरहदी चौकियों पर वो हमले भी करते रहते हैं.

अख़बार ने इन दहशतगर्दों के ख़ात्मे के लिए अफ़ग़ानिस्तान के सहयोग पर ज़ोर दिया है.

वहीं ‘रोज़नामा दुनिया’ ने 16 दिसंबर को पाकिस्तान में हर साल ‘राष्ट्रीय शिक्षा संकल्प दिवस’ के तौर पर मनाने के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के फ़ैसला का स्वागत किया है.

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अख़बार की टिप्पणी है कि 'आर्मी स्कूल के शहीद बच्चों के लिए इससे बेहतर भला क्या श्रद्धांजलि हो सकती है', लेकिन सिर्फ़ एलान कर देने भर से काम नहीं चलेगा.

अख़बार कहता है कि ग़रीबी और बदहाली के हालात में, समस्याएं और नाइंसाफ़ियों के हालात में 'दहशतगर्दी की नर्सरियां हमने ख़ुद क़ायम कर रखी हैं और इनके रहते कैसे दहशतगर्दी ख़त्म हो सकती है?'

वहीं ‘जंग’ का संपादकीय है- पाक भारत संबंधों के नए पहलू.

अख़बार लिखता है कि दोतरफ़ा रिश्तों को लेकर भारत की मौजूदा सरकार के रुख़ में आई तब्दीली स्वागतयोग्य है लेकिन जब तक दोनों देश सभी मुद्दों के न्यायोचित समाधान के लिए रज़ामंद नहीं होंगे, तब तक बातचीत का कोई सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आएगा.

अख़बार लिखता है कि भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने समग्र वार्ता की बहाली को अच्छी शुरुआत करार देने के बावजूद एक बार फिर पुराने अंदाज में कहा है कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भी भारत का हिस्सा है.

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Image caption भारतीय विदेश मंत्री के हालिया पाकिस्तान दौरे में वार्ता बहाल करने पर सहमति बनी

अख़बार ने भारतीय विदेश मंत्री के बयान को बातचीत के लिए साज़गार माहौल में रुकावट बताते भारत से हठधर्मिता छोड़ने को कहा है.

वहीं ‘नवा-ए-वक़्त’ कहता है कि बातचीत में कश्मीरी नेताओं को भी शामिल किया जाए और बातचीत में रुकावट डालने वाली ताक़तों पर नज़र रखी जाए.

अख़बार कहता है कि भारत में अगर कोई पार्टी कश्मीर मसले को हल करने की स्थिति में है तो वो भारतीय जनता पार्टी ही है, हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि वो दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ मुहिम की ईमानदारी को जांच रहे हैं.

अख़बार कहता है कि पाकिस्तान को भी बातचीत के प्रति भारत की ईमानदारी पर नज़र रखनी होगी.

रुख़ भारत का करें तो निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड में नाबालिग़ दोषी की रिहाई को लेकर ‘अख़बार-ए-मशरिक’ ने संपादकीय लिखा है.

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अख़बार कहता है कि इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जब 'तीन साल पहले दरिंदों ने दिल्ली की जिस पैरामेडिकल छात्रा निर्भया को गैंगरेप का शिकार बनाया था और क़त्ल कर दिया, उसकी तीसरी बरसी पर उसके नाबालिग़ मुजरिम को रिहा किया जा रहा है.'

अख़बार के मुताबिक़ ये वहीं दोषी है जिसके बारे में कहा जाता है कि अपराध के समय सबसे ज़्यादा बरबरता उसी ने दिखाई थी.

‘दरिंदे की रिहाई का रास्ता साफ़’ शीर्षक से ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ लिखता है कि देश के बहुत से लोग नहीं चाहते कि उसे फ़िलहाल रिहा किया जाए लेकिन क़ानून उसे तीन साल से ज़्यादा की सज़ा देने की स्थिति में नहीं है.

‘क़ौमी तंज़ीम’ ने झारखंड की लोहरदगा विधानसभा सीट पर कांग्रेस के हाथों एनडीए की हार पर संपादकीय लिखा है- झारखंड का झटका.

अख़बार कहता है कि आमतौर पर होता ये है कि उपचुनाव में वही पार्टी जीतती है जिसकी राज्य में सरकार होती है, और ऐसा न हो तो इसे राज्य सरकार के प्रति लोगों की नाराज़गी माना जाता है.

Image caption झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है लेकिन सीएम रघुबर दास आदिवासी समुदाय से नहीं है

अख़बार कहता है कि झारखंड में रघुबर दास के मुख्यमंत्री बनने के बाद से भाजपा का एक बड़ा तबक़ा ख़ुश नहीं है और ये लोग लगातार उनकी सरकार को कमज़ोर करने में लगे हुए हैं.

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