डेनमार्कः शरणार्थी और अप्रवासी के बीच उलझन

  • 10 जनवरी 2016
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अमरीका में रहने वाले डेनमार्क के लेखक क्रिस्टिआन मोर्क ने फ़ेसबुक पर अपनी एक पोस्ट की वजह से डेनमार्क के राष्ट्रवादियों से पंगा ले लिया है.

फेसबुक पर उन्होंने अपनी दादी की एक अंगूठी पोस्ट की है.

उन्होंने इसे 'इंटिग्रेशन मिनिस्टर' इंगर स्टोजबर्ग के पेज पर डेनमार्क की शरणार्थी राजनीति के विरोध में पोस्ट किया है.

उन्होंने लिखा है कि उनके दादा रूस से 1860 के दशक में डेनमार्क आए थे और उन्हें अपनी क़ीमती चीज़ नहीं गंवानी पड़ी थी.

रिपोर्टों के मुताबिक़ डेनमार्क सरकार ने वर्तमान शरणार्थी नीति के तहत एक योजना का प्रस्ताव रखा है कि देश की सीमा में घुसने वाले शरणार्थियों को अपनी क़ीमती चीज़ सरकार को सौंपनी होगी.

क्रिस्टिआन मोर्क लोगों के ग़ुस्से भरी टिप्पणियों से अचरज में हैं.

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वहीं, दूसरी तरफ़ कोपेनहेगन के एक पुलिसवाले जैकब नीलसन की इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ लिखी गई पोस्ट को लोगों ने सराहा.

नीलसन ने लिखा है कि दूसरे विश्वयुद्ध के लड़ाके का बेटा होने के नाते वे लंबे समय तक देश सेवा करने के बावजूद सिर्फ़ क़ीमती चीज़ों को ज़ब्त करने से मना कर सकते हैं.

दोनों प्रतिक्रियाएं दिखाती हैं कि कैसे इस प्रस्ताव पर देश के लोगों की राय दो हिस्सों में बँट गई है.

साफ़ है कि यह क़दम डेनमार्क को सीरिया, लीबिया और अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले शरणार्थियों का ख़र्च उठाने में मदद करेगा.

इस प्रस्ताव को कुछ राजनेताओं, सांसदों और कम से कम एक मंत्री का समर्थन प्राप्त है.

डेनमार्क का यह मामला अतिवादी और नाटकीय भले हो, लेकिन सच यह है कि पूरे यूरोप में लोग अपने देश में आने वाले शरणार्थियों को लेकर चिंतित हैं.

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यह तादाद इतनी कम भी नहीं कि इसे नज़रअंदाज़ किया जाए.

अक्तूबर और नवंबर में डेनमार्क आने वाले शरणार्थियों की संख्या एक या दो बार एक हफ़्ते में 10000 के आंकड़े को छू गई थी.

कुछ मायनों में यह तादाद छोटी है क्योंकि अधिकतर शरणार्थी पड़ोसी एशियाई और अफ्रीकी देशों में शरण ले रहे हैं.

लेकिन यूरोप में होने वाले मीडिया कवरेज में शायद ही इसकी चर्चा होती है. ज़्यादातर यूरोपीय देश एक जाल में फंस गए हैं.

वे अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ मुजाहिदीनों की लड़ाई से लेकर इराक़ और सीरिया में आईएस के ख़िलाफ़ संघर्ष जैसे कई संघर्षों के सक्रिय और निष्क्रिय समर्थक रहे हैं और बीच में पिसते रहे हैं.

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कोई तर्क दे सकता है कि आईएस के ख़िलाफ़ बिल्कुल ज़रूरी है. मैं भी इसका समर्थक हूं लेकिन इसके परिणाम अमरीका और यूरोप को अलग-अलग तरीक़े से भुगतने पड़ते हैं.

दूरी और समुद्र की वजह से अमरीका पुतिन और असद पर जो रुख़ अपना सकता है, वह यूरोप नहीं कर सकता. लेकिन यूरोप नैटो और अमरीका से अलग विदेश नीति नहीं अपना सकता. यह एक अलग ही समस्या है.

डेनमार्क जैसी जगहों पर चूंकि इन समस्याओं का सामना खुले तौर पर नहीं करना पड़ रहा, इसलिए यहां शरणार्थियों और अप्रवासियों को लेकर भ्रम पैदा हो गया है और इसने 'आर्थिक' विवाद की शक्ल ले ली है.

यही कारण है कि कई डेनमार्कवासी शरणार्थियों को लड़ाइयों से बचकर भागे लोगों के बजाय भेस बदलकर आए अप्रवासी की तरह देख रहे हैं.

डेनमार्क की सत्ता में कुछ ही राजनेता ऐसे हैं, जो इस ग़लत धारणा को ख़त्म करना चाहते हैं.

एक महत्वपूर्ण राजनेता ने कहा कि 'हीरे से भरा सूटकेस' लेकर आने वाले शरणार्थियों को रोकना होगा और उनके हीरे ज़ब्त करने होंगे.

ये हालात अप्रवासियों को लेकर यूरोप के डर को दिखाता है.

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