डॉक्टर की दवा कब बेअसर हो जाती है?

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डॉक्टर के पास जाने के बाद क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया कि डॉक्टर को कंसल्ट करने का ज़्यादा फ़ायदा नहीं हुआ?

कई शोध ये बताते हैं कि यदि डॉक्टर शिष्टता से मिले और बातचीत करे, तो आप जल्दी स्वस्थ्य हो सकते हैं.

लेकिन यदि डॉक्टर अपनी बात सोच समझकर ध्यानपूर्वक न रखे, तो आपकी तबीयत बिगड़ भी सकती है.

हारवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर टेड कापचूक कहते हैं, "हर शब्द मायने रखता है, हर नज़र मायने रखती है. ये एक अवसर जैसा है और इसे खोना नहीं चाहिए."

डॉक्टर के बर्ताव और उससे होने वाले असर को स्पष्ट करने के लिए बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के डिस्कवरी प्रोग्राम के प्रेजेंटर ज्यॉफ़ वाट्स ने डॉक्टर मार्क पोर्टर के साथ एक 'रोल-प्ले' किया.

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उन्होंने डॉक्टर को अपने घुटनों की समस्या के बारे में बताया. डॉक्टर पोर्टर ने अपनी आम बातचीत से ऐसा नकारात्मक आभास दिया कि किसी भी मरीज़ का दिल ही बैठ जाए.

डॉक्टर पोर्टर ने शुरुआत में ही मरीज़ को बताया कि उन्हें कुछ बुरी ख़बर बतानी पड़ेगी. उन्होंने कहा, "आपके घुटने ऑस्टियो-आर्थराइटिस के चलते घिस गए हैं. दवाओं से कुछ फ़ायदा तो हो सगता है. लेकिन ये दवाएँ पेट का लाइनिंग को नुकसान पहुँचा सकती हैं."

वाट्स को बाद में ये पता चला कि डॉक्टर की इस तरह की बातों से स्वास्थ्य सुधरने की जगह और ख़राब हो सकता है.

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जब 'रोल-प्ले' के बाद डॉक्टर पोर्टर से दोबारा बात हुई तो उन्होंने बताया, "मैं जिस तरह से समस्या के बारे बात करता हूं, उससे आपकी अपने घुटनों को लेकर चिंता बढ़ सकती है. आपको लगेगा कि घुटने बर्बाद हो चुके हैं. अब आपका कुछ नहीं हो सकता है. इसके साइड इफेक्ट्स के बारे में भी मैं बढ़ा-चढ़ाकर बताता हूँ तो चिंता बढ़नी तो स्वभाविक ही है."

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प्रयोगों से पता चला है कि लोगों को साइड इफेक्ट्स के बारे में चेतावनी देने से मुश्किलें बढ़ जाती हैं. उन्हें उल्टी, थकान, सिर दर्द और दस्त की शिकायत हो सकती है, भले उन्हें ऐसी दवा दी गई हो जिसका कोई साइड इफेक्ट होता ही नहीं है.

मेडिसिन की दुनिया में लंबे समय से प्लेसीबो इफेक्ट की बात होती रही है, यानी अच्छी उम्मीदें लगाने से उपचार. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी होता है नोसेबो इफेक्ट, जो कहीं ज़्यादा शक्तिशाली माना जाता है.

वाट्स कहते हैं, "नुकसान पहुंचाना कहीं ज्यादा आसान होता है. ये चिंतित करने वाला भी है क्योंकि नोसेबो का निगेटिव प्रभाव मेडिकल जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है."

विकट परिस्थितियों में ये जानलेवा भी हो सकता है. कई बार तो अनावश्यक सोच भी मौत का सबब बन सकती है.

हालांकि अच्छी ख़बर ये है कि दिमाग और शरीर का कनेक्शन और डॉक्टरों का अच्छा व्यवहार जादुई तरीके से इलाज में लाभकारी भी हो सकता है.

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एक अध्ययन के मुताबिक अवसाद से पीड़ित मरीज़ को डॉक्टर के सहानुभूतिपूर्वक प्लेसीबो पिल्स देने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं. जबकि तटस्थ भाव से दी गई ज्यादा ताकतवर दवाई का भी असर कम ही होता है.

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कुछ वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि डॉक्टरों को प्लेसीबो इफेक्ट का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि मरीज़ों को कम दवाएँ दी जाएँ. इनका मानना है कि डॉक्टर-नर्स के बेहतर व्यवहार, प्लेसीबो दवा के इस्तेमाल और मरीज़ का सकारात्मक रवैया घटाई गई दवा के अंतर को पूरा कर सकता है.

एक्सीटर मेडिकल स्कूल के पॉल डायप कहते हैं, "स्व-उपचार एक वास्तविकता है. हम सबमें ऐसी क्षमता होती है जिससे कई स्थितियों में हम खुद का उपचार कर सकते हैं. यह दूसरे लोगों से बातचीत करने से भी सक्रिय होता है."

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पोर्टर के मुताबिक इलाज के दौरान मरीज़ों के साथ सहानुभूतिपूर्वक बात करने से मरीज पर बेहतर असर पड़ता है. इलाज बताते वक्त अगर चिकित्सक दवा के पॉजिटिव इफेक्ट्स के बारे में बताए, निगेटिव साइड इफेक्ट को कमतर करके बताए, तो असर बेहतर दिखता है.

हारवर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टेड कापचूक कहते हैं, "मैं नहीं मानता कि इससे डॉक्टर और नर्स पर बोझ बढ़ेगा. मेरे ख्याल से इससे उन्हें समझ में आएगा कि वो किस तरह से इलाज का अहम हिस्सा हैं. स्वास्थ्य सेवा में ऐसी जागरुकता की शुरुआत अभी हो ही रही है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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