सनी लियोनी को देखेंगे या हिलेरी क्लिंटन को?

बॉस आप लोग झूठ क्यों बोलते हैं? अरे जो दिल में हो वो खुलकर कहें. हमारे जैसे बहुत ग़रीब पत्रकारों का भला होगा.

जब भी हमारी सर्वे करने वाली टीम आपकी पसंद-नापसंद से जुड़े सवालों के साथ आपके पास पहुँचती है, आप बड़े चौड़े होकर कहते हैं- देखें जी, हम तो बस ऐसी ख़बर पढ़ना-सुनना-देखना चाहते हैं, जिनसे हमें पता चले कि दुनिया में क्या हो रहा है, उनसे हमारी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा. साथ में विज्ञान, सेहत, टेक्नोलॉजी की भी ख़बरें हों तो क्या कहने.

उसके बाद आप यह भी कहते हैं कि टीवी न्यूज़ चैनलों के पास तो दिखाने को कुछ होता ही नहीं है, एंकर चिल्लाते रहते हैं, चार लोग बैठकर एक ही बात चार तरह से कह रहे होते हैं.

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फिर आप घर पहुँचते हैं और जैसे ही हाथ में रिमोट आया कि "बेबी डॉल मैं सोने दी" की कहानियां जिस चैनल पर आ रही होती हैं वहीं रुक जाते हैं. भाड़ में गया अमरीका-ईरान परमाणु समझौता, जलवायु परिवर्तन, अमरीकी चुनाव और आइसिस.

एक ही हफ़्ते में सर्वे करनेवाली टीम की रिपोर्ट कूड़े में पहुँचती है और चैनल पर शुरू हो जाती है तिलस्मी बाबा, करामाती बिल्ली, डॉन का प्यार, धोनी का चमत्कार. एंकर और एंकरनी फिर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर देते हैं. पता नहीं चल पाता है कि ख़बर अच्छी है या बुरी. सवाल पूछते हैं तो पता ही नहीं चलता कि पूछ रहे हैं या बता रहे हैं.

आप सोच रहे होंगे, साल अभी शुरू ही हुआ है मैं इतना भन्नाया हुआ क्यों हूँ. बॉस, आपके झूठ के चक्कर में सात सौ ग़रीब पत्रकारों की नौकरी जा रही है. ढाई साल पहले उन्होंने अल जज़ीरा अमरीका के लिए काम करना शुरू किया था. 30 अप्रैल को अपनी आख़िरी पगार लेंगे क्योंकि चैनल बंद हो रहा है.

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वैसे तो बंद होने की एक बड़ी वजह यह भी कही जा रही है चैनल का नाम है अल जज़ीरा और अमरीका में बहुत सारे हैं जिन्हें अल जज़ीरा और अल क़ायदा एक ही जैसे सुनाई देते हैं.

लेकिन उससे भी बड़ी वजह हैं आप. चैनल खोलने से पहले बेचारों ने सर्वे करवाया कि आप क्या देखना चाहेंगे. 60 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समाचार, ऐसी ख़बरें जो आम लोगों से जुड़ी हों, जिनमें पूरे अमरीका की बात हो रही हो, सिर्फ़ वाशिंगटन, न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को में रहने वाले अमरीका की नहीं. आपने कहा कि दूसरे चैनलों में इसकी बड़ी कमी महसूस करते हैं आप.

बस क्या था, चैनल ने ताबड़तोड़ वैसी ही ख़बरें दिखानी शुरू कर दीं. अफ़्रीका की ग़रीबी, लातिन अमरीका के ड्रग वॉर, मेक्सिको से अमरीका में घुसने वालों की मजबूरी, इसराइल और मध्य-पूर्व की जंग, सीरिया की बेहाली- यानी मेरे एक मित्र का मुहावरा उधार लूँ, तो उनके शब्दों में ज़्यादातर "रोता आया मरते की ख़बर लाया" वाली ख़बरें.

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सर्वे में 60 प्रतिशत लोग ऐसी ख़बरों की मांग कर रहे थे. टीआरपी में पता चला कुल 28,000 लोग चैनल देख रहे थे.

अब अगर आप खुलकर कह देते कि भाई साहब किम कारदाशियां की कहानियां और बेहतर तरीक़े से दिखाओ, हिलेरी क्लिंटन की पॉलिसी नहीं बिल क्लिंटन की प्रेम कहानियों पर एक सिरीज़ दिखाओ, मिशेल ओबामा के डिज़ाइनर कपड़ों पर हर हफ़्ते एक एपिसोड हो, मारधाड़, सेक्स-रोमांस से भरपूर ख़बरें हों, तो क्या चला जाता आपका. सात सौ लोगों की नौकरियां तो नहीं जातीं.

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तो मुझे आप सच-सच बता दें. पब्लिकली नहीं तो मेरे ट्विटर हैंडल @brajup पर ही बता दें क्योंकि कड़ाके की ठंड में मैं इस महीने के आख़िर में आयोवा जाऊंगा, फिर एक हफ़्ते में न्यू हैंपशायर जाऊंगा क्योंकि इन दोनों जगहों से अमरीकी चुनाव की औपचारिक तौर पर शुरुआत होगी- रिपब्लिकंस और डेमोक्रेट्स अपने-अपने उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया शुरू करेंगे.

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आप अगर सुनेंगे, देखेंगे, पढ़ेंगे तो आपके लिए 24/7 ख़बरें पहुंचाने में लगा रहूँगा. अगर नहीं तो मैं इस ठंड में ही सही कैनेडा का टिकट कटवाऊं. सनी लियोनी वहीं पैदा हुई थीं, उनके घर के बाहर तंबू लगाकर उनके बचपन से लेकर अब तक की एक-एक कहानी आपके सामने साल भर परोसता रहूँगा. और बैकग्राउंड में तस्वीरें वही, जिन्हें देखकर आपकी उंगलियां रिमोट से चिपक जाती हैं. आख़िर नौकरी तो करनी है न बॉस.

वैसे भी सुना है एक जाने-माने संपादक, जिनकी मैं तहे-दिल से इज़्ज़त करता हूँ, इन दिनों लियोनी जी के साथ वॉक और टॉक दोनों ही करने जा रहे हैं दिल्ली की ताज़ा-ताज़ा साफ़ हुई हवाओं में. उन्होंने आपसे कुछ सुना होगा तभी तो. तो मैंने क्या बिगाड़ा है. मुझे भी अपनी दिल की बात बता ही डालें, मैं भी सोने की चमक से शायद चमक जाऊँ.

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