शादी की उम्र तय करना 'ईशनिंदा के बराबर'

पाकिस्तान

पाकिस्तान में संसद की धार्मिक मामलों की समिति ने कम उम्र में शादियों के ख़िलाफ़ क़ानून में बदलाव को ग़ैर इस्लामी क़रार देते हुए इसे ख़ारिज कर दिया है.

कम उम्र में शादियों को रोकने के क़ानून में संशोधन का बिल सत्ताधारी पार्टी पीएमएल (एन) की सांसद मारवी मेमन ने रखा था.

उन्होंने बीबीसी उर्दू सेवा से बातचीत में कहा, "इस्लामी नज़रियाती काउंसिल ने मौजूदा क़ानूनों पर अपनी सिफ़ारिश देते हुए कहा है कि इस्लामी देश में शादी के लिए कम से कम उम्र तय करना ईशनिंदा के बराबर है."

पाकिस्तानी में इस्लामी नज़रियाती काउंसिल एक संवैधानिक संस्था है जो किसी भी क़ानून को शरियत की बुनियाद पर परखने के बाद सरकार को अपनी सिफ़ारिश देती है, लेकिन उन सिफ़ारिशों पर अमल करना ज़रूरी नहीं है.

लेकिन काउंसिल की आपत्ति के बाद मारवी ने अपना बिल वापस ले लिया है.

वो कहती हैं, "इस्लामी नज़रियाती काउंसिल को सिफ़ारिश देने का अधिकार है और पाकिस्तान एक इस्लामी मुल्क है. किसी मसले पर उनकी तरफ़ से अगर सख़्त रुख़ अपनाया जाता है तो फिर बात वहीं ख़त्म हो जाती है."

इस्लामी नज़रियाती काउंसिल के प्रतिनिधि ने संसदीय समिति को बताया कि इस्लामी परंपरा में कम उम्र में शादी को जुर्म करार देना ग़ैर इस्लामी है क्योंकि इस्लामी इतिहास में कम उम्र में निकाह की कई मिसालें मौजूद हैं.

पाकिस्तान में बाल विवाह रोकने के लिए लागू मौजूदा क़ानून के तहत लड़कों के लिए शादी की उम्र 18 साल और लड़कियों के लिए 16 साल है. मौजूदा कानून का उल्लंघन करने पर ज़्यादा से ज़्यादा एक महीने की क़ैद और एक हज़ार रुपए जुर्माना हो सकता है.

मारवी का कहना है कि उन्होंने मौजूदा क़ानून तोड़ने वालों के लिए सज़ा बढ़ाकर दो साल और जुर्माने की राशि एक लाख करने का प्रस्ताव रखा था ताकि कम उम्र में होने वाली शादियों की संख्या कम हो सकें.

उनका कहना है कि पाकिस्तान में कम उम्र में शादियों की वजह से प्रसव के दौरान मौतों की दर भी अन्य देशों से ज़्यादा है.

पीएमएल (एन) की सांसद ने बताया कि जब इस्लामी नज़रियाती काउंसिल ने बिल को ग़ैर इस्लामी बता दिया तो फिर संसदीय समिति ने भी उसे ख़ारिज कर दिया.

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