पाक मीडिया ने 'वही सवाल' अफ़ग़ानिस्तान से पूछे

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Image caption चारसद्दा विश्वविद्यालय, पाकिस्तान

पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में चारसद्दा यूनिवर्सिटी में हुए चरमपंथी हमले को लेकर वही मांगें और सवाल नजर आते हैं, जो भारत अकसर पाकिस्तान से करता है.

बस फर्क इतना है कि वहां ये मांगें पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान से कर रहा है.

'जंग' लिखता है कि इसमें कोई शक नहीं है कि इस हमले के पीछे तहरीके तालिबान पाकिस्तान के वो तत्व ज़िम्मेदार हैं, जो क़बायली इलाकों में सेना के अभियान की वजह से फ़रार हो कर अपने सरपरस्तों के पास अफ़ग़ानिस्तान पहुंच गए हैं.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तानी तालिबान के प्रमुख मौलाना फ़ज़लुल्लाह अफ़ग़ानिस्तान में हैं और पाकिस्तान की बार बार मांग के बावजूद उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती.

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तहरीके तालिबान के रिश्ते अफ़ग़ानिस्तान और भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों से बताते हुए अख़बार लिखता है कि अफ़ग़ान सरकार को ज़ुबानी नहीं, बल्कि असल मायनों में दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ पाकिस्तान से सहयोग करना चाहिए.

'औसाफ़' लिखता है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ ने अफ़ग़ान नेतृत्व से कहा है कि वे इस हमले में शामिल तत्वों को तलाशने, उन्हें निशाना बनाने और इंसाफ़ के कटघरे तक लाने में सहयोग करें. लेकिन ये साफ़ नहीं है कि अफ़ग़ान सरकार और उनके सहयोगी अमरीकी जनरलों ने क्या जवाब दिया.

अख़बार की टिप्पणी है कि दहशतगर्दी के स्रोत अफ़ग़ानिस्तान में हैं. जब तक अफ़ग़ानिस्तान की सरकार पाक-अफ़ग़ान सरहद पर मौजूद दहशतगर्दो के ठिकानों को तबाह नहीं करती, ये बुराई फैलती रहेगी.

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'एक्सप्रेस' लिखता है कि पाकिस्तान ने न जाने कितनी बार दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने और उन्हें पाकिस्तान को सौंपने की मांग की है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान ने कभी उनके ख़िलाफ़ कोई बड़ा ऑपरेशन नहीं चलाया.

अख़बार के मुताबिक़ इससे इस शक को बल मिलता है कि कुछ अफ़ग़ान अधिकारी दहशतगर्दों का साथ दे रहे हैं और अफ़ग़ान सरकार उन पर नरम है.

रोज़नामा 'इंसाफ़' के मुताबिक़ दहशतगर्दों के पास अफ़ग़ान 'सिम' कार्ड थे, देसी बम थे जो उन्होंने बाचा ख़ान यूनिवर्सिटी में हमले के दौरान इस्तेमाल किए थे. वे हमले के दौरान मोबाइल फ़ोन पर बात भी कर रहे थे.

अख़बार ने इस बारे में मिले और सबूतों को जहां अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने पेश करने को कहा है, वहीं पाक-अफग़ान सीमा पर सुरक्षा सख़्त करने की भी वकालत की है.

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'नवा-ए-वक्त' ने अमरीकी कांग्रेस की उस रिपोर्ट का जिक्र किया है जिसके मुताबिक़ पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों में इजाफ़ा भारत की सैन्य आक्रामता को रोकने के लिए कर रहा है.

अख़बार ने इस रिपोर्ट को सराहते हुए कहा है कि पाकिस्तान एक ज़िम्मेदार देश है. उसका रवैया परमाणु ताक़त बनने के बाद भी भारत की तरह विस्तारवादी नही है, बल्कि वो अपने पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते चाहता है.

अख़बार की टिप्पणी है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को सुरक्षित बनाने की कोशिशों को भी दुनिया में सराहा जा रहा है.

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वहीं 'जसारत' ने पाकिस्तान की राष्ट्रीय एयरलाइंस पीआईए को एक लिमिटेड कार्पोरेशन बनाने का बिल मंज़ूर होने पर संपादकीय लिखा है- पीआईए को बेचने की जल्दी.

अख़बार लिखता है कि ऐसा लगता है कि सरकार में बैठे लोगों को राष्ट्रीय संपत्ति बेचने की बहुत जल्दी है जबकि साल 2018 तक यही सरकार रहेगी.

अख़बार की टिप्पणी है कि राष्ट्रीय एसेंबली में मंज़ूर बिल ऊपरी सदन में ख़ारिज हो जाएगा, क्योंकि वहां सत्ताधारी पीएमएल (एन) की बहुमत नहीं है.

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Image caption रोहित वेमुला

रुख़ भारत का करें तो दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर 'जदीद अख़बार' की टिप्पणी है कि जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई तब से दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ हो रहा है.

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में इस तरह की अब तक आठ आत्महत्याओं का ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है कि दलितों और मुसलमानों को तरक्की से दूर रखने और ख़ास कर विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें पीछे धकेलने की कोशिशें हो रही हैं.

अख़बार ने इस मुद्दे पर विपक्ष को भी घेरा और लिखा है कि ये मौक़ा सियासत करने का बिल्कुल नहीं था. लेकिन कुछ राजनेताओं ने इस मौक़े को एक गनीमत समझ अपनी साख बेहतर बनाने में इसका इस्तेमाल किया.

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वहीं रोज़नामा 'सहाफ़त' ने शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में लिखे इस संपादकीय पर सख़्त ऐतराज जताया है कि मदरसों में उर्दू और अरबी की शिक्षा देने पर रोक लगे और वहां हिंदी और अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ाई लिखाई हो.

अख़बार लिखता है कि उर्दू सिर्फ़ मुसलमानों की भाषा नहीं है, बल्कि सभी समुदायों की ज़ुबान है जिससे उन्हें लगाव है. अरबी दुनिया भर के मुसलमानों की धार्मिक भाषा है और इसे संयुक्त राष्ट्र ने भी मान्यता दी है और इसे अपनी कामकाजी भाषाओं में जगह दी है.

अख़बार कहता है कि अचानक शिवसेना को हिंदी और अंग्रेजी से मुहब्बत क्यों हो गई जबकि अतीत में तो वो महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में मराठी भाषा के हक में आंदोलन करता रहा है.

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