शरणार्थी संकट से करोड़ों बनाने का खेल

  • 2 फरवरी 2016
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पिछले साल ग्यारह लाख लोग शरण पाने के लिए जर्मनी पहुंचे थे. एक ओर राजनेता इन शरणार्थियों से निपटने को लेकर बहस में उलझे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इस माहौल में पैसे कमाने में जुटे हैं.

राफ़ेल हॉक 22 साल के नौजवान हैं. वो ख़ासे पढ़े-लिखे हैं, दो भाषाएं जानते हैं. जर्मनी के म्यूनिख़ शहर में उनके परिवार का करोड़ों का व्यवसाय भी है.

म्यूनिख़ शहर के आसपास 15 तथाकथित सेवा गृह हैं. इन्हीं में से एक राफ़ेल हॉक की कंपनी का है, जो स्थानीय सरकार को पट्टे पर दिया गया है. यह एक हवादार हॉल है जिसका आकार ओलंपिक के स्विमिंग पूल के बराबर है.

इस हॉल में सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, और पश्चिमी अफ़्रीका से मध्य पूर्व और दक्षिण यूरोप को पार कर आए 300 लोग रह रहे हैं. वो यहां के गर्म कमरों में मुफ़्त में रहते हैं, दिन में तीन बार खाना खाते हैं और टेबल टेनिस खेलते हैं.

उन्हें जेब ख़र्च भी मिलता है और फिर वो शरणार्थियों से जुड़ी ख़बरों की प्रतीक्षा करते हैं.

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लेकिन हॉक यहां दान-पुण्य का कोई काम नहीं कर रहे हैं. कई व्यवसायियों की तरह वो भी जर्मनी के 'शरणार्थी उद्योग' का हिस्सा हैं.

शरणार्थियों को लेकर व्यवसाय चलाने वालों को यह नाम जर्मनी के अख़बारों ने दिया है. हॉक यहां 'खेल क्लब' मुहैया कराते हैं, और व्यस्तता के बीच कहते हैं कि इसके लिए पैसे चुकाने होते हैं. उनका अनुमान है कि दो साल में उनकी कंपनी की कमाई 3.7 करोड़ यूरो तक होगी.

हॉक कहते हैं, ''मैं कभी जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल से नहीं मिला, लेकिन वो भी बिना स्वार्थ के सेवा करने वाली तो नहीं दिखती हैं''.

ऐसा लगता है कि उन्हें इस अनुमान के बारे में पता है कि जर्मनी में नए आने वाले लोगों की ज़रूरत के सामान और सेवाओं की बढ़ती मांग से कम समय के लिए ही सही, वहां की अर्थव्यवस्था में सालाना 2 फ़ीसदी तक का उछाल आ सकता है.

इसके साथ ही भविष्य में जर्मनी को बड़ी संख्या में विदेशी कामगार मिल जाएंगे. वो एक बार पढ़ लिख गए, जर्मन भाषा सीख ली और उन्हें प्रशिक्षण मिल गया, तो वो देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो जाएंगे.

बर्लिन के एक व्यक्ति का कहना है कि शरणार्थियों को लेकर कोई आर्थिक विवाद नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक विवाद है.

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इसलिए इस बात पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए कि जर्मनी में व्यवसायिक हितों के समर्थन वाले 'टैबलॉयड' समाचार पत्र अब भी शरणार्थी योजना के पक्ष में है.

इसके अलावा कोलोन पुलिस भी इस बात को स्वीकार करने को राज़ी नहीं थी कि नए साल के मौक़े पर हुई घटना में शरण चाहने वालों की कोई भूमिका थी.

लेकिन जर्मन लोगों की उदारता और उनके सेवाभाव को कम करके आंकना भी उचित नहीं होगा.

वहां अब भी ऐसा देखने को मिल जाता है कि जर्मनी मानवीय आधार पर पनाह चाहने वालों के लिए एक ठिकाना है.

ऐसी ही एक महिला ने सीरिया के लोगों को हर रात अपने सोफ़े पर सोने के लिए बुलाया, जिनके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था. इसके अलावा उन्होंने एक रिटायर शिक्षक को भी पनाह दी जो अफ़्रीका के उप सहारा क्षेत्र होते हुए जर्मनी में दाख़िल हुए थे.

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अब भले ही राफ़ेल हॉक और ऐसी सेवा में लगे लोगों के बीच बड़े मतभेद हों, हॉक भले ही शरणार्थियों के लिए आवश्यक चीज़ें बेचकर लाखों कमा रहे हों. लेकिन उन्होंने सेवा गृह में रखे फूलदानों को ख़ुद ही रंगा. उनकी गर्लफ़्रेड कोसोवो की एक मुसलमान हैं और दो अफ़गान लोगों की शिकायत के बाद उन्होंने वादा किया था कि वो इन फूलदानों का रंग बदल देंगे.

हॉक का कहना है कि जर्मनी को न केवल शरणार्थियों की ज़रूरत है बल्कि अपने व्यवहार से अपना परिचय देने का उनके पास यह एकमात्र मौक़ा है.

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