'इन्हें लोकतंत्र मॉडल के स्टीकर की क्या ज़रूरत..'

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चीन, रूस, ईरान, मिस्र और सऊदी अरब जैसे देशों में तो लोग इसके आदी हैं कि सरकार पिरामिड की तरह हो, जिसकी चोटी पर एक शासक बैठा हो और उसकी इजाज़त के बिना पत्ता भी नहीं हिले.

लेकिन जो देश पश्चिमी लोकतंत्र का मॉडल अपनाए हुए हैं, वहाँ जब फ़ैसले एक आदमी या चार-पाँच लोगों की टीम लेती है और संसद और मंत्रिमंडल को उसी वक़्त बताया जाता है जब बहुत ही मजबूरी हो, तो मैं सोचता हूँ कि सत्ता अगर ऐसे भी चल सकती है तो उस पर पश्चिमी लोकतंत्र मॉडल का स्टीकर लगाने की क्या ज़रूरत है.

भारत के बारे में हम सुनते हैं कि पिछले चुनाव में पहली बार जनता ने पार्टी नहीं, नेता चुना है. अब मोदी सरकार एक कुतुबमीनार है और सारे रास्ते, फ़ाइलें और फ़ैसले वहीं जाते और वहीं से आते हैं.

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अगर इस स्टाइल की वजह से काम तेज़ करने में सहूलियत होती है, तो बहुत अच्छा है. मगर होता ये है कि कुतुबमीनारी सत्ता पर बराबर नज़र न रखी जाए तो फिर ये मॉडल एक पंथ में बदल जाता है, जहाँ ख़ुशामदियों को ही कहने-सुनने की इजाज़त होती है.

अब पाकिस्तान को ही लें, नवाज़ शरीफ़ भले ही दो-तिहाई बहुमत ले आएं या साधारण बहुमत. अंदाज़ तीसरी पारी में भी वैसे ही शाहाना है.

सब फ़ैसले चार-पाँच लोग करते हैं. प्रधानमंत्री सदन के नेता होने के बावजूद कभी-कभी दर्शन देते हैं. उन्हीं की पार्टी के कई सदस्य ऐसे हैं जो चुनाव में कामयाबी के बाद एक बार भी प्रधानमंत्री से हाथ नहीं मिला पाए.

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कहने को तो एक मंत्रिमंडल भी है, लेकिन उसकी आख़िरी बैठक छह महीने पहले हुई थी. जिन दिनों इमरान ख़ान के धरने ने सरकार को नाकारा करके रख दिया था, तब मियां साहब को संसद के अधिकार बुरी तरह याद आते थे.

लेकिन जैसे ही धरना ख़त्म, 'तू कौन, मैं कौन.' यही हाल पाकिस्तान के सबसे बड़े सूबे पंजाब का है. राज्य असेंबली मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ़ का चेहरा देखने को तरस गई.

सत्ता चार लोग चला रहे हैं- शहबाज़ शरीफ़, उनके बेटे हमज़ा शरीफ़, क़ानून मंत्री राणा सनाउल्लाह और एक ब्यूरोक्रेट.

मंत्रियों का बस एक ही काम है- पग़ार लो, गाड़ी में घूमो, दफ़्तर सजाओ और घर जाओ. पीपुल्स पार्टी वैसे तो खांसती भी जनता के नाम पर है. मगर सिंध प्रांत तक सिकुड़ जाने वाली सरकार भी आसिफ़ ज़रदारी के फीता से बंधी हुई है. वो दुबई में हैं तो सरकार भी दुबई, वो लंदन में हैं तो सरकार भी लंदन में.

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बताने को कायम अली शाह सिंध के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन असली मुख्यमंत्री ज़रदारी साहब का मोबाइल फ़ोन है.

इमरान ख़ान साहब ने नया पाकिस्तान बनाने के लिए चीख-चीखकर अपना गला बिठा दिया. मगर ख़ैबर पख्तूनख्वा के सारे फ़ैसले इस्लामाबाद के इमरान भवन में होते हैं.

शायद यही वजह है कि पेशावरियों ने मुख्यमंत्री परवेज़ खटक का नाम भोंपू हटक रख लिया है.

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बलूचिस्तान में मुख्यमंत्री को उतना ही अधिकार मिला हुआ है, जितना किसी फ़िल्मी सेट पर राजा का रोल करने वाले किसी भी बी क्लास एक्टर को. असली फ़ैसले क्वेटा छावनी में होते हैं. और जो फ़ैसले होने से बच जाते हैं, उनकी चिट्ठी प्रधानमंत्री भवन इस्लामाबाद से आती है.

बलूचिस्तान की सरकार, सरकार कम डाकख़ाना ज़्यादा है. ये भी सब मंज़ूर है अगर काम होता नज़र आए, लेकिन अफ़सोस काम भी आगे नहीं बढ़ रहा.

(इस ब्लॉग में लेखक ने निजी विचार व्यक्त किए हैं)

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