क्या दौड़ने वाले जूते कुछ ख़ास होते हैं?

  • 4 फरवरी 2016
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वर्ज़िश या एक्सरसाइज़ का चलन हाल के दिनों में काफ़ी बढ़ा है. लोगों में सेहत के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है और फ़िट रहने की चाहत भी. कसरत के बारे में कई तरह के मिथक हैं.

लेकिन विज्ञान के आधार पर जानें कसरत के बारे में. सात दिलचस्प बातें.

1. वर्ज़िश से आईक्यू बढ़ता है

ये धारणा काफ़ी हद तक सही है कि कसरत से बौद्धिक क्षमता बेहतर होती है. स्कूल पैदल चलकर जाने वाले बच्चों की एकाग्रता बेहतर होती है और इम्तहान में उनके अच्छे नंबर भी आते हैं. इसी तरह, कई बुज़ुर्ग जो हल्की कसरत करते हैं और चलते फिरते रहते हैं, उनमें दिमागी कमज़ोरी होने का ख़तरा अन्य बुज़ुर्गों के मुक़ाबले आधा होता है.

मतलब साफ़ है. जब आप वर्ज़िश करते हैं, तो आपके दिमाग़ तक ख़ून की सप्लाई भी ज़्यादा होती है. इससे दिमाग़ की तंत्रिकाओं का विकास होता है. ये हमारी बौद्धिक क्षमता बढ़ाता है और दिमाग के स्वस्थ रखने के लिए ज़रूरी होता है.

2. एक्सरसाइज़ के समय संगीत सुनने का असर

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बहुत से लोग वर्ज़िश के वक़्त संगीत सुनना पसंद करते हैं. उनका मानना है कि इससे थकान कम होती है.

दौड़ने वालों को वर्ज़िश के दौरान संगीत सुनने से ज़्यादा फ़ायदा होता है. टॉम स्टैफ़र्ड ने इस बारे में लेख लिखा है और बताते हैं कि इसका कारण हमारे दिमाग में है, मांसपेशियों में नहीं.

दिमाग का वो हिस्सा कॉर्टेक्स है जो मांसपेशियों को सिग्नल देता है.

संगीत सुनने से दिमाग से सिग्नल सप्लीमेंटरी मोटर एरिया को मिलता है और संगीत की लय-ताल उस प्रक्रिया में मदद करती है जिससे हमारा शरीर हरकत में आता है.

3. क्या क्रैम्प शरीर में नमक की वजह से होते हैं?

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ज़्यादा खेल-कूद करने वाले अक्सर मांशपेशियों की ऐंठन से परेशान होते हैं. इसका अंग्रेज़ी शब्द क्रैम्प काफ़ी चलन में है. बहुत बार हम सुनते हैं कि क्रैम्प्स की वजह से फलां खिलाड़ी को रेस्ट देना पड़ा. दूसरे खिलाड़ी को खिलाना पड़ा.

वैज्ञानिकों ने अमरीका के फ़ुटबॉल खिलाड़ियों में ऐसा देखा कि गर्मी में क्रैम्प ज़्यादा होते हैं. इससे इस धारणा को बल मिला कि पसीने के कारण शरीर में नमक की कमी हो जाने से ऐसा होता है. लेकिन, सर्द मौसम में एक्सरसाइज़ करने वालों को भी यही दिक़्क़त होती है. इसलिए ये दावा ग़लत साबित हुआ. मतलब साफ़ है. एक्सरसाइज़ की वजह से होने वाली ऐंठन, नमक की कमी का नतीजा नहीं. इसका गर्मी से कोई ताल्लुक नहीं.

वैज्ञानिक अब तक, नमक की कमी और क्रैम्प के बीच संबंध की सच्चाई नहीं तलाश पाए हैं. इसलिए सुझाव यही दिया जाता है कि कैम्प्स हों तो खाने में नमक बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है, इसके लिए स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़ ही करनी चाहिए.

4. क्या वर्ज़िश से पहले स्ट्रेचिंग ज़रूरी है?

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अक्सर लोग कहते हैं कि भारी भरकम एक्सरसाइज़ से पहले थोड़ा स्ट्रेचिंग कर लें. मतलब, हाथों-पैरों की जकड़न दूर कर लें. स्ट्रेचिंग, यानी हाथ पैर फैलाकर, थोड़ा झटककर, जकड़न दूर करना, ताकि आपका शरीर भारी वर्ज़िश के लिए तैयार हो सके.

दावा ये किया जाता है कि स्ट्रेचिंग करने से वर्ज़िश के दौरान चोटिल होने का ख़तरा कम हो जाता है. हालांकि ऑस्ट्रेलिया में हुई एक रिसर्च के मुताबिक़, ये बात सही नहीं. खेल-कूद या वर्ज़िश के दौरान मांसपेशियों का चोटिल होना ऐसी बात है, जिसका सिर्फ़ स्ट्रेचिंग या जकड़न से संबंध नहीं है. हालाँकि यदि आपको स्ट्रेचिंग करना अच्छा लगता है तो इसे करते रहने में कोई परेशानी नहीं है.

5. क्या दौड़ने वाले कुछ ख़ास जूते होते हैं?

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स्पोर्ट्स शूज़ बनाने वाली कंपनियां अक्सर दावे करती हैं कि उनके जूते से आपके लिए दौड़ना आसान होगा. आज बाज़ार में कई तरह के स्पेशल रनिंग शूज़ मिलते हैं. दुकानों पर आपको ऐसे एक्सपर्ट भी मिल जाएंगे जो सही जूता ख़रीदने में आपकी मदद करेंगे.

पर तमाम रिसर्च से ये बात साफ़ हो चुकी है कि रनिंग एक्सरसाइज़ में जूतों का कोई ख़ास रोल नहीं. आपको जो भी आरामदेह लगे, वो जूता पहनकर दौड़िए या एक्सरसाइज़ कीजिए. स्पोर्ट्स शूज़ बनाने वाली कंपनियां तो दावे करती रहेंगी.

6. हम 9 सेकेंड से कम समय में 100 मीटर दौड़ सकेंगे?

दौड़ने की एक्सरसाइज़ करने वाले अक्सर उसैन बोल्ट या कार्ल लुइस जैसे रिकॉर्ड बनाने के ख़्वाब देखते हैं. वैसे हर इंसान में इतना तेज़ दौड़ने की ताक़त नहीं होती. मगर, रनिंग के शौक़ीन चाहते हैं कि वो ऐसा ही कोई टारगेट हासिल कर सकें.

दौड़ने के मामले में एक बात तो पक्की है कि आपकी रफ़्तार इस बात पर टिकी होती है कि आप ज़मीन पर पैर रखते समय कितना ज़ोर ज़मीन पर लगाते हैं. वैसे, रफ़्तार का सीधा ताल्लुक हमारी पिंडलियों से होता है. अब आप उसैन बोल्ट या लुइस का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे या नहीं, ये तो पता नहीं. लेकिन इंसान ने अभी रफ़्तार के मामले में अपनी अपर लिमिट नहीं छुई है.

7. क्या कसरत करके डिप्रेशन से बच सकते हैं?

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अक्सर लोग दावे करते हैं कि डिप्रेशन से बचना हो तो वर्ज़िश करो, योग करो, दौड़ो, खेलो-कूदो. सेहत के बारे में रिसर्च जमा करने वाली अंतरराष्ट्रीय ग़ैर सरकारी संस्था कॉकरेन ने इस बारे में कई देशों से 30 ट्रायल किए हैं.

पता चला कि एक्सरसाइज़ आपको डिप्रेशन से बचने में बेहद मामूली तौर पर ही मददगार साबित होती है. वैसे सेहत के लिए वर्ज़िश अच्छी है. मगर ये सोचना कि डिप्रेशन से भी निपटने में मदद मिलेगी, ऐसा नहीं है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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