पाकिस्तानी देखेंगे यूट्यूब, उन्हें देखेगी सरकार

  • 5 फरवरी 2016
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पाकिस्तान में यूट्यूब पर प्रतिबंध ख़त्म करने का इंटरनेट यूज़र्स (विशेषकर संगीतकारों, कलाकारों और मुझ जैसे एक्टिविस्टों ने) ख़ुशी और जश्न के साथ स्वागत किया है.

साथ ही आज इंटरनेट, सूचना और लोकतांत्रिक विकास से जुड़े कुछ गहरे सवालों पर भी विचार करने की ज़रूरत है.

आज के आधुनिक समय में इंटरनेट का वही अर्थ है, जो गुटेनबर्ग प्रेस का यूरोपीय रेनेसॉं के लिए था.

सूचना की रफ़्तार इतनी तेज़ और इतने बड़े पैमाने और कम लागत पर बढ़ रही है कि यह एक ही पीढ़ी में न सिर्फ़ हमारे कारोबार के तरीक़े बदल देगा बल्कि मुमकिन है कि आज जिस दुनिया में हम रहते हैं, उसका आधारभूत विचार भी बदल डाले.

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हालांकि कुछ लोग मान सकते हैं कि इसमें अतिश्योक्ति है, ख़ासकर यह देखते हुए कि सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा कुत्ते और बिल्लियों की तस्वीरें साझा की जाती हैं.

बहरहाल इंटरनेट की बदौलत जितने बड़े पैमाने और तेज़ी से दुनिया के एक छोर से दूसरे पर सूचना आ-जा रही है, वह इतिहास में कभी नहीं हुआ.

और यही वजह है कि दुनियाभर में सरकारें सूचना के बहाव पर नियंत्रण लगाने की कोशिश कर रही हैं, और कभी-कभी यह ग़लत भी नहीं होता.

मिशेल फ़ूको ने एक बार कहा था, "सूचना ही शक्ति है". इसलिए शक्ति पर नियंत्रण के मूल में सूचना का नियंत्रण है. और इंटरनेट के अलावा कहीं भी और सूचना इतने बड़े पैमाने पर, तेज़ी से और मुक्त भाव से साझा नहीं की जा रही है.

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शायद इसीलिए जहां पाकिस्तान के दूरसंचार प्राधिकरण ने ख़ुशी से यूट्यूब पर प्रतिबंध हटाया है, वहीं उसने पाकिस्तान के लोगों को उपलब्ध सामग्री की निगरानी पर पकड़ और मज़बूत कर दी है.

पहले पाकिस्तान सरकार के पास यूट्यूब की सामग्री सेंसर करने का कोई तरीक़ा नहीं था. इसलिए उसे पूरी वेबसाइट पर ही रोक लगानी पड़ी थी.

अब यूट्यूब ने एक ख़ास डोमेन लॉन्च कर दिया है, जिसे यूट्यूब.पीके कहा जा रहा है. इसमें जिस सामग्री को विस्फोटक माना जाएगा, हालांकि इस शब्द को परिभाषित किया गया है, उसे पाकिस्तान दूरसंचार नियामक (पीटीए) सेंसर कर सकता है.

पिछले साल जब फ़ेसबुक पर प्रतिबंध लगा था (और भारी मांग के बाद शुरू किया गया था) तब भी वेबसाइट और पीटीए के बीच इसी तरह का समझौता हुआ था.

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हालांकि अभी पीटीए को किसी तरह की विध्वंसक सामग्री की समीक्षा के लिए यूट्यूब से आग्रह करना होगा (फ़ेसबुक के साथ पीटीए के अनुबंध की तरह). यह पूरी तरह साफ़ है कि गूगल के साथ पक्के समझौते के बाद ही प्रतिबंध हटाया गया है.

इसलिए अगर यूट्यूब पाकिस्तान सरकार के साथ समझौते का पालन करने में असफल रहता है तो इसे फिर सेंसरशिप का सामना करना पड़ सकता है.

मैं इंटरनेट यूज़र्स के लिए बोलने की पूरी आज़ादी की वकालत नहीं करूँगा. मैं मानता हूं कि लोगों को नफ़रत भरी बातों (हेट स्पीच), अपमान, लांछन, दूसरों के कामों की चोरी (साहित्यिक) और इंटरनेट के अपराध के लिए इस्तेमाल से सुरक्षा मिलनी चाहिए.

हालांकि ये अपराध विभिन्न देशों के क़ानूनों से परिभाषित होते हैं. सरकार का कंटेंट पर सेंसरशिप एकदम जुदा चीज़ है, जिसमें तानाशाही भरे बर्ताव का पूरा इतिहास है.

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इसमें पहले लोकतांत्रिक आंदोलन बेरहमी से कुचले गए हैं. कला के कई प्रकारों को राष्ट्रीय हितों के ख़िलाफ़ मान लिया गया है, जहां टीवी पर इतनी सख़्त सेंसरशिप लागू की गई थी कि एक समय महिलाओं को मुस्कराने तक की इजाज़त नहीं थी.

संक्षेप में पाकिस्तान में तानाशाही के इतिहास की वजह से इसमें बहुत कम शक रह जाता है कि भले ही यूट्यूब पर प्रतिबंध हटना जश्न की वजह हो सकता है पर यह बिना शर्त नहीं है.

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पूरी तरह निगरानी रहित और इंटरनेट तक खुली पहुँच के जिस दौर को पाकिस्तानी समाज ने कुछ वक़्त के लिए देखा और उसे 2006 से 2009 के बीच वकीलों के आंदोलन के दौरान सैन्य तानाशाही के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया, वह दौर अब ख़त्म हो चुका है.

अब आगे सोशल मीडिया पर बढ़ते सरकारी नियंत्रण का नया दौर है.

(डॉ. तैमूर रहमान पाकिस्तान के संगीतकार, राजनीतिक-सामाजिक एक्टिविस्ट हैं. वह लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेज़ में राजनीति शास्त्र पढ़ाते हैं और राजनीतिक संगीत बैंड 'लाल' के बैंड लीडर और प्रवक्ता हैं.)

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