तो क्या कंपनियों के डायरेक्टर रोबोट होंगे?

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रोबोट हमारे घरों की सफ़ाई कर सकते हैं, कारें बना सकते हैं. क़ानूनी दस्तावेज़ों की समीक्षा कर सकते हैं, होटलों में कमरे बुक कर सकते हैं और हमें शर्बत पेश कर सकते हैं.

लेकिन क्या हम उन्हें कंपनी के बोर्डरूम में डायरेक्टर्स के बीच बैठे हुए भी देखेंगे?

क्या बोर्ड में मेरे साथी डायरेक्टर्स का काम ख़त्म हो जाएगा और उनकी जगह रोबोट कंपनियां चलाएंगे?

क्या बोर्डरूम में विविधता पर जब चर्चा होगी तो ग़ैर-इंसानों की राय को भी उसमें शामिल किया जाएगा?

यह अभी दूर को कौड़ी लगती है. लेकिन 'सॉफ़्टवेयर का भविष्य और समाज' मुद्दे पर वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में चर्चा हुई.

डब्ल्यूईएफ़ की ग्लोबल एजेंडा काउंसिल में 800 एग्ज़ीक्यूटिव्स के बीच इस पर सर्वेक्षण हुआ.

उनमें से 45 फ़ीसदी ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस या एआई) वाली मशीनें 2025 तक कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टरों के बीच बैठने लगेंगी.

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यह बात पहली बार नहीं उठी है. पिछले साल एक इन्वेस्टमेंट ग्रुप यह कहकर सुर्ख़ियों में छा गया कि उसने अपने बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में एक एआई को नियुक्त किया है.

कंपनी ने कहा कि वह आंकड़ों का विश्लेषण करेगा ताकि उन्हें बायोटेक निवेशों के बारे में फ़ैसला लेने में मदद मिल सके.

लेकिन यह एक असली बोर्ड सदस्य के पूरे कार्यक्षेत्र को नहीं संभालेगा, यानी वह फ़ुल वोटिंग मैंबर नहीं होगा.

तो क्या हमें बोर्डरूम टेबल पर रोबोट्स के लिए जगह बना देनी चाहिए?

ऐसे कुछ तर्क हैं जिनके आधार पर मैं उन 55 फ़ीसदी लोगों में शामिल हूँ जो सोचते हैं कि कंपनी के डायरेक्टर्स की नौकरियों को कोई ख़तरा नहीं है, कम से कम रोबोट से तो नहीं.

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कंपनियों के बोर्डरूम में आंकड़ों का महत्व बढ़ रहा है. आंकड़े हमें फ़ैसले करने में मदद कर सकते हैं. रणनीति तैयार करते समय ये हमें बाज़ार के चलन, लोग क्या ख़रीद रहे हैं, क्या बेच रहे हैं, बोल रहे हैं और कर रहे हैं, इन सबके बारे में बताते हैं.

वेतन और मुआवज़ा समितियों में हम उन आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं जिनसे पता चलता है कि कंपनी और उद्योग में लोग क्या कमा रहे हैं और इस बारे में ट्रेंड क्या है.

ऑडिट समिति में और किसी किस्म के वित्तीय विश्लेषण के समय, हम आंकड़े देखते हैं कि ख़र्च और बचत कहां हो रही है और कहां नहीं.

रिस्क समिति तो जोखिम के आकलन के लिए अनगिनत कारणों का विश्लेषण करती है - वित्तीय, ढांचागत, रणनीतिक, क़ानूनी या कुछ और.

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दरअसल ऐसे बहुत कम क्षेत्र हैं जहां किसी न किसी सूरत में हमें आंकड़ों पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

लेकिन हम उन आंकड़ों को अपने फ़ैसले लेने में कैसे इस्तेमाल करते हैं यही हमें रोबोट से अलग करता है.

हम सूचना को तोलते हैं, जो कंपनी, उसके कर्मचारियों और उसके प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए ज़रूरी हैं. आंकड़ों के साथ रचनात्मकता, सहज ज्ञान और लकीर से हटकर सोचने की वजह से ही कोई कंपनी सफल बनती है.

लेकिन अगर सभी एक ही तरह के आंकड़ों का इस्तेमाल कर स्वचालित, गणित लगाकर फ़ैसले कर रहे होंगे, तो फिर अंतर तो ख़त्म ही हो जाएगा.

कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में बढ़त लकीर से हटकर सोचने और रचनात्मकता से मिलती है.

मैंने कई बार कहा है कि जिन भी जगहों में मैं गई हूँ, उनमें बोर्डरूम सबसे ज़्यादा 'मानवीय' स्थान है. लोग वहां अपने ज्ञान, तजुर्बे के आधार पर बनी सोच, भावनाओं और एजेंडा के साथ आते हैं.

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हां, इस वजह से कई बार बातचीत किसी ख़ास दिशा में जा सकती है और कई बार यह निर्णय लेने की क्षमता को कमज़ोर या बेहतर कर सकता है. लेकिन साथ ही कई पहलुओं पर अच्छी बहस होती है जिससे ज़्यादा ठोस परिणाम मिलते हैं.

यह सही है कि इंसान ग़लती कर सकते हैं और बोर्ड डायरेक्टर भी इस मामले में अपवाद नहीं. उदाहरण के लिए सीईओ को ख़ासा ज़्यादा पैसा मिलता है.

अगर रोबोट अन्य सीईओ के वेतन का विश्लेषण भी करेगा तो क्या वो सीईओ के वेतन देने के मामले में किसी और फ़ैसला पर पहुँचेगा?

क्या रोबोट नैतिकता के आधार पर या फिर ऐसे अन्य मूल्यों के आधार पर उनका वेतन बदल पाएगा?

मुझे लगता है कि अब भी इसके लिए मानव की ही ज़रूरत है. कम से कम ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम की ज़रूरत तो है, जो इन मूल्यों के आधार पर किसी इंसान ने बनाया हो.

मानवीय बोर्डरूम का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा लोगों की क्षमताओं का आकलन करना है. जो क़ागज़ पर लिखा है वह नहीं, बल्कि उस तरीक़े से जब लोग वास्तव में सामने बैठे हों.

ऐसे तो कोई भी कोई आइडिया पेश कर सकता है.

कोई भी निवेशक, विशेषकर वेंचर कैपिटलिस्ट आपको बताएगा कि आंकड़े और जमा-ख़र्च आपको किसी प्रस्ताव के बारे में एक हद तक ही बता सकते हैं.

किसी भी आइडिया को सफल बनाने के लिए, फिर वह चाहे नई कंपनी हो या फिर कंपनी की नई दिशा, सही लोग चाहिए होते हैं जो आयडिया को ज़मीन पर उतारें.

काम करने वाले सही लोग चाहिए होते हैं. इस फ़ैसले के लिए कि काम सही हो रहा है या ख़राब, कोई रणनीति काम करेगी या नहीं इसी से किसी के क़द का पता चलता है.

सीईओ या बोर्ड को यह तय करना होता है कि वह एक एक्ज़ीक्यूटिव पर भरोसा करे या नहीं. फ़ैसले बात पर निर्भर करता है कि वह व्यक्ति विश्वास योग्य नेता है या नहीं.

ऐसा फ़ैसला सिर्फ़ आंकड़ों पर निर्भर नहीं हो सकता है.

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बोर्डरूम सदस्यों को ऐसे मामलों पर भी फ़ैसला करना पड़ता है जिनके वो विशेषज्ञ नहीं होते.

ऐसे मामलों में फ़ैसला आंकड़ों और विश्लेषणों और अच्छे विवरण पर निर्भर करता है, लेकिन ये सबसे अच्छा विकल्प नहीं है.

साथ ही न तो आंकड़े पूरी तरह निरपेक्ष होते हैं और न हमेशा सही. दुनिया में कई जगह मतदान से साबित हो चुका है कि आंकड़े उतने ही अच्छे होते हैं जितना बढ़िया सवाल पूछा गया है और सच्चाई से जवाब दिया गया है.

एक मदद के रूप में आंकड़ों का इस्तेमाल अच्छा है. यक़ीनन बोर्डरूम में एक मददगार उपकरण के रूप में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अपनी जगह है. लेकिन एक सफल बोर्डरूम की पहचान इंसान को समझने की सूझबूझ, इंसान-इंसान के बीच का बारीक अंतर जानने और अच्छे फ़ैसले करने की क्षमता से होती है.

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हमें मानवीय सहज ज्ञान और मानवीय समझ के साथ ही आंकड़ों पर विश्वास करना चाहिए.

बोर्ड डायरेक्टरों के रूप में हमें जितनी ज़्यादा सूचनाएं और विश्लेषण संभव हों जुटाने चाहिए और भारी आंकड़ों का भी बोर्डरूम में महत्व है लेकिन मुझे नहीं लगता कि निकट भविष्य में मैं बोर्डरूम में किसी रोबोट के पास बैठूंगी.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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