कागज़ की किताबें म्यूज़ियम में ही मिलेंगी?

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साल 1993 का एक चर्चित क़िस्सा है जब मशहूर ब्रितानी लेखक पीटर जेम्स ने 'होस्ट' नाम का एक उपन्यास लिखा.

प्रकाशक कंपनी ने इसे क़िताब की शक्ल में नहीं, बल्कि फ़्लॉपी डिस्क पर छापा था. उपन्यास लंबा था, दो फ़्लॉपी डिस्क में था और इलेक्ट्रॉनिक नॉवेल था.

लेकिन जेम्स ने कभी सोचा भी नहीं था कि उसके इलेक्ट्रॉनिक नॉवेल का इतना मज़ाक़ बनेगा और लेखकों की ओर से इस प्रयोग का इतना विरोध होगा.

लोगों ने उन्हें 'क़िताबों का क़ातिल' तक करार दे दिया. सवाल उठे कि भला ये भी लिखने पढ़ने का कोई तरीक़ा हुआ.

मैं कई अख़बारों के फ़्रंट पेज पर छा गया. एक साहब तो इस नॉवेल का मज़ाक़ बनाने के लिए एक कम्प्यूटर और एक जेनरेटर लेकर समंदर किनारे बीच पर पहुँच गए. उनका मतलब था कि क्या अब समंदर के किनारे पढ़ने का लुत्फ़ यूं उठाया जाएगा !

तब, पीटर जेम्स ने एक भविष्यवाणी की थी, "मेरी मदद के बिना ही, नॉवेल तो पहले ही तेज़ रफ़्तार से मर रहा है. जैसे जैसे ई-बुक्स बढ़ने में आसान और सुविधाजनक होती जाएंगी, वैसे ही उनकी लोकप्रियता छपी हुई किताबों की तरह बढ़ती जाएगी. उनकी जगह लोग डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक किताबें ही पढ़ना पसंद करेंगे."

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नॉवेल 'होस्ट' को एक फ़्लॉपी पर छपे हुए 22 बरस हो चुके हैं. लेकिन बहस जारी है कि क्या ई-बुक्स छपी हुई क़िताबों को ख़त्म कर देंगी.

पिछले कुछ सालों में ई-बुक्स या डिजिटल क़िताबों का ख़ासा बड़ा बाज़ार खड़ा हो चुका है. अरबों का कारोबार हो रहा है. लेखक उपन्यासों का इलेक्ट्रॉनिक वर्ज़न लिख रहे हैं. लेकिन किताबें पढ़ने का सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ है. अभी भी लोगों को नई क़िताब के पन्नों के बीच से आने वाली प्रिंट की ख़ुशबू अपनी तरफ़ खींचती है.

जिस तेज़ी से लोग ई-बुक्स ख़रीद और पढ़ रहे हैं, वैसे में वाक़ई ये सवाल उठता है कि क्या आने वाले वक़्त में किताबें, गुज़रे दौर का हिस्सा बन जाएंगी?

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जैसे पहले लोग चट्टानों और पत्थरों पर शब्द उकेरते थे. लेकिन अब वो गुज़रे ज़माने की बात हो गई. तो क्या किताबें केवल म्यूज़ियम में दिखाई देंगी?

इन सवालों के जो जवाब मिलते हैं वो मामला साफ़ करने के बजाय और उसे और उलझा देते हैं. क्योंकि ई-बुक्स और असल क़िताबों की टक्कर के बारे में जो भी रिसर्च हुई है, वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंचाती.

अमरीका की मशहूर सर्वे कंपनी प्यू रिसर्च ने सर्वे में पाया है कि आज की तारीख़ में अमरीका की आधी आबादी के पास ई-बुक रीडर है. साल 2013 में क़रीब एक तिहाई अमरीकियों ने डिजिटल क़िताब कभी न कभी पढ़ी थी. लेकिन, इसी सर्वे में ये बात भी सामने आई कि पढ़ने का सबसे पसंदीदा तरीक़ा डिजिटल बुक रीडर नहीं, किताबें ही हैं.

पहली डिजिटल किताब कब आई, सही सही नहीं कहा जा सकता. कुछ लोग दावा करते हैं कि अमरीका में, पिछली सदी के 70 के दशक में प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग के तहत, ई-टेक्स्ट का प्रकाशन पहली बार हुआ. फिर 80 और 90 के दशक में हाइपर कार्ड के नाम से क़िताबों के इलेक्ट्रॉनिक वर्जन देखने को मिले.

बाद में पाल्म पायलट जैसे पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट बाज़ार में आए, जिन पर पढ़ा जा सकता था. सोनी और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों ने ई-रीडर बाज़ार में उतारे. इनसे इलेक्ट्रॉनिक किताबें पढ़ने का चलन तेज़ी से बढ़ा.

लेकिन, इनकी लोकप्रियता इतनी भी नहीं थी कि किताबें छापने वाले ख़तरा महसूस करें. ई-बुक बनाम क़िताबों की बहस में दिलचस्पी रखने वाले लोग कहते हैं कि 21वीं सदी की शुरुआत तक, बड़े प्रकाशक ई-बुक के ख़तरो को हंसी में उड़ा देते थे.

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लेकिन, उनकी बेफ़िक्री बहुत जल्द ख़त्म हो गई, जब साल 2007 में अमेज़न ने किंडल लॉन्च किया. इसने ई-रीडिंग की दुनिया में क्रांति ला दी. अमेज़न जैसी बड़ी कंपनी ने बाज़ार में ऐसा प्रोडक्ट उतारा था, जिसमें वो फ़ायदे से ज़्यादा ग्राहक बनाने में ज़ोर दे रहे थे.

किंडल के लॉन्च होने के तीन साल के भीतर, न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक किताबों का बाज़ार 1260 फ़ीसदी सालाना की रफ़्तार से बढ़ा. इस क्रांति की रफ़्तार और बढ़ी जब एप्पल ने आई पैड और आई बुक्स स्टोर लॉन्च किया. साथ ही बाज़ार में आया एंड्रॉयड ई-रीडर नूक. इस दौरान कई बड़े पब्लिशिंग हाउस दिवालिया हो गए, मसलन न्यूयॉर्क का बॉर्डर बुक्स.

लेकिन, इलेक्ट्रॉनिक क़िताबों के विस्तार की ये रफ़्तार पिछले दो सालों से काफ़ी धीमी हो गई है. प्यू रिसर्च का ताज़ा सर्वे कहता है कि लोगों ने डिजिटल किताबें पढ़नी कम कर दी हैं. अमरीकी पब्लिशर्स की एसोसिएशन कहती है कि ई-बुक रीडिंग में लोगों की दिलचस्पी घट रही है, या कम से कम बढ़ तो नहीं रही.

सवाल ये उठता है कि भविष्य में क्या होगा? ई-बुक्स रहेंगी या फिर किताबें. या फिर दोनों के अपने अपने शौक़ीन पढ़ने वाले रहेंगे. ई-बुक्स के समर्थक कहते हैं कि भविष्य तो उनका ही है. जैसे जैसे इलेक्ट्रॉनिक रीडर की क़ीमतें घटेंगी, ज़्यादा से ज़्यादा लोग इन्हें पसंद करेंगे, क्योंकि इनमें ज़्यादा किताबें स्टोर हो सकती हैं. इन्हें लेकर चलना और पढ़ना दोनों आसान है.

ई-बुक्स के समर्थक ये भी कहते हैं कि आने वाले वक़्त में डिजिटल रीडिंग का रूप-रंग भी बदलेगा. लेखक और पढ़ने वालों के बीच सीधी बातचीत हो सकेगी. शायद पढ़ने वाले, किसी नॉवेल का एंड ख़ुद सुझाएं, या फिर कुछ पैराग्राफ बदलने का सुझाव दें. ऐसा करना डिजिटल फॉर्म में ही मुमकिन होगा.

उनके मुक़ाबले, क़िताबों के पैरोकार कहते हैं कि उनका दौर इतनी जल्दी ख़त्म नहीं होने वाला. हां, किताबों की छपाई एक आर्ट का रूप भी ले सकती है. लोग पढ़ने से ज़्यादा शायद टेबल पर रखी किताबों को निहारना पसंद करें. किताबों को अपने घर में नुमाइश के लिए रखें. मगर, एकदम से ख़त्म नहीं होने वाली हैं किताबें.

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जानकार कहते हैं कि अगले 10 सालों में असल किताबों की जगह इलेक्ट्रॉनिक किताबें पढ़ने वाले ज़्यादा होंगे. हां, किताबों की छपाई शायद अगले 50 या 100 सालों तक जारी रहे, मगर, इन्हें पढ़ने वालों की संख्या लगातार कम होती जाएगी, ये तय है. पश्चिमी देशों में रेल से सफर के दौरान ज़्यादा लोग ई-रीडर लिए मिलेंगे.

ऐसा हुआ तो सवाल ये है कि क्या इससे इंसानियत को कोई बड़ा नुक़सान होगा? अमेरिका के मैसाचुसेट्स में टफ्ट यूनिवर्सिटी की मैरियन वूल्फ़ कहती हैं कि उन्हें वाक़ई फ़िक्र होती है ये सोचकर कि किताबें दुनिया से लुप्त हो जाएंगी. वूल्फ उम्मीद करती है कि ऐसा नहीं होगा.

वूल्फ और उनके साथियों ने डिजिटल रीडिंग के इंसान पर असर को लेकर रिसर्च की है. इसके नतीजे चौंकाने वाले रहे हैं. उनके मुताबिक़, इलेक्ट्रॉनिक रीडिंग का इंसान के दिमाग़ पर नेगेटिव असर होता है. ऐसे पढ़ने वाले लोग, कहानी के तमाम पहलुओं पर ठीक से ग़ौर नहीं कर पाते. कई बार तो उन्हें नॉवेल का प्लॉट भी याद नहीं रहता, ई-रीडिंग से ध्यान भंग होता है.

कई रिसर्च में ये दावा किया गया है कि किताबें पढ़ने वालों का दिमाग ज़्यादा स्थिर और एकाग्र होता है. वो कहानी को बेहतर तरीक़े से समझते हैं, उसका विश्लेषण कर पाते हैं.

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हालांकि ऐसी रिसर्च ही अभी शुरुआती दौर में हैं. इसलिए उस पर पूरी तरह से भरोसा करना ठीक नहीं. शायद, ई-रीडिंग बनाम क़िताबों की इस जंग में हमें और बेहतर रिसर्च का इंतज़ार करना चाहिए, क्योंकि कई रिसर्च के नतीजे वूल्फ के दावों के उलट भी रहे हैं.

मसलन, ई-क़िताबों से पढ़ने वाले बच्चों को सबक़ याद कराने में ज़्यादा आसानी हुई. रंग बिरंगे, ऑडियो-विज़ुअल रीडर की मदद से पढ़ाना अध्यापकों के लिए भी आसान रहा और बच्चों ने भी इसे पसंद किया.

नीदरलैंड्स की लीडेन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एड्रियाना बस ने किंडरगार्टन के क़रीब 400 बच्चों पर एक सर्वे किया. इन बच्चों को एनिमेशन वाली ई-बुक्स से सबक़ याद कराए गए. सर्वे में देखा गया कि आम किताबें पढ़ने वालों की तुलना में इन बच्चों ने तेज़ी से अपने सबक याद किए.

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वैसे, ई-रीडिंग के पैरोकार इसे मानवता के लिए वरदान मानते हैं. इलेक्ट्रॉनिक रीडर की मदद से उन देशों में लोगों को तालीम की रौशनीं पहुंचाई जा सकती है, जहां अभी बहुत से निरक्षर रहते हैं, जैसे भारत, पड़ोसी देश और अफ़्रीकी देश.

जानकार कहते हैं कि ई-बुक बनाम क़िताबों की बहस बेमानी है. दोनों की अपनी उपयोगिता है. इंसान की तरक़्क़ी में दोनों का अहम रोल है. ऐसे लोगों को उम्मीद है कि ई-रीडिंग से जहां पढ़ने वालों की तादाद बढ़ेगी, वहीं किताबें भी अज्ञान का अंधकार दूर करने में अपना रोल निभाती रहेंगी.

किताबों को लेकर बढ़ती हालिया दिलचस्पी ये इशारा करती है कि किताबों का दौर हाल-फिलहाल में ख़त्म नहीं होने वाला.

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