एशिया में अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की बाढ़ क्यों?

  • 20 फरवरी 2016
अंतरराष्ट्रीय स्कूल इमेज कॉपीरइट Thinkstock

हैरो, डलविक कॉलेज, मालवेर्न और वेलिंगटन के बाद इंग्लैंड का एक और टॉप ब्रांड बोर्डिंग स्कूल चीन में खुलने जा रहा है.

लेकिन बकिंघमशर का लड़कियों का बोर्डिंग स्कूल वायकॉम्बे एबे सितंबर में जब चीन में खुलेगा तो यह सिर्फ़ मूल स्कूल का प्रतिरूप भर नहीं होगा.

शंघार्ई के पास शांगज़ू में खुलने वाला वायकॉम्बे एबे सहशिक्षा वाला स्कूल होगा और इसमें चीनी और अंग्रेज़ी का मिला-जुला पाठ्यक्रम होगा जिसमें अंग्रेज़ी-स्टाइल का बोर्डिंग स्कूल का माहौल होगा.

अंतरराष्ट्रीय जीसीएसई (जनरल सर्टिफ़िकेट ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन) और ए-लेवल के साथ ही विद्यार्थियों को गणित में चीनी पाठ्यक्रम पढ़ना होगा. इसमें चीन में रह रहे ब्रितानी परिवारों के बच्चे ही नहीं पढ़ेंगे बल्कि 90 फ़ीसदी स्थानीय चीनी विद्यार्थी होंगे.

हॉंगकॉंग और ब्रूनेई में पढ़ा चुकीं वायकॉम्बे एबे की प्रधानाध्यापिका रियानॉन विकिन्सन कहती हैं, "हम लोग चीन में अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा की अतृत्प मांग को पूरा कर रहे हैं."

"लेकिन हम चीनी तरीक़ों और अंग्रेज़ी शैली की शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत के अनुरूप भी काम कर रहे हैं."

"वह पश्चिमीकरण नहीं चाहते हैं लेकिन वह पश्चिम के विश्वविद्यालयों में अप्लाई करना चाहते हैं."

किसी भी देश में पहले अंतरराष्ट्रीय स्कूल वस्तुतः विदेशियों का ठिकाना हुआ करते थे, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम कर रहे परिवारों के बच्चों को शिक्षा देते थे.

अब स्थानीय लोगों के ज़्यादा बच्चे अंतरराष्ट्रीय स्कूलों में जाते हैं जहां वह ए-लेवल की शिक्षा लेते हैं और ब्रिटेन से अंतरराष्ट्रीय डिग्री लेते हैं और अमरीका के अडवांस्ड प्लेसमेंट प्रोग्राम्स की पढ़ाई करते हैं. इससे उनके लिए ब्रितानी और अमरीकी विश्वविद्यालयों में प्रवेश का मौक़ा बन जाता है.

कुछ लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे अंतरराष्ट्रीय उच्च वर्ग के साथ प्रतियोगिता करें और भविष्य में करियर के लिए संबंध विकसित करें.

दूसरा मक़सद स्थानीय स्कूल व्यवस्था श्रमसाध्य और कठिन प्रतियोगिता के झंझट के बचना है जिसमें सीखने का मतलब रटकर परीक्षा पास करना भर है.

विकिन्सन कहती हैं, "लोग इस व्यवस्था के अपने बच्चों पर पड़ने वाले दबाव के बारे में चिंतित रहते हैं."

इंटरनेशनल स्कूल कंसलटेंसी के एक शोध के मुताबिक़ दुनिया भर में अब 8,000 स्कूल हैं जिनमें 42.60 लाख विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. इनमें सबसे तेज़ वृद्धि एशिया में हो रही है.

क़रीब एक दशक पहले हर देश में दर्जन भर स्कूल थे लेकिन अब थाईलैंड में ही अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम वाले 172 स्कूल हैं, जिनमें से आधे में इंग्लैंड का राष्ट्रीय पाठ्यक्रम लागू है.

मलेशिया में 142, जापान में 233 और सिंगापुर में- जहां विदेशियों के लिए स्थानीय स्कूलों में प्रवेश लेना मुश्किल है- क़रीब 63 हैं. म्यांमार भी एक प्रमुख ठिकाना बन रहा है- डलविक कॉलेज अगले साल वहां खुलेगा.

हॉंगकॉंग में जहां 2,000 में 92 ऐसे स्कूल थे अब 171 हैं.

बैंकॉक में रहने वाले आईएससी के निदेशक रिचर्ड गैसकेल के अनुसार स्थानीय समृद्ध परिवारों की ओर से इसकी मांग इतनी अधिक है कि हॉंगकॉंग के क़रीब-क़रीब सभी अंतरराष्ट्रीय स्कूलों में प्रवेश के लिए प्रतीक्षा सूची बन गई है.

सिर्फ़ दक्षिण कोरिया ही ऐसा है जहां ये घट रहा है और कुछ अंतरराष्ट्रीय स्कूल जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

लेकिन बड़ी ख़बर चीन से है. 15 साल पहले जहां एक दर्जन स्कूल थे, वहां अब क़रीब 530 अंग्रेज़ी-माध्यम के अंतरराष्ट्रीय स्कूल हैं जिनमें 3,26,000 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं.

आईएससी के एक शोध के अनुसार 2010 से 2014 के बीच शंघाई में ही अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम वाले स्कूल क़रीब 40 फ़ीसदी तक बढ़े हैं जिनमें 71,000 विद्यार्थी शिक्षा ले रहे हैं.

बीजिंग और शंघाई में ही चीन के आधे से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय स्कूल हैं और अब ये अन्य शहरों में भी फैल रहे हैं. किंगदाओ और चेंगडू में मालवर्न कॉलेज हैं. डलविक कॉलेज शंघाई और बीजिंग के अपने प्रमुख स्कूलों के बाद अब सुझ़ाउ और ज़ुहाइ में भी विस्तार कर रहा है. वेलिंगटन तियानजिन में पहुंच गया है.

एजुकेशन कंसलटेंसी बीई एजुकेशन ने वायकॉम्बे एबे के चीन में मध्यस्थता की है. इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी विलियम वैनबर्गेन कहते हैं, "स्थानीय अधिकारी, जैसे कि जियांगसू प्रांत में हैं, जानते हैं कि अगर वह वायकॉम्बे एबे जैसे शीर्ष ब्रांड के स्कूलों को अपने इलाक़े में खोलेंगे तो वह ज़्यादा लोगों को यहां आकर्षित कर सकेंगे."

चीन में 10 लाख से भी कम विदेशी हैं. शंघाई में रहने वाले वैनबर्गेन कहते हैं, "लेकिन स्थानीय, बढ़ते चीनी मध्यवर्ग का बाज़ार बहुत विशाल है. चीन ब्रांड को पसंद करता है."

इन स्कूलों में खेल की और अन्य शानदार सुविधाएं दी जाती हैं जो स्थानीय स्कूलों में नहीं दी जाती, जिनमें परीक्षाओं पर ज़्यादा धअयान केंद्रित होता है.

उनका अनुमान है कि क़रीब "100 ब्रितानी स्कूल चीन जाने पर विचार कर रहे हैं."

डलविक कॉलेज इंटरनेशनल के चीन में छह स्कूल हैं, जो दो तरह के स्कूल चलाता है.

इसके चार अंतरराष्ट्रीय स्कूल हैं जिनमें सिर्फ़ विदेशी नागिक ही प्रवेश ले सकते हैं.

लेकिन सुज़ोउ और ज़ुहाइ में इसके चीनी साझीदारों के साथ यह दो स्कूल चलाता है जिसमें मुख्य रूप से स्थानीय लोगों को प्रवेश दिया जाता है. दोनों ही स्कूल आईजीसीएसई और ए-लेवल की शिक्षा देते हैं.

चीनी अधिकारी अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम पढ़ रहे छोटे विद्यार्थियों पर सख़्त नियंत्रण रखती है.

आईएससी के गैसकेल को यक़ीन है कि यह प्रतिबंध जारी रहेंगे. वह कहते हैं, "वह नहीं चाहते कि बच्चों को ग़लत नज़रिए से इतिहास पढ़ाया जाए और वह मानविकी को लेकर भी काफ़ी सनकी हैं."

लेकिन विदेशी पाठ्यक्रम पढ़ रहे 15 साल से ज़्यादा उम्र के बच्चों को लेकर अधिकारी ज़्यादा निश्चिंत लगते हैं. यह विद्यार्थियों को विदेशों के शीर्ष विश्वविद्यालयों में जाने की संभावनाओं का दोहन करने देते हैं क्योंकि इससे प्रतिष्ठित स्कूलों को लुभाने में मदद मिलती है.

इसके साथ ही वह अलग-अलग क्वालिटी वाले कथित 'अंतरराष्ट्रीय धारा' के स्थानीय स्कूलों पर नियंत्रित कर रहे हैं जो पिछले कुछ सालों में कुकुरमुत्तों की तरह उभर आए हैं.

शंघाई में डलविक कॉलेज इंटरनेशनल (डीसीआई) के लॉरेंस कुक कहते हैं, "चीन में शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में जाने की इच्छा 10 साल में सबसे ज़्यादा है और अंतरराष्ट्रीय स्कूलों को बहुत अच्छी शिक्षा का एक सुरक्षित ज़रिया समझा जाता है."

"चीन और एशिया में दूसरी जगह जहां भी ब्रितानी बोर्डिंग स्कूल चल रहे हैं उनकी सफलता की दर बहुत अच्छी है और माना जाता है कि वह बहुत अच्छी तरह संचालित होते हैं."

चीन के नव धनाढ्य अंतरराष्ट्रीय स्कूलों को अलग तरह की शिक्षा के लिए भी चाहते हैं.

हॉंगकॉंग और मकाउ के नज़दीक ज़ुहाइ में स्थित बोर्डिंग स्कूल डलविक के प्रमुख कैंपबेल डगलस कहते हैं कि मां-बाप राष्ट्रीय कॉलेज प्रवेश परीक्षा 'गाओकाओ' के लिए अपने बच्चों को तैयार करने से ज़्यादा कुछ चाहते हं.

"चीन में धीरे-धीरे यह चेतना आ रही है कि गाओकाओ बच्चों का अकादमिक के अलावा और कोई विकास नहीं होने देता."

लेकिन अक्सर स्थानीय स्कूल व्यवस्था को छोड़ने के लिए शुरुआत में ही फ़ैसला करना होता है जिसके लिए भरोसे की ज़रुरत होती है क्योंकि वापस जाने का रास्ता आसान नहीं होता.

और अभिभावक अंग्रेज़ी में पारंगत तो करवाना चाहते हैं लेकिन अपनी संस्कृति को छोड़ना भी नहीं चाहते.

वैनबर्गेन कहते हैं, "चीनी अभिभावक चाहते हैं कि उन्हें दोनों तरफ़ के फ़ायदे मिलें, लेकिन मूल रूप से चाहते हैं कि उनके बच्चे चीनी ही बने रहें."

यह एक नया हाइब्रिड चलन विकसित कर रहा है, जो पूर्व और पश्चिम को मिला रहा है.

चीन और सिंगापुर में डलविक कॉलेज अंग्रेज़ी और मंदारिन में पढ़ाता है, जो न सिर्फ़ स्थानीय लोगों की मांग के अनुरूप है बल्कि अन्य एशियाई देशों जैसे कि ताइवान, सिंगापुर और मलेशिया की इच्छापूर्ति भी करता है.

वेलिंगटन कॉलेज का कहना है कि शंघाई में उसकी नई शाखा में दो भाषाओं में पाठ्यक्रम होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार