माओ के चीन में आम का जुलूस निकलता था !

पचास साल पहले चीन ने सांस्कृतिक क्रांति के उथल-पुथल का दशक देखा. इस दौर में चीन एक अजीब से उन्माद का शिकार था.

ये उन्माद आम को लेकर था. बेंजामिन रैम बता रहे हैं कि कैसे उस वक्त में इस फल को लेकर एक दीवानगी थी और ये फल चेयरमैन माओ की सनक को बढ़ाने का एक माध्यम था.

1966 में माओ ने 'प्रतिक्रियावादी' ताकतों के ख़िलाफ़ विद्रोह करने के लिए रेड गार्ड छात्रों का अह्वान किया था.

उनका मकसद समाज को बुर्जुआ तत्वों और परंपरागत सोच से मुक्त करना था. लेकिन 1968 की गर्मियों में देश सत्ता की लड़ाई में फंस गया.

माओ ने इसके लिए बीजिंग स्थित चिंग्हुआ यूनिवर्सिटी में 30 हज़ार मज़दूरों को 'लाल किताब' जंतर के रूप में दी.

छात्रों ने हार मानने से पहले उनपर एसिड और बरछी से हमला किया जिसमें पांच लोग मारे गए और 700 से ज्यादा लोग जख्मी हो गए.

माओ ने तब 40 आम देकर मज़दूरों का शुक्रिया अदा किया जो उन्हें पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने दिए थे.

इस वाकये को इतिहासकार फ्रेडा मर्क सिलसिलेवार ढंग से बताते हैं.

उनका कहना है, "उस वक्त उत्तरी चीन में किसी को भी आम के बारे में पता नहीं था. इसलिए सारी रात मज़दूर आम को देखते रहे और सूंघते रहे. वो इस जादुई फल को देखकर अचरज में थे."

मर्क का कहना है, "बीजिंग में कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि माओ ने इस अराजक हिंसा में सीधे तौर पर दखल दिया था और आम उस सांस्कृतिक आंदोलन के अंत का प्रतीक था."

चिंग्हुआ यूनिवर्सिटी पर कब्जा जमाने के लिए गए एक मज़दूर चांग कुई का कहना है कि माओ के आम ने बड़ी बहस को खड़ा कर दिया था.

उनका कहना है, "फ़ौज का प्रतिनिधि अपने दोनों हाथ में आम लेकर फैक्टरी आया. हमने उनसे पूछा कि क्या करना है इसका. इसे खाना है या बचा कर रखना है. हमने आख़िरकार उसे बचाकर रखने का फ़ैसला लिया."

मज़दूरों से उम्मीद की जाती थी कि वे इस पवित्र फल को पूरे सम्मान के साथ लेंगे.

बीजिंग के मशीन टूल प्लांट की एक कामगार वांग शियाओपिंग बताती हैं, "मज़दूरों का प्रतिनिधि असली आम को फैक्टरी से एयरपोर्ट तक ड्रम पीटते हुए एक शानदार जुलूस में ले गया. सड़क के दोनों ओर लोगों ने खड़े होकर आम के इस जुलूस को देखा था. "

उनमें से जब एक आम सड़ने लगा तो मज़दूरों ने उसे छीलकर उसके गूदे को पानी में उबाल दिया और तब वो पवित्र बन गया. सभी मज़दूरों ने उसे एक-एक चम्मच पिया.

आम ने पवित्र जुलूस की शक्ल में पूरे चीन की यात्रा की. रेड गार्ड ने पवित्र स्थलों को तो तोड़ा लेकिन धार्मिक प्रवृति को बदलना इतना आसान नहीं था.

जल्दी ही आम एक गहरी श्रद्धा की चीज बन गई.

चीन में खाने-पीने की चीजों का प्रतीकों से जुड़ाव का लंबा इतिहास रहा है. शायद इसने ही माओ के इस उपहार को अनावश्यक रूप से बढ़ावा दिया.

बहुत कम लोगों को पता होगा कि माओ फल पसंद नहीं करते थे. और उन्हें यह भी नहीं पता था कि माओ ने उपहार में पाई चीज को सीधे उन्हें दे दिया है.

चीन में उपहार को फिर से किसी और को देने की परंपरा रही है. पश्चिम के समाज में इसे अच्छा नहीं माना जाता लेकिन चीन में इसे अच्छी नज़र से देखा जाता है.

आम चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रोपेगेंडा का भी हिस्सा रहा है.

अब बीजिंग में आम एक साधारण फल की तरह है. वांग जब चाहे तब 'गोल्डेन मैंगो' जूस खरीद सकती हैं.

वो कहती हैं, "आम को लेकर जो उत्सुकता थी अब वो नहीं रही. अब यह कोई पवित्र चीज नहीं रह गई है. यह आम चीज की तरह हो गया है. नौजवानों को इसके इतिहास के बारे में नहीं पता है. लेकिन हमारे जैसे लोगों के लिए जब कभी भी आम की बात होती है तो दिल में एक दूसरा ही अहसास भर जाता है."

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