एक लड़की जिसने शादी को 'ना' कहा

बलकिसा चाइबू

बलकिसा चाइबू ने डॉक्टर बनने का ख़्वाब देखा था, लेकिन जब वो 12 बरस की थी तो ये जानकार हैरान रह गई कि उसे उसके चचेरे भाई की दुल्हन बनाने का वादा किया गया है.

उसने अपने अधिकारों के लिए लड़ने का फ़ैसला किया- यहाँ तक कि अपने परिवार को कोर्ट तक लेकर गई.

बलकिसा याद करती हैं, “मैं शाम को लगभग छह बजे स्कूल से घर लौटी और मां ने मुझे बुलाया. उन्होंने घर आए मेहमानों में से एक की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि वो तुमसे शादी करेगा.”

वो कहती हैं, “मैंने सोचा कि वो मज़ाक़ कर रही हैं, और उन्होंने मुझसे कहा ‘जाओ और अपने बाल धोओ’. तब मुझे एहसास हुआ कि वो गंभीर हैं.”

निजेर की ये किशोरी हमेशा से ही महत्वाकांक्षी थी.

उन्होंने कहा, “जब मैं छोटी थी, मैं डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी. लोगों की देखभाल करना, सफ़ेद कोट पहनना और लोगों की मदद करना.”

लेकिन उसके पिता के साथ पड़ोसी देश नाइजीरिया से लौटा उसका चचेरा भाई उसके इस मक़सद को असंभव बना रहा था.

बलकिसा ने कहा, “उन्होंने कहा कि यदि तुम उससे शादी करोगी तो आगे नहीं पढ़ सकोगी. मेरे लिए पढ़ाई मेरा जुनून था. मुझे पढ़ाई बहुत पसंद थी. तभी मुझे एहसास हो गया था कि मेरे साथ उसका रिश्ता नहीं चलेगा.”

निजैर में लड़कियों की कम उम्र में शादी करने का प्रचलन है- दुनिया में यहाँ बाल विवाह की दर सबसे अधिक है.

निजैर में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की प्रतिनिधि मोनिक़ क्लेस्का कहती हैं, “यहाँ सोच इस तरह की है- मेरे बहुत से बच्चे हैं और यदि मैं उनमें से एक का विवाह कर पाई तो मुझे एक कम बच्चे को खाना खिलाना पड़ेगा.”

बलकिसा के माता-पिता की पाँच बेटियां थी, इस लिहाज़ से बलकिसा की शादी उसके चचेरे भाई से करने से परिवार पर आर्थिक बोझ कम होता.

लेकिन निजैर में बाल विवाह की परंपरा की एक वजह और है और वो है समाज में ये मान्यता कि इससे विवाहित न होते हुए गर्भवती होने के जोखिम को ख़त्म करना.

बलकिसा की मां हदिजा अलमहमूद कहती हैं, “इन दिनों कुछ बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं होती. अगर उनकी कम उम्र में शादी नहीं की जाती तो वे परिवार के लिए शर्म की वजह बन सकती हैं.”

बहरहाल, बलकिसा ने स्कूल में कड़ी मेहनत जारी रखी. वो सुबह तीन बजे उठ जातीं, लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, चचेरे भाई की शादी उनकी पढ़ाई में बाधा बनने लगी.

और फिर एक दिन जब वो 16 बरस की थी, सूटकेस और दुल्हन का जोड़ा उनके घर तक पहुँच गया.

बलकिसा बताती हैं, “मेरे दिल टूट सा गया था, क्योंकि मैं अपने सपनों को पूरा करने के लिए लड़ रही थी और ये लोग मेरी राह में रोड़ा बने थे.”

उसकी मां को अपनी बेटी की इस पीड़ा का एहसास था, लेकिन महिला होने के नाते वो असहाय थी.

इसलिए बलकिसा ने अपने पिता से बात करने का फ़ैसला किया. उसने पिता से कहा कि वो शादी के लिए तैयार है, लेकिन वो छुट्टियों में पति से मिलने जाएगी जब तक कि वो पढ़ाई पूरी न कर ले.

लेकिन निजैर के तुआरेग समुदाय की परंपराएं फिर आड़े आ गईं. इन परंपराओं के अनुसार बच्चों के मामले में अधिकार करने का फ़ैसला पिता से अधिक उसके बड़े भाई को होता है. पिता भी बड़े भाई की इच्छा के आगे कुछ न बोल पाए.

Image caption बलकिसा के प्रिंसिपल मौमुनी हारुना ने उन्हें एक एनजीओ के पास भेजा

हारकर बलकिसा ने अपने स्कूल के प्रधानाचार्य से सहायता मांगी. प्रधानाचार्य ने उसे एक ग़ैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर जूडिशियल असिस्टेंस एंड सिविक एक्शन के पास भेज दिया.

कोर्ट में मामला पहुँचा और बलकिसा के चाचा ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इंकार कर दिया. बलकिसा ने सोचा कि मामला सुलझ गया है और उसने ग़लतफ़हमी का तर्क देते हुए मुक़दमा वापस ले लिया.

लेकिन जब बलकिसा घर लौट गई तो उसके चाचा ने उसे जान से मारने की धमकी दे डाली.

बलकिसा ने कहा, “उन्होंने कहा कि भले ही मुझे उन्हें एक बैग में डालकर नाइजीरिया ले जाना पड़े, लेकिन लेकर जाएंगे.”

मजबूरन बलकिसा को महिला शिविर में शरण लेनी पड़ी.

जेल जाने से डर से बारात वापस नाइजीरिया लौट गई और एक हफ़्ते बाद बलकिसा घर लौट सकी.

बलकिसा कहती हैं, “जब मैंने स्कूल की ड्रेस पहनी तो मुझे लगा कि मुझे नया जीवन मिल गया है.”

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