'एफ़16 की छोटी सी डील भारत को बर्दाश्त नहीं?'

इमेज कॉपीरइट Getty

भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की बातचीत में हो रही देरी और पठानकोट हमले के साथ-साथ एफ़-16 विमानों की पाक-अमरीका डील की पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में ख़ासी चर्चा है.

इस सिलसिले में रोज़नामा 'दुनिया' ने पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त गौतम बम्बाव्ले के इस बयान का ज़िक्र किया है कि विदेश सचिवों की बातचीत से पठानकोट हमले की जांच में प्रगति की शर्त नहीं जुडी है.

अख़बार कहता है कि भारतीय उच्चायुक्त का बयान स्वागतयोग्य है लेकिन सवाल ये है कि बातचीत कब होगी?

अख़बार के मुताबिक़ दूसरी बात ये है कि एफ़-16 विमानों को लेकर पाकिस्तान और अमरीका की एक छोटी सी डील तो भारत को बर्दाश्त हुई नहीं, तो बातचीत की मेज़ पर बैठकर भी इस सिलसिले में कितनी प्रगति की उम्मीद करें?

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption मोदी के पाकिस्तान दौरे से बाद हुए पठानकोट हमले के बाद दोनों देशों के विदेश सचिवों की वार्ता टल गई थी

फिर भी अख़बार का सुझाव है कि 'बातचीत होनी चाहिए क्योंकि बातचीत होगी तो कोई न कोई आगे का रास्ता निकाला जाएगा.'

वहीं 'एक्सप्रेस' कहता है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान से इशारा मिलता है कि विदेश सचिवों की बातचीत के लिए बैक डोर डिप्लोमैसी चल रही है और बातचीत जल्द होने की उम्मीद है.

अख़बार लिखता है कि पठानकोट हमले को लेकर जांच जारी है और इस बारे में एक केस दर्ज करके पाकिस्तान ने साबित किया है कि भारत से हर संभव सहयोग किया जा रहा है.

अख़बार लिखता है कि आगामी बातचीत का एक स्पष्ट एजेंडा होना चाहिए और अगर ये अतीत की तरह नुमाइशी रही तो वक़्त की बर्बादी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा.

उधर रोज़नामा 'पाकिस्तान' ने लिखा है कि लड़ाकू विमान बनाने वाली अमरीकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने भारत में एफ़-16 विमान बनाने का कारखाना लगाने की पेशकश की है.

इमेज कॉपीरइट US STATE DEPARTMENT
Image caption भारत ने अमरीकी राजदूत राहुल रिचर्ड वर्मा को तलब कर विरोध जताया

अख़बार लिखता है कि जब पिछले दिनों अमरीका ने पाकिस्तान को आठ एफ़-16 विमान बेचने का फ़ैसला किया तो भारत ने आसमान सिर पर उठा लिया था हालांकि अमरीका ने उसके विरोध को ख़ारिज कर दिया.

अख़बार की राय है कि भारत में एफ़-16 बनाने के कारखाने की पेशकश से साबित होता है कि भारत बड़ी संख्या में इन विमानों को ख़रीदना चाहता है और अपने यहां सैन्य साजोसामान बनाने वाली फैक्ट्रियों की तादाद भी बढ़ाना चाहता है.

अख़बार सवाल करता है कि अगर योजना के मुताबिक़ भारत में एफ़-16 बनाने का कारखाना लग जाता है तो क्या इससे क्षेत्र में हथियारों की दौड़ में इज़ाफ़ा नहीं होगा?

दूसरी तरफ़ एक जवाबदेही आयोग बनाने की नवाज़ शरीफ़ सरकार की योजना को लेकर भी पाकिस्तान के कई अख़बारों ने संपादकीय लिखे.

इमेज कॉपीरइट AFP

'जंग' लिखता है कि पाकिस्तान में अभी जो राष्ट्रीय जबावदेही ब्यूरो (नैब) काम कर रहा है वो एक स्वायत्त संस्था है और उसे संसद का सरक्षण प्राप्त है.

अख़बार के मुताबिक नैब का काम भ्रष्टाचार में शामिल लोगों की जवाबदेही तय करना है लेकिन कुछ शियाकतों की वजह से इस पर भी ऊंगलियां उठनी शुरू हो गईं.

अख़बार कहता है कि पाकिस्तान में आम तौर पर माना जाता है कि जवाबदेही तय करने का तंत्र बहुत कमजोर है ऐसे में भ्रष्टाचार के मुल्ज़िम साफ़ बच निकलते हैं और नज़ला कमज़ोर लोगों पर पड़ता है.

अख़बार लिखता है कि भ्रष्टाचार तभी ख़त्म होगा जब बिना किसी भेदभाव के दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो.

रुख़ भारत का करें तो 'जदीद ख़बर' ने जेएनयू विवाद को लेकर देशद्रोह बनाम देशभक्ति पर जारी बहस पर संपादकीय लिखा है- अलग राय रखने की सज़ा.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption देशद्रोह के आरोप में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष की गिरफ़्तारी का तीखा विरोध हुआ

अख़बार के मुताबिक अफ़सोस की बात है कि केंद्र में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी ने देशभक्ति को ऐसा मुद्दा बना दिया है जिससे लगता है कि जो बीजेपी और आरएसएस का विरोध करेगा उस पर ग़द्दार होने का लेबल लगा दिया जाएगा.

अख़बार ने जम्मू कश्मीर में पीडीपी से बीजेपी के गठबंधन पर सवाल उठाया है.

अख़बार लिखता है कि सरकार बनाने की बात आती है तो बीजेपी इस बात को भूल जाती है कि ये वही पीडीपी है जो संसद पर हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु को 'शहीद' का दर्जा देती है.

वहीं 'हमारा समाज' ने हरियाणा में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे जाटों पर लिखा है कि आरक्षण के नाम पर एक बार फिर हरियाणा में माहौल गर्म है.

अख़बार लिखता है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के प्रस्ताव को जाटों ने खारिज कर दिया और जल्द कोई हल नहीं निकला तो हालात बदतर हो सकते हैं.

अख़बार की राय है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने नौ राज्यों हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में जाटों को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण देने के फैसले को खारिज कर चुका है तो अब इसकी मांग करने का क्या मतलब है?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार