जब ताज उछाले गए...ईरान की क्रांति

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Image caption अयातुल्ला रोहिल्ला ख़ुमैनी

1 फ़रवरी, 1979 की शाम पेरिस के द गाल हवाईअड्डे से ख़ास तौर से चार्टर किए गए बोइंग 747, ‘द मे फ़्लावर’ ने तेहरान के लिए टेक ऑफ़ किया. बोइंग पर सवार थे ईरान के शाह के खिलाफ़ हो रही क्राँति के नायक अयातुल्ला रोहिल्ला ख़ुमैनी.

16 वर्ष तक पहले इराक़ और फिर फ़्राँस में निर्वासन में रहने के बाद ख़ुमैनी अपने वतन लौट रहे थे.

मिस्र के मशहूर पत्रकार मोहम्मद हैकाल अपनी किताब ‘द रिटर्न ऑफ़ अयातुल्ला’ में लिखते हैं, "विमान में बैठते ही ख़ुमैनी उसके ऊपरी हिस्से में चले गए. उन्होंने पहले वज़ू किया, नमाज़ पढ़ी, थोड़ी दही खाई और विमान के फ़र्श पर तोशक बिछा सोने चले गए. विमान के निचले हिस्से में उनका दल और करीब 100 पत्रकारों का समूह बैठा हुआ था. सुबह पाँच बजे अयातुल्ला की आँख खुली. जैसे ही विमान ने ईरान की वायु सीमा में प्रवेश किया एबीसी न्यूज़ के संवाददाता पीटर जेनिंग्स ने उनसे पूछा कि ईरान में वापस लौटते हुए उन्हें कैसा लग रहा है. अयातुल्ला ने जवाब दिया, ’हिची’ यानी कुछ भी नहीं. उनके फ़ारसी अनुवादक सादेग ग़ोतबज़ादा ने आश्चर्य से पूछा, ‘हिची?’ खुमैनी ने फिर ज़ोर दे कर कहा, ‘हिच अहसासी नदरम.’ यानी मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा."

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Image caption ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अपनी पत्नी के साथ

शाह की बादशाहत का अंत बहुत तेज़ी से हुआ. 16 जनवरी, 1979 को शाह ने आख़िरी बार ईरान से उड़ान भरी. वो मिस्र जा रहे थे.

वैसे उनकी ओर से नियुक्त प्रधानमंत्री शाहपुर बख़्तियार चाहते थे कि वो और पहले ही ईरान से बाहर चले जाएं.

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मोहम्मद हैकाल लिखते हैं, "देरी इस वजह से हुई कि शाह अपने साथ कुछ शाही जवाहरातों को ले जाना चाहते थे. ये सारे जवाहरात वहां के केंद्रीय बैंक, बैंक मेल्ली के सुरक्षित सेफ़ में रखे हुए थे. लेकिन उन दिनों बैंक में हड़ताल चल रही थी. शाह ने अपने सैनिकों को इस निर्देश के साथ वहाँ भेजा कि वो बैंक अधिकारियों से ज़बरदस्ती उस सेफ़ को खुलवाएं. लगातार छह दिनों तक सैनिक वो जवाहरात लेने बैंक गए और हर बार उन्हें ख़ाली हाथ लौटना पड़ा. शाही ख़ज़ाने को सुरक्षा की दृष्टि से ज़मीन से बीस मीटर गहराई में बनी सेफ़ में रखा गया था. जो लोग उस सेफ़ को खोलना जानते थे, वो बैंक से गायब हो गए. आखिर में ख़ज़ाने को सुरक्षित रखने के लिए शाह ने जो सावधानियाँ बरती थीं, वही उनके ख़िलाफ़ गई. शाह को बिना जवाहरातों और ताज के ईरान छोड़ना पड़ा. इन जवाहरातों का उस समय 500 अरब डॉलर का बीमा कराया गया था. ये ख़ज़ाना आज भी ईरान के बैंक में सुरक्षित है."

शाह ने ईरान से बाहर जाने को इस तरह पेश किया जैसे वो मिस्र की सरकारी यात्रा पर जा रहे हों. असल में पहले वो जॉर्डन जाना चाहते थे, लेकिन जॉर्डन के शाह ने विनम्रता से शाह के अनुरोध को ठुकरा दिया.

शाह अपना विमान खुद उड़ाते हुए सीधे नील नदी पर बने शीतकालीन रिसॉर्ट आसवान पहुंचे. वहाँ राष्ट्रपति अनवर सादात ने उनका स्वागत किया. कुछ इक्का-दुक्का लोगों को सड़कों पर भी शाह का स्वागत करते देखा गया लेकिन मिस्र की सरकार ने ही इसका बंदोबस्त किया था. मिस्र मे पाँच दिन बिताने के बाद शाह मोरक्को की राजधानी मराकश चले गए.

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योजना ये थी कि वो वहाँ पाँच दिन बिताने के बाद अमरीका चले जाएंगे. लेकिन तभी उनके दामाद और अमरीका में ईरान के राजदूत अरदेशिर ज़ाहेरी का संदेश आया कि अमरीका ने अपना विचार बदल दिया है और वो अब उनका स्वागत करने के लिए तैयार नहीं है. शाह के पास मोरक्को में रुकने के अलावा कोई चारा नहीं था. लेकिन तीन हफ़्ते बाद मोरक्को के शाह हसन ने अपने एडीसी को ईरान के शाह के पास भेजा. बताया गया कि शाह उन्हें शरण देना तो चाहते हैं, लेकिन अब हालात बदल गए हैं और बदली हुई परिस्थितियों में उनके लिए मोरक्को में रहना असंभव सा लग रहा है. जिस शख्स की पूरी दुनिया में तूती बोलती थी, उसको एक छत की तलाश में दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही थीं.

सुनें, जब शाह ईरान छोड़कर भागे

उधर, तेहरान में जैसे ही शाह के जाने की ख़बर फैली, पूरा तेहरान सड़कों पर आ गया. उस समय कुलदीप सहदेव तेहरान के भारतीय दूतावास में सेकेंड सेक्रेटरी थे.

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कुलदीप बताते हैं, "तेहरान में ऐसा माहौल था जैसा छुट्टियों में होता है. लगता था पूरा शहर पार्टी कर रहा था. मैं भी पत्नी और दो बच्चों के साथ अपनी कार पर बाहर निकला. एक-एक इंच कर कार बढ़ रही थी. सड़क पर खड़े लोगों ने इसरार किया कि हम अपनी कार की खिड़की के शीशे खोल दें. जैसे ही हमने ऐसा किया लोग शीशे के अंदर मिठाइयाँ और दूसरी खाने की चीज़ें फेंकने लगे."

तेहरान आ रहे ख़ुमैनी के विमान में मोहसिन सज़ेगारा भी सवार थे. वो पेरिस में अयातुल्ला ख़ुमैनी के लिए काम कर रहे थे. शाह जाते-जाते शाहपुर बख्तियार को ईरान का प्रधानमंत्री बना कर गए थे. मोहसिन को फ़िक्र थी कि जब ख़ुमैनी ईरान पहुंचेंगे तो बख़्तियार उनके साथ किस तरह पेश आएंगे.

बीबीसी से बात करते हुए मोहसिन ने कहा, "मुझे याद है एक रात हमने अयातुल्ला ख़ुमैनी से तगड़ी बहस की कि उनका ईरान जाना ख़तरनाक हो सकता है. बख़्तियार अभी भी सत्ता में हैं और वो उन्हें गिरफ़्तार कर सकते हैं. हमें मालूम नहीं था कि आगे क्या होने वाला है. लेकिन अयातुल्ला को इसकी कोई फ़िक्र नही थी. उनके साथ करीब 100 पत्रकार भी उस विमान पर सवार थे. उन्हें इसलिए साथ लाया गया था कि ईरान की सरकार उनके विमान पर गोलाबारी कर उसे गिरा न दे."

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मोहसिन याद करते हैं, "जहाज़ में पूरी रात मैं जगा हुआ था. ख़ुमैनी ने अपने बेटे से जो उनकी बग़ल में बैठा हुआ था, कहा ‘इन पासपोर्टों को संभाल कर रखो.’ उनके बेटे का नाम अहमद था. जब मैंने ये सुना तो मैंने सोचा कि इस शख्स को यह अहसास ही नहीं है कि वो ईरान का सबसे बड़ा नेता बनने जा रहा है."

उनकी पहली चिंता थी कि उनका विमान तेहरान के मेहराबाद हवाईअड्डे पर लैंड तो करे. जब वो वहाँ पहुंचे तो उनका विमान शहर के ऊपर बीस मिनटों तक चक्कर लगाता रहा. विमान पर सवार लोगों के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. लेकिन आखिर में वो समय आया जिसका सबको इंतज़ार था. ख़ुमैनी एयर फ़्रांस के पायलट के हाथों का सहारा लिए हुए धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरे. हवाईअड्डे पर स्थिति नियंत्रण से बाहर थी. ख़ुमैनी को नीले और सफ़ेद रंग की कैडलक कार में बैठाया गया.

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जैसे ही कार बढ़ी लोगों का हुजूम उसके पीछे दौड़ा. हवाईअड्डे का टर्मिनल तो खचाखच भरा ही था, उसके बाहर भी लोगों की अथाह भीड़ थी. अयातुल्ला ख़ुमैनी को बेहेश्तेज़ेहरा कब्रगाह ले जाया जा रहा था जहाँ उन्हें भाषण देना था. मोहसिन सज़ेगारा उनकी कार के ठीक पीछे थे.

मोहसिन कहते हैं, "मैं कुछ पत्रकारों के साथ मिनी बस पर सवार था जो अयातुल्ला की कार के पीछे चल रही थी. लेकिन उनकी कार आगे बढ़ नहीं पाई क्योंकि लाखों लोग सड़क पर आ गए. उनके पीछे आ रही कारों को एक इंच भी बढ़ने का मौका नहीं मिला."

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बीबीसी ने मोहसिन से पूछा जब आपने देखा कि ख़ुमैनी के स्वागत में जनसैलाब सड़कों पर उतर आया है, तो आपको आश्चर्य हुआ?

मोहसिन ने जवाब दिया, "हमें लाखों लोगों के आने की उम्मीद तो थी. मुझे याद है कि मैंने कहा था कि करीब पचास लाख लोग आएंगे. लेकिन मैं शायद कुछ बढ़ा-चढ़ा कर कह रहा था. लेकिन अगर पचास नहीं तो करीब तीस लाख लोग तो थे ही. सच कहूँ जब भी मैं इतने सारे लोगों को जोश में देखता हूँ, तो मेरा अपने ऊपर नियंत्रण समाप्त हो जाता है और मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं. उस दिन भी मेरे साथ यही हुआ. मैंने ध्यान से देखा मेरे आसपास बहुत से लोग रो रहे थे. कुछ लोग एक दूसरे का चुंबन ले रहे थे और मुबारकबाद दे रहे थे."

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अंत में लोगों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि ख़ुमैनी को अपनी कार छोड़नी पड़ी और वहाँ से उन्हें हेलिकॉप्टर से बेहेश्तेज़ेहरा ले जाया गया. मोहसिन और उनके साथ चल रहे पत्रकारों को भी अपनी मिनी बस छोड़नी पड़ी. पत्रकार होटलों की तरफ़ गए और मोहसिन ने अपने घर का रुख़ किया.

मोहसिन याद करते हैं, "मेरे पिता अकेले घर में थे. हर कोई मेरी माँ, मेरी बहन, मेरा भाई सब अयातुल्ला का स्वागत करने सड़कों पर निकले हुए थे. मेरे पिता को मेरा राजनीतिक कार्यकर्ता होना पसंद नहीं था. लेकिन जब उन्होंने दरवाज़ा खोला और मेरी तरफ़ देखा तो ज़िदगी में पहली और आख़िरी बार उन्होंने मुझे गले लगाकर प्यार किया. उन्होंने कहा... मुबारक हो मेरे बेटे... मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम शाह को भगाने में सफल होगे." 23 साल के मोहसिन के लिए ये एक गौरव का पल था.

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देश वापस लौटने के चार दिन के भीतर ख़ुमैनी ने मेंहदी बज़रगान को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया. करीब पाँच दिनों तक ईरान में सत्ता के दो केंद्र रहे. आख़िरी हथियार के तौर पर बख़्तियार ने पूरे देश में कर्फ़्यू लगाने का आदेश दिया. ख़ुमैनी ने एक कागज़ पर अपने हाथ से लिखा, 'कर्फ्यू का उल्लंघन करो.’ उस कागज़ की तस्वीर को टेलीविजन सेंटर से बार-बार फ़्लैश किया गया. लाखों लोग सड़कों पर फिर उतरे.

मोहसिन सज़ेगारा याद करते हैं, "उन्होंने पुलिस थानों पर हमला करना शुरू कर दिया. पूरी रात मैं जगा रहा. जब मैं सड़कों पर गया तो मैंने देखा लोग पुलिस थानों के साथ-साथ सेना की छावनियों पर भी हमला कर वहाँ से बंदूकों को लूट रहे थे."

15 फ़रवरी की रात को वायु सेना कमांडर अमीर हुसैन रबीई को गोली से उड़ा दिया गया. तेहरान के सैनिक गवर्नर जनरल अमीर रहीमी का भी यही हश्र हुआ, लेकिन रहीमी ने मरने से पहले ‘शाह ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया. जनरल नसीरी और जनरल ख़ोसरोदाद को भी अलावी स्कूल की छत पर गोली मारी गई.

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बीबीसी मॉनिटरिंग सेवा और ईरान मामलों के जानकार राकेश भट्ट बताते हैं, "कम लोगों को पता है कि ख़ुमैनी के परदादा भारत में बाराबंकी के पास कुंतूर गाँव के रहने वाले थे जहाँ से वो तीर्थ यात्रा करने 1790 में ईरान गए थे और वहीं बस गए थे. तत्कालीन भारत सरकार ने जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे, ख़ुमैनी के इस भारत संबंध को भुनाना चाहा."

राकेस भट्ट बताते हैं कि आनन-फानन में पूर्व मंत्री अशोक मेहता के नेतृत्व में ख़ुमैनी से मिलने के लिए एक सद्भावना प्रतिनिधि मंडल ईरान भेजा गया जिसमें ईरान में भारत के पूर्व राजदूत बदरुद्दीन तैयबजी और लखनऊ के शिया धर्मगुरू आग़ा रूही अबाक़ी भी थे.

जाने-माने पत्रकार सईद नक़वी याद करते हैं, "जब ये प्रतिनिधि मंडल ख़ुमैनी से मिलने गुमरान पहुंचा तो ख़ुमैनी ने हाथ के इशारे से दरवाज़े पर ही सभी लोगों को रुकने और आग़ा रूही को आगे आने के लिए कहा. जब आग़ा रूही पास पहुंचे तो उन्हें वो खरी खोटी सुनाई कि उनके होश उड़ गए. भारतीय प्रतिनिधि मंडल हक्का-बक्का रह गया. उनको लेने के देने पड़ गए. ख़ुमैनी इस बात पर नाराज़ थे कि आग़ा ने खुमैनी के साथ अपने संबंधों का हवाला देते हुए भारत सरकार को ये पहल करने के लिए बढ़ावा दिया था. जबकि सही बात ये थी कि ख़ुमैनी के भारत संबंधों का पता लगते ही भारत सरकार ने खुद आगा रूही से संपर्क स्थापित किया था."

नक़वी कहते हैं कि उस समय ईरान की क्रांति हुए बहुत अधिक समय नहीं हुआ था और ख़ुमैनी अपने लोगों को ये संदेश नहीं देना चाहते थे कि उनके पूर्वज ईरान के बाहर से आए थे.

क्रांति के बाद ईरान में स्थायित्व आते-आते छह महीने लग गए. जैसे ही शतरंज की बिसात पर अपने विरोधी के आख़िरी प्यादे का सफ़ाया किया, उनके मुंह से निकला, ‘शाह मात.’

उन्होंने 19 साल पहले शाह के ख़िलाफ़ शुरू की गई लड़ाई जीत ली थी. अब ईरान उनका था. वहाँ उनकी सत्ता को चुनौती देने वाला अब कोई नहीं था.

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