ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से दिक्कत क्या है?

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ब्रिटेन इन दिनों एक कशमकश से गुज़र रहा है. कशमकश ये कि यूरोपीय संघ में रहे या उससे बाहर हो जाए. इस मुद्दे पर वहां 23 जून को जनमत संग्रह होगा.

यूरोपीय संघ के समर्थक और आलोचक अपने-अपने तर्कों को लोगों के सामने रख रहे हैं.

यूरोपीय संघ 28 देशों का ऐसा संघ है, जो हर संकट में एक दूसरे के साथ खड़े हैं. बात विकास की हो या आर्थिक हितों की या फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने की, ये सभी मुल्क एक सुर में बोलते हैं.

लेकिन यूरोपीय देश कई अहम मुद्दों पर फैसला लेते हुए अपने हाथ बंधे हुए पाते हैं. उनके ये फैसले ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के मुख्यालय में होते हैं और इस बात को लेकर इन देशों में बेचैनी महसूस हो रही है.

ब्रिटेन में भी ऐसी आवाज़ें उठ रही है. वहां 23 जून को होने वाले जनमत संग्रह में फैसला होगा कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ में रहेगा या फिर उससे अलग हो जाएगा.

लेकिन इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी, दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में यूरोपीय मामलों के जानकार गुलशन सचदेव कहते हैं कि यूरोपीय संघ को लेकर ब्रिटेन हमेशा से दुविधा का शिकार रहा है.

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Image caption ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन यूरोपीय संघ में रहने के हक़ में हैं

वो कहते हैं, “ब्रिटेन हमेशा से यूरोपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र का फ़ायदा तो उठाना चाहता है, लेकिन नीति निर्धारण में अपना नियंत्रण गंवाना उसे मंज़ूर नहीं है.”

“इसके अलावा साझा मुद्रा यूरो के संकट और प्रवासियों के बड़ी संख्या में यूरोप आने के कारण पैदा हालात ने भी ब्रिटेन में यूरोपीय संघ के आलोचकों को अपनी बात मज़बूती से रखने का मौक़ा दिया है.”

ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन यूरोपीय संघ में रहने के हक़ में हैं, लेकिन एक विशेष दर्जे के साथ. इसलिए उन्होंने पिछले दिनों यूरोपीय संघ से एक डील की है, जिसमें ब्रिटेन को कई रियायतें दी गई हैं.

मसलन ब्रिटेन पहले ही तरह अपनी मुद्रा पॉउंड को बरक़रार रख पाएगा.. वो अपने यहां आने वालों लोगों पर भी कुछ हद तक अपने हिसाब से नियंत्रण कर सकेगा. और साझा मुद्रा वाले यूरोज़ोन के नियम ब्रिटेन पर नहीं थोपे जाएंगे. और भी कई ऐसी बातें इसमें शामिल हैं.

जर्मनी के कोलोन में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार राम यादव यूरोपीय संघ को लेकर ब्रिटेन की बेचैनी का कारण उसके रुतबे में आई कमी को मानते हैं.

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वो कहते हैं, “ब्रिटेन को ये बात स्वीकार करने में समस्या हो रही है कि कहां तो पूरी दुनिया में उसका वर्चस्व था और यूरोप में भी था. और अब जर्मनी का वर्चस्व है. कहीं न कहीं फ्रांस का भी है और यही दोनों मिलकर यूरोपीय संघ को चलाते हैं जबकि इस मामले में ब्रिटेन की ज़्यादा पूछ है नहीं. इससे ब्रिटेन को लगता रहा है कि हम यूरोप में उपेक्षित हैं.”

यूरोपीय संघ के मुद्दे पर ब्रितानी जनता बंटी हुई है. वहीं कैमरन के पांच मंत्रियों समेत सत्ताधारी कंज़रवेटिव पार्टी के आधे सांसद यूरोपीय संघ छोड़ना चाहते हैं, तो विपक्षी लेबर पार्टी के कई सांसद और डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) और यूके इंडिपेंडेंट जैसी पार्टियां यूरोपीय संघ में नहीं रहना चाहती हैं.

लेकिन लेबर पार्टी, स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी (एसएनपी) और लिबरल डेमोक्रेट्स यूरोपीय संघ में रहना चाहते हैं.. कंज़रवेटिव पार्टी ने तटस्थ रहने का फैसला किया है, लेकिन प्रधानमंत्री कैमरन साफ़ कहते हैं जो लोग यूरोपीय संघ छोड़ने को संप्रभुता से जोड़ रहे हैं, वो किसी छलावे में आएं.

वो कहते हैं, “आप जरा सोचिए जब शक्तियां ही नहीं होगी तो संप्रभुता का क्या मतलब है.. हम न अपनी कंपनियों के हितों की सुरक्षा कर पाएंगे और न ही हमें यूरोपीय एजेंसियों से इस बारे में सूचनाएं मिलेंगी कि यूरोप में कौन से अपराधी, आतंकवादी क्या कर रहे हैं. मान लीजिए हमारे किसी उद्योग पर प्रतिबंध लग गया तो क्या हम उसे हटवा पाएंगे.. नहीं हटवा पाएंगे. इसलिए आपको संप्रभु होने का भ्रम तो होगा, लेकिन आपके पास ताक़त नहीं होगी, नियंत्रण नहीं होगा.”

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Image caption मध्य पूर्व से बड़ी संख्या में यूरोप पहुंचे प्रवासी एक बड़ी चुनौती हैं

आर्थिक संकट और पेरिस में हुए चरमपंथी हमले से पता चलता है कि कैमरन की चिंताएं कितनी वाजिब हैं, लेकिन ठीक इन्हीं मुद्दों को लेकर आलोचक एक भयानक मंज़र पेश करते हैं.

यूके इंडिपेंटेट पार्टी के नेता नाइजलल फराज़ कहते हैं, “एक बात तय है कि अगर हम यूरोपीय संघ से बाहर जान के लिए वोट देते हैं तो हम अपने देश के खुद मालिक होंगे. हम अपने क़ानून बनाएंगे. और अगर हम संघ में रहने के लिए वोट देते हैं तो ऐसे संघ में रहेंगे जिसकी मुद्रा यूरो लड़खड़ा रही है, जो प्रवासी संकट से सामने लाचार और यूरोपोल (यूरोपीय पुलिस) का कहना है कि लगभग पांच हजार इस्लामी चरमपंथी यूरोप में घुस चुके हैं.”

पर ये भी सच है कि ब्रिटेन परमाणु हथियारों से लैस है, वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है.

ऐसे में, उसका यूरोपीय संघ में रहना या न रहना, सिर्फ़ एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके अंतरराष्ट्रीय असर भी होंगे. वरिष्ठ पत्रकार राम यादव कहते हैं कि ब्रिटेन अगर यूरोपीय संघ से निकलता है तो उसे आर्थिक और राजनीतिक नुकसान उठाने पड़ सकते हैं.

वो कहते हैं, “यूरोपीय संघ का मक़सद ये है कि रूस को ज़्यादा से ज़्यादा घेरा जाए. जो देश पहले कम्युनिस्ट थे वो अब यूरोपीय संघ में आने के लिए झगड़ रहे हैं. अमरीका भी यही चाहता है कि यूरोपीय संघ ज्यादा से ज़्यादा फैले.”

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उनके मुताबिक़, “अब अगर एक पुराना सदस्य ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर जाएगा तो उससे उसकी छवि को धक्का लगेगा. यूरोपीय संघ के आकर्षण में कमी आएगी.”

सियायत से परे बात अगर अर्थव्यवस्था की हो, तो यूरोपीय मुक्त व्यापार का सबसे बड़ा फायदा जर्मनी ने उठाया है और वो यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, लेकिन ब्रिटेन को भी इसका कम फ़ायदा नहीं हुआ है.

ब्रिटेन के लिए यूरोपीय संघ के देश एक बड़ा बाजार हैं और इसीलिए जनमत संग्रह में 'हां' और 'ना' का फैसला इतना आसान नहीं होगा.

जिस ब्रिटेन के बारे में भी कहा जाता था कि उसके साम्राज्य में कभी सूरज छिपता, वहीं ब्रिटेन आज यूरोप में अपने रुतबे को बचाने के लिए जूझ रहा है.

उसे ये चिंता खाए जा रही है कि कहीं वो सिर्फ यूरोप का एक टापू बन कर रह जाए.

यूरोपीय संघ के साथ मिलकर जहां उसके लिए ज़रूरी हो गया है. वहीं उस पर सवाल उठाने वालों की भी कोई कमी नहीं है.

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