..तो कुत्ते को मिल जाता पहला ऑस्कर

ऑस्कर अवॉर्ड इमेज कॉपीरइट Getty

अगर आपसे पूछें कि दुनिया का सबसे मशहूर फ़िल्मी अवार्ड कौन सा है तो आप तुरंत कहेंगे-ऑस्कर. आपका जवाब बिल्कुल दुरुस्त है.

मगर, क्या आपने कभी सोचा है कि इनका नाम ऑस्कर कैसे पड़ा? अवार्ड वाली वह सुनहरी मूर्ति किसने डिज़ाइन की? पहला ऑस्कर किसने जीता?

तो चलिए ऑस्कर अवार्ड से जुड़ी तमाम दिलचस्प बातें आपको बताते हैं.

ऑस्कर अवार्ड्स 1929 में शुरू हुए. जब मशहूर फ़िल्म कंपनी एमजीएम के मालिक लुई बी मेयर की अगुआई में हॉलीवुड में एकेडमी ऑफ़ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स की बुनियाद रखी गई.

सबसे दिलचस्प कहानी तो है पहले ऑस्कर अवार्ड विजेता की. आधिकारिक तौर पर तो पहला ऑस्कर जर्मन कलाकार एमिल जैनिंग्स ने जीता था. वो एमिल, जिन्होंने बाद में जर्मन तानाशाह हिटलर के लिए काम किया और नाज़ी सरकार के लिए कई प्रचार फ़िल्में बनाईं.

इमेज कॉपीरइट Getty

मगर जेनिंग्स इस अवार्ड के पहले हक़दार नहीं थे. यह अवार्ड जर्मन शेफ़र्ड नस्ल के एक कुत्ते ने जीता था, जिसका नाम था रियो टिन टिन. इस कुत्ते को पहले विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस में बचाया गया था. 1918 में फ्रांस में जंग लड़ रहे अमेरिकी वायुसेना के एक जवान ने रियो को बचाया था.

बाद में रियो टिन टिन हॉलीवुड में मशहूर कलाकार बना. उसने 27 फ़िल्मों काम किया. इनमें से चार तो 1929 में ही रिलीज़ हुई थीं. इन्हीं में एक में उसकी शानदार एक्टिंग के लिए अवार्ड कमेटी ने उसे ऑस्कर का हक़दार माना.

मगर एकेडमी के पहले प्रेसीडेंट लुई मेयर को लगा कि अगर पहला ऑस्कर किसी कुत्ते को दिया गया, तो अच्छा संदेश नहीं जाएगा. इसीलिए अवार्ड कमेटी को फिर से वोट करने को कहा गया. तब जर्मन एक्टर एमिल जैनिंग्स को पहला ऑस्कर मिला.

यानी पहले अवार्ड विजेता से ही ऑस्कर पुरस्कारों का विवादों से नाता जुड़ गया था. कुछ और दिलचस्प आंकड़ों पर नज़र डालिए.

सबसे ज़्यादा 27 ऑस्कर जीतने का रिकॉर्ड वॉल्ट डिज़्नी के नाम है. जबकि मशहूर निर्देशक अल्फ्रेड हिचकॉक को एकेडमी ने एक भी ऑस्कर के लायक नहीं समझा.

हां, उन्हें बाद में मानद अवार्ड ज़रूर दिया गया. एक बार अवार्ड समारोह पेश करते हुए अमेरिकी कॉमेडियन बॉब होप ने मज़ाक़ में कहा था कि अगर सबको बांटने से भी ऑस्कर की कोई मूर्ति बच रही हो, तो उसे वाल्ट डिज़्नी के घर भिजवा दिया जाएगा.

Image caption वॉल्ट डिज़नी के नाम सबसे ज़्यादा 27 ऑस्कर जीतने का रिकॉर्ड है

एकेडमी के अंदर सियासत और इससे जुड़े विवादों से इतर ऑस्कर्स की पूरी दुनिया में शोहरत है. हर कलाकार एक बार इसे हासिल करना चाहता है. सोने का इसका बुत, हर एक्टर का ख़्वाब है. इस बार के ऑस्कर अवार्ड समारोह के पोस्टर में लिखा भी है, "हम सब सोने का ख़्वाब देखते हैं."

ऑस्कर समारोहों के 87 साल पुराने इतिहास में कई उतार-चढ़ाव देखे गए. मगर इसकी सोने की मूर्ति कमोबेश वैसी ही है, जैसा पहले अवार्ड समारोह का डिज़ाइन था.

दुनिया के सबसे चर्चित फ़िल्म अवार्ड की इस सुनहरी मूर्ति का डिज़ाइन, फ़िल्म कंपनी एमजीएम के उस वक़्त के मुख्य कला निर्देशक सेड्रिक गिबन्स ने काग़ज़ पर बनाया था. इसे मूर्ति के रूप में गढ़ा लॉस एंजेल्स के कलाकार जॉर्ज स्टैनले ने.

ख़ुशमिज़ाज सेड्रिक गिबन्स हॉलीवुड के सबसे असरदार कला निर्देशकों में थे. वह एक आयरिश आर्किटेक्ट के बेटे थे.

जब 1925 में पेरिस में दुनिया भर में होने वाली कलाकारों का मेला लगा तो, उसमें शिरकत करने वालों में वह हॉलीवुड के इकलौते डिज़ाइनर थे. इस महामेले को आज दुनिया 'आर्ट डेको' के नाम से जानती है.

इमेज कॉपीरइट Getty

गिबन्स आर्ट डेको की थीम से बड़े प्रभावित हुए थे. उन्होंने इसी नाम से हॉलीवुड में अपना घर भी बनाया -आर्किटेक्ट डगलस होनाल्ड की मदद से. गिबन्स के घर का इंटीरियर झक सफ़ेद रखा गया था. 1930 में गिबन्स की शादी से ठीक पहले उनके सपनों का यह आशियाना बनकर तैयार हो गया था.

गिबन्स ने मेक्सिकन मूल की अभिनेत्री डोलोरेस डेल रियो से शादी की थी. डोलोरेस, हॉलीवुड की मूक फ़िल्मों के दौर की बेहद कामयाब अदाकारा थीं. ऑस्कर अवार्ड का सुनहरा बुत डिज़ाइन करके गिबन्स अमर हो गए.

कहते हैं कि ऑस्कर की मूर्ति बनाने में किसी मॉडल का इस्तेमाल नहीं हुआ. मगर, गिबन्स की पत्नी डोलोरेस का दावा था कि उनके मेक्सिकन दोस्त एमिलियो फर्नांडेज़ ने इसके लिए बिना कपड़ों के मॉडलिंग की थी. तब, जब आर्टिस्ट जॉर्ज स्टैनले, इस अवार्ड के लिए मूर्तियों को गढ़ रहे थे.

एमिलियो, हॉलीवुड में दूसरे दर्ज़े के कलाकार थे. उन्होंने कई फ़िल्मों में छोटे मोटे रोल किए.

वैसे मॉडल की मदद से बनी या फिर बिना मॉडल के, ऑस्कर की मूर्ति बेहद मनमोहक है. यह किसी भी मॉडल या किसी भी युवक से मेल खाती मालूम हो सकती है.

ये तो हुई मूर्ति के डिज़ाइन की बात. अगला सवाल यह कि आख़िर इनका नाम ऑस्कर कैसे पड़ा. इनका आधिकारिक नाम तो एकेडमी अवार्ड ऑफ़ मेरिट है. मगर दुनिया इन्हें ऑस्कर के नाम से ही जानती है.

इन्हें ऑस्कर क्यों कहा गया, इस बारे में भी कई क़िस्से चलन में हैं. जैसे कहते हैं कि एकेडमी की लाइब्रेरियन मार्गरेट हेरिक ने इन मूर्तियों को देखकर बेसाख़्ता कहा कि ये उनके चाचा ऑस्कर जैसी दिखती हैं, और इन्हें ऑस्कर नाम दे दिया गया.

एक और कहानी है कि अभिनेत्री बेटी डेविस ने इन्हें ये नाम अपने पहले पति हरमन ऑस्कर नेल्सन के नाम पर दिया था.

अब सचाई जो भी हो, लेकिन एकेडमी अवार्ड ऑफ़ मेरिट आज ऑस्कर के नाम से ही मशहूर हैं. अब तो एकेडमी ने भी इसी नाम को मान लिया है.

पहले पहल ऑस्कर की मूर्तियां कांसे से बनाई गईं, जिन पर सोने की परत चढ़ी होती थी. इन्हें इलिनॉय की 'सीडब्ल्यू शुमवे एंड संस' नाम की कंपनी बनाती थी. कुछ साल बाद ऑस्कर अवार्ड की मूर्तियों को टिन, एंटीमनी और तांबे को मिलाकर बनने वाले ब्रिटानिया मेटल से बनाया जाने लगा और इस पर चढ़ाई जाने लगी 24 कैरेट यानी शुद्ध सोने की परत.

तब से ही ऑस्कर अवार्ड की ये चमचमाती मूर्तियां कमोबेश वैसी ही हैं. सन् 1982 से इन्हें बनाने की ज़िम्मेदारी, शिकागो की 'आरएस ओवेन्स एंड कंपनी' के पास है.

हालांकि इस परंपरा में कई बार छोटे-मोटे बदलाव भी देखने को मिले. रवायत से हटकर 1939 में वॉल्ट डिज़्नी को एक ख़ास तरह का ऑस्कर अवार्ड दिया गया. इसमें लकड़ी के पोडियम पर ऑस्कर की मूर्ति थी. साथ ही में डिज़्नी की मशहूर फ़िल्म 'स्नो व्हाइट एंड सेवेन ड्वार्फ़्स' के सात बौने भी दिखाए गए थे.

इमेज कॉपीरइट Disney Enterprises

दूसरे विश्वयुद्ध के चलते 1942 से 1945 के बीच ऑस्कर अवार्ड्स के बुत रंगीन प्लास्टर से बनाए गए. वजह यह कि उन्हें बनाने के लिए मेटल नहीं मौजूद था. हालांकि इस दौरान अवार्ड जीतने वालों को कहा गया था कि विश्वयुद्ध के बाद जब हालात सामान्य होंगे तो वो इन रंगीन बुतों को बदलकर सुनहरी मूर्तियां ले सकेंगे.

ऑस्कर अवार्ड्स से जुड़े एक पहलू की हमेशा अनदेखी हुई है. वो है, इन सुनहरे बुतों की ख़रीद-फ़रोख़्त. एकेडमी के नियम के मुताबिक़ ऑस्कर विजेता या उनके वारिस इन्हें बेचने से पहले एकेडमी को इसे एक डॉलर की मामूली क़ीमत पर वापस देने का ऑफ़र देंगे.

हालांकि कुछ ऑस्कर विजेताओं ने इस नियम की कमियों का फ़ायदा उठाया. सबसे मशहूर क़िस्सा हुआ साल 2011 में जब अमेरिकी अभिनेता-लेखक-निर्देशक ऑर्सन वेल्स की बेटी बीट्रिस वेल्स ने अपने पिता के 1942 में जीते ऑस्कर अवार्ड की बोली लगाई. नीलामी में बीट्रिस को आठ लाख 61 हज़ार और 542 डॉलर या क़रीब छह करोड़ रुपए मिले.

वैसे, ऑस्कर बेशक़ीमती हैं. दुनिया भर में फ़िल्मी कारोबार के सबसे बड़े प्रतीक हैं. हॉलीवुड की पहचान हैं. देवी-देवताओं, संत-फ़क़ीरों की तरह इन बुतों को भी फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोग पूजते हैं.

कहते हैं कि जब दूसरे विश्वयुद्ध के आख़िरी दौर में मित्र देशों की सेनाएं हिटलर के आख़िरी मोर्चे की तरफ़ बढ़ रही थीं तो पहले ऑस्कर विजेता एमिल जैनिंग्स, अपना ऑस्कर अवार्ड उठाए हुए ज़ोर से चिल्लाए थे, "मेरे पास ऑस्कर है", ताकि दुश्मन उनकी जान बख़्श दे.

इमेज कॉपीरइट Getty

अब यह क़िस्सा कितना सच है, पता नहीं. मगर एमिल की जान बच गई थी.

पिछले 87 सालों में ऑस्कर के सुनहरे बुत, बिना किसी ख़ास फ़ेरबदल के अपनी चमक बिखेरते रहे हैं. दुनिया में आए तमाम उतार-चढ़ाव, बदलावों का इन पर ख़ास असर नहीं दिखा. हॉलीवुड और बाक़ी दुनिया में इनकी बुलंदी क़ायम है.

(यह मूल लेख बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार