कैसी नौकरी चाहिए आपको?

हम सब अपनी ज़िंदगी में ऐसी नौकरी तलाशते हैं, जो हमारे लिए बेहतरीन हो. हम वहां के माहौल से अच्छे से तालमेल बिठा लें, खुलकर काम करने के मौक़े हों, तेज़ी से तरक़्क़ी कर सकें.

अपने लिए अच्छे कामकाजी साथी पा सकें और उनमें से कुछ दोस्त भी बना लें.

कॉलेज या यूनिवर्सिटी की ज़िंदगी अलग, बिंदास होती है. मर्ज़ी की ज़िंदगी होती है. हम जिसे चाहें अपना साथी चुन सकते हैं. जब मन हो पढ़-लिख सकते हैं. न मन हुआ तो क्लास बंक की और पहुँच गए फ़िल्म देखने.

लेकिन यह आज़ादी, यह बिंदास माहौल, नौकरी में आते ही बदल जाता है. आपको अलग माहौल में जीना होता है. नए लोगों के साथ अच्छे तालमेल से काम करना होता है. इसलिए हम सब अपने मिज़ाज से मेल खाने वाली नौकरी की तलाश में रहते हैं. जहां के माहौल में हम आसानी से फ़िट बैठ सकें.

मनमुताबिक़ कंपनी की तलाश -

जानकार कहते हैं कि दुनिया में कोई ऐसी कंपनी नहीं जो हर तरह के इंसान की तरक़्क़ी के लिए अच्छी हो.

शिकागो की रोज़गार कंपनी ला साल नेटवर्क के प्रमुख टॉम गिंबेल कहते हैं कि जैसे-जैसे आप अपने करियर में आगे बढ़ते हैं, अपनी कंपनी से आपकी उम्मीदें औऱ अपेक्षाएं बदलती जाती हैं. कभी काम का माहौल आपके मुनासिब होना सबसे अहम होता है तो कभी तरक़्क़ी के मौक़े और कभी पैसा.

पैसा हर वक़्त प्राथमिकता नहीं होता-
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हम सब पैसे कमाने के लिए नौकरी करते हैं. तो ऐसे में होना तो ये चाहिए कि अपनी नौकरी में हम सब सबसे बड़ी बात देखें वो पैसा हो. सबसे अच्छा ऑफ़र कौन दे रहा है, उसी कंपनी से जुड़ जाएं. मगर अब करियर के फ़िक्रमंद लोगों के लिए सिर्फ़ पैसा मायने नहीं रखता.

लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनमिक्स की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर शोशाना डोब्रो रिज़ा कहती हैं कि आज कंपनी का नाम, काम का माहौल, कंपनी के बुनियादी मूल्य, ये सब बातें प्रोफ़ेशनल्स के लिए ज़्यादा अहम हो गई हैं.

रिज़ा कहती हैं कि आज नौकरी तलाशने वाले देखते हैं कि नौकरी में उनके सबसे ज़्यादा काम की क्या चीज़ है? क्या फ़लां जगह काम करने से उन्हें सुकून मिलेगा, अपनी क़ाबिलियत दिखाने का मौक़ा मिलेगा, अहमियत का अहसास होगा.

आपकी प्राथमिकताएं -

मनमाफ़िक़ नौकरी की तलाश से पहले आपको ख़ुद को समझना ज़रूरी है. आप चाहते क्या हैं? किस तरह की कंपनी, कैसे माहौल में काम करना पसंद करते हैं? किन बातों से आपके अंदर काम करने का हौसला आता है?

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ला साल कंपनी के टॉम गिंबेल इसके लिए बड़ी अच्छी सलाह देते हैं.

वो कहते हैं कि आप अपनी ज़िंदगी में उन अहम लोगों के बारे में सोचिए कि आपके करियर में, आपकी तरक़्क़ी में उनका कैसा रोल रहा. क्या वो कोई कोच थे, आपके पढ़ाई के उस्ताद थे, कॉलेज के प्रोफ़ेसर थे? उनकी ख़ूबियां क्या थीं? उनमें से सबसे ज़्यादा किसने आप पर असर डाला?

फिर जब आप नौकरी के इंटरव्यू के लिए जाएं तो अपने संभावित मैनेजर के बारे में पता लगाने की कोशिश करें कि उसमें ये ख़ूबियां हैं या नहीं.

माहौल की फ़िक्र -

अक्सर लोग इस बात को लेकर परेशान होते हैं कि नई कंपनी का माहौल कैसा होगा? कैसे साथी मिलेंगे? क्या उनके साथ काम करके तरक़्क़ी होगी? इन सवालों के जवाब तलाशने आसान हैं.

याद कीजिए कॉलेज के दिनों में आप अकेले अपने प्रोजेक्ट पर काम करना पसंद करते थे, या किसी के साथ मिलकर? क्या आपको लाइब्रेरी के एक कोने में बैठकर सुकून के माहौल में काम करना अच्छा लगता था? या फिर, कई दोस्तों का मजमा लगाकर कैंटीन में भी आप आराम से अपना काम कर लेते थे?

इन सवालों के जवाब में ही छिपी है अच्छी नौकरी के लिए आपकी तलाश. अगर आप शांत माहौल में काम करना पसंद करते हैं तो खुले माहौल वाला, संस्थान आपके मुनासिब नहीं होगा. अगर आपको अकेले काम करना पसंद है, तो टीम वर्क को तरजीह देने वाली कंपनियां आपके लिए मुफ़ीद नहीं रहेंगी. ऐसे में जब आप किसी नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाएं तो इन सवालों के जवाब भी तलाशने की कोशिश करें.

माहौल में बदलाव-

आप अपने पुराने तजुर्बों की मदद से भी अपने लिए नई राह, बेहतर नौकरी तलाश सकते हैं. न्यूयॉर्क की करियर काउंसेलिंग कंपनी इवीवाइज़ की सीईओ डॉक्टर कैट कोहेन यही सलाह देती हैं. डॉक्टक कोहेन कहती हैं कि नई अपने इंटर्नशिप के या फिर पहली नौकरी के दिनों को याद कीजिए.

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क्या उस कंपनी का माहौल आपको अच्छा लगा था? आपने वहां अच्छे से तालमेल बिठा लिया था? या फिर वहां की तेज़ रफ़्तारी, काम का बेइंतिहा दबाव आपको रास नहीं आया?

करियर काउंसेलर डॉक्टर कोहेन कहती हैं कि इंसान को समझना ज़रूरी है कि कैसे माहौल में वो आगे बढ़ सकता है? अपनी क़ाबिलियत का भरपूर इस्तेमाल कर सकता है ताकि उसकी भी तरक़्क़ी हो और कंपनी को भी फ़ायदा पहुँचे.

डॉक्टर कोहेन इसके लिए एक बड़े काम की सलाह देती हैं. हमें अपने दोस्तों, परिवार, कॉलेज के दिनों के साथियों से बात करनी चाहिए, ताकि ख़ुद को, अपनी प्राथमिकताओं को अच्छे से समझ सकें. फिर ऐसी नौकरी तलाशनी चाहिए जो हमारी क़ाबिलियत के लिहाज़ से अच्छी हो, हमें उस कंपनी के माहौल में ख़ुद को ढालने में, उसमें तरक़्क़ी में आसानी रहे.

डॉक्टर कोहेन कहती हैं कि आराम से बैठकर, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से इत्मीनान से बात करें. ख़ुद को समझिए. इससे आप सही नतीजे तक पहुँच सकेंगे.

हमेशा मन मुताबिक़ नौकरी नहीं मिलती-

एक आदर्श स्थिति तो ये है कि आपने अपनी उम्मीदों और क़ाबिलियत के हिसाब से मनमाफ़िक़ कंपनी तलाशें और जा पहुँचे वहां काम करने. मगर हक़ीक़त में ऐसा नहीं होता. हर बार आपको अपने मुनासिब नौकरी मिल ही जाए, ये ज़रूरी नहीं. कई बार ऐसे हालात नहीं होते कि आपको चुनने का मौक़ा मिले.

ख़ासतौर पर पढ़ाई ख़त्म करके नई नौकरी तलाशने वालों के लिए. जब आपके सिर पर पढ़ाई का कर्ज़ जल्द से जल्द चुकाने का दबाव हो. ऐसे में कोशिश होती है कि पहला ऑफ़र मिला नहीं कि आपने नौकरी ज्वाइन कर ली.

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माहौल भले ही आपके मुताबिक़ न हो, मगर ये उतना बुरा भी नहीं. ख़राब माहौल में भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है. आप मेहनत करके कंपनी के लिए ख़ुद को क़ीमती बना सकते हैं. अपने काम करने के तरीक़े से अच्छे काम के नए पैमाने गढ़ सकते हैं.

और तजुर्बा तो मिलेगा ही. आपको मालूम होगा कि किसी ख़ास सेक्टर की कंपनी में काम का माहौल कैसा होता है, किस तरह की क़ाबिलियत चाहिए? आप नए नए लोगों से संबंध बना सकते हैं, जो आगे चलकर, नई नौकरी खोजने में आपके लिए मददगार होंगे.

बदलती प्राथमिकताएं -

उम्र के हिसाब से लोगों के करियर की चुनौतियां, उनके टारगेट भी बदलते जाते हैं. अपने करियर में आधा वक़्त गुज़ारने के बाद, लोगों की नौकरी से उम्मीदें भी बदल जाती हैं.

टॉम गिंबेल सलाह देते हैं कि मिड करियर में पहुंचकर लोगों को सबसे पहले सोचना चाहिए कि उनके लिए सबसे अहम चीज़ क्या है? क्या आप काम के माहौल में बदलाव, थोड़ा खुलापन चाहते हैं, तरक़्क़ी चाहते हैं? या फिर आप मौजूदा नौकरी से संतुष्ट हैं?

जब आप इनके जवाब ख़ुद से खोजेंगे तो आपको मालूम होगा कि किस तरह की नौकरी की आपको तलाश है.

और फिर जब आप अपने करियर के आख़िरी दौर में पहुँचेंगे, तब एक बार फिर आपको अपनी प्राथमिकताओं पर ग़ौर करना होगा. मसलन, क्या आप युवा साथियों के साथ काम करना पसंद करेंगे या हमउम्र लोगों के साथ? क्या आपको नई चुनौतियां स्वीकार करना पसंद है? या फिर नौकरी के आख़िरी दौर में आप सुकून से वक़्त बिताना पसंद करेंगे?

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अगर आपका इरादा नए हुनर सीखकर आगे बढ़ने का है तो आप रिवर्स मेंटरिंग के प्रोग्राम में शरीक़ हो सकते हैं. मतलब आप अपने जूनियर, युवा साथियों से सीख सकते हैं, उनके साथ क़दमताल मिलाने की कोशिश कर सकते हैं. इससे आपको नए जोश का भी अहसास होगा.

उतार-चढ़ाव तय हैं-

अक्सर लोग सोचते हैं कि नौकरी में आने के बाद सिर्फ़ आगे बढ़ने का, तरक़्क़ी करने का ही नई ऊंचाइयों तक पहुँचने का ही रास्ता होता है. मगर हक़ीक़त इसके ठीक उलट है. लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स की प्रोफ़ेसर डोब्रो रिज़ा कहती हैं कि करियर में उतार-चढ़ाव आने तय हैं. कई बार ऐसा होगा कि हमें उम्मीद से कम मिलेगा, झटके लगेंगे.

कई बार बाहरी वजहों से भी नौकरी पर असर होगा, नौकरी छूट भी सकती है. इसलिए ज़रूरी यह है कि हम ख़ुद को ऐसे उतार-चढ़ाव के लिए दिमाग़ी तौर पर तैयार रखें.

कैलिफ़ोर्निया की मैनेजमेंट कंसल्टिंग कंपनी स्विच एंड शिफ़्ट के प्रमुख शॉन मर्फ़ी कहते हैं कि चाहे करियर और उम्र का कोई भी दौर हो.

एक बात जो हम सब चाहते हैं नौकरी से, वो है सम्मान. हम सब चाहते हैं कि कंपनी हमारे तजुर्बे का एहतराम करे, क़ाबिलियत का सही उपयोग करे. हमें काम करने की आज़ादी हो, एक मक़सद हो. हमारे साथ काम करने वाले लोग अच्छे हों, ताकि हम उनसे अच्छे रिश्ते बना सकें.

ये हर प्रोफ़ेशनल की ख़्वाहिश होती है.

(अंग्रेज़ी मेंमूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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