पठानकोट हमला: पर्रिकर पर बरसा पाक मीडिया

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पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के इस बयान की आलोचना हो रही है कि पाकिस्तानी जांच टीम को पठानकोट जाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.

'एक्सप्रेस' के संपादकीय का शीर्षक है- पठानकोट हमला केस और भारत का नकारात्मक रवैया.

अख़बार लिखता है कि भारतीय रक्षा मंत्री ने वही पुरानी रट दोहराते हुए कहा कि पाकिस्तानी जांच टीम को पठानकोट एयरबेस का दौरा करने की अनुमति नहीं होगी, बल्कि भारत ख़ुद पाकिस्तान को सबूत सौंपेगा, वो उनके मुताबिक़ कार्रवाई करता जाए.

पठानकोट हमले की जांच में पाकिस्तान की तरफ़ से हर तरह के सहयोग का दावा करते हुए अख़बार लिखता है कि गुजरांवाला में एक एफ़आईआर भी दर्ज हुई.

अख़बार के मुताबिक़ पहली बार दुश्मन सरज़मीन पर घटी घटना के लिए पाकिस्तान में केस दर्ज किया गया है, लेकिन भारत सहयोग नहीं कर रहा है ताकि घटनास्थल का मुआयना कर सभी तथ्यों की पड़ताल हो सके.

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Image caption जनवरी में पठानकोट एयरबेस को बनाया गया था निशाना

'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि जब भारत 'हमारी जांच टीम को पठानकोट एयरबेस में जाने ही नहीं दे रहा है तो फिर साझा जांच टीम के प्रमुख को भारत जाने की ज़रूरत क्या है.'

अख़बार कहता है कि पठानकोट हमले के सिलसिले में भारत के रवैये से यही संकेत मिलता है कि वो पाकिस्तान को दबाव में रखने और उसके साथ बातचीत के सभी दरवाज़े बंद करने की ठान चुका है.

अख़बार ने इस मुद्दे पर पाकिस्तानी हुकमरानों की भी आलोचना की है जो उसके मुताबिक़ भारत के सामने रक्षात्मक मुद्रा में रहते हैं.

'औसाफ़' लिखता है कि भारत अपने यहां हर घटना के बाद पाकिस्तान को दबाव में रखता है लेकिन पाकिस्तान कभी ऐसी प्रभावी कूटनीति से काम नहीं लेता, जैसी होना चाहिए.

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Image caption भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस ट्रेन में 2007 में धमाके हुए थे

अख़बार लिखता है कि सारी दुनिया जानती है कि समझौता एक्सप्रेस धमाका एक दहशतगर्द हमला था और पाकिस्तान ने बार-बार इसकी जांच के नतीजों से अवगत कराने को कहा था लेकिन भारतीय लीडरों ने कभी अपने वादे को पूरा नहीं किया.

अख़बार कहता है कि भारत में कोई भी घटना हो, हर बार उंगली पाकिस्तान पर उठा दी जाती है लेकिन उसकी चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता और पठानकोट हमले के सिलसिले में भी ऐसा ही हो रहा है.

वहीं रोज़नामा 'पाकिस्तान' ने टी-20 वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तानी टीम को भारत भेजने की अनुमति देने के फ़ैसले का स्वागत किया है.

अख़बार लिखता है कि भारत ने तो यूएई में तयशुदा सिरीज़ के अलावा क्रिकेट रिश्ते बहाल करने के लिए मिनी सिरीज़ खेलने से भी इनकार कर दिया तो अंदेशा था कि कहीं पाकिस्तान की तरफ़ से भी इनकार ही न कर दिया जाए.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान सरकार ने एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट से हटने की बजाय गेंद को भारत के पाले में फेंक दिया है कि वो पाकिस्तानी टीम और पाकिस्तानी दर्शकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने के साथ-साथ उन्हें वीज़ा भी दे ताकि वो मैच देखने जा सकें.

उधर 'दुनिया' लिखता है कि सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ ने उत्तरी वज़ीरिस्तान में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ जारी ऑपरेशन ज़र्बे-अज़्ब का आख़िरी चरण शुरू करने की हिदायत दी है.

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अख़बार लिखता है कि इस ऑपरेशन के कारण चरमपंथी वारदातों में कमी आई है और आख़िरी चरण दहशतगर्दी के ताबूत में आख़िरी कील होगा.

लेकिन अख़बार ये भी कहता है कि ये मामला इतना आसान भी नहीं जितना समझा जा रहा है क्योंकि दूसरा चरण पहले चरण से ज़्यादा मुश्किल, लंबा और संयम की परीक्षा लेना वाला होगा.

अख़बार कहता है कि पहले चरण में तो 'दुश्मन हमारे सामने था और लक्ष्य साफ़ था लेकिन आख़िरी चरण में हमें अपने बीच छिपे ग़द्दारों की पहचान करनी होगी और उन्हें ख़त्म करना होगा.'

रुख़ भारत का करें तो पिछले दिनों में संसद में दिए अपने भाषण से सुर्ख़ियों में आईं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरान पर रोज़नामा 'ख़बरें' का संपादकीय है- अदाकार नेता.

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Image caption राज्यसभा में भाषण के दौरान स्मृति ईरानी की दलित नेता मायावती से तकरार भी हुई

अख़बार लिखता है न सिर्फ़ भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक स्मृति ईरानी को देवी दुर्गा का रूप बता रहे हैं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनके पूरे भाषण को शेयर किया है.

लेकिन अख़बार कहता है कि रोहित वेमुला पर होने वाली बहस में उनका भाषण अगर सच पर आधारित होता तो वाक़ई इतिहास में दर्ज होता, लेकिन जिस तरह से उन्होंने झूठ पर पर्दा डालने की कोशिश की, वो वाक़ई अफ़सोसनाक है.

अख़बार कहता है कि राज्यसभा के ज़रिए संसद में आने वाले कलाकार बहुत दिनों तक समझ ही नहीं पाते हैं कि क्या करें, लेकिन जब पार्टी की तरफ़ से स्क्रिप्ट थमा दी जाती हैं तो फिर वो उसके मुताबिक़ अपनी अदाकारी का जलवा दिखाने लगते हैं.

उधर 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने अपने संपादकीय में हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान कथित तौर पर सामूहिक बलात्कारों के मुद्दे को उठाया है.

अख़बार लिखता है कि मुरथल इलाक़े में 10 महिलाओं के सामूहिक बलात्कार के मामले में हाई कोर्ट ने सख़्त रुख़ अपनाया है और सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.

अख़बार लिखता है कि हाल के सालों में एक चलन बन गया है कि लोग अपनी मांगों के साथ सड़क पर उतरते हैं और सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचाते हैं और यही नहीं इसके बाद सरकार उनकी बातें मान लेती है.

अख़बार कहता है कि ये चलन रुकना चाहिए और ऐसे लोगों से सख़्ती से निपटना चाहिए ताकि तोड़फोड़ और आगज़नी का सिलसिला रुके.

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