अंग्रेज़ दिन में आठ बार बोलते हैं सॉरी

  • 29 फरवरी 2016
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क्या आपको मालूम है कि ब्रिटेन के लोग सबसे ज़्यादा कौन सा शब्द बोलते हैं? जवाब सुनेंगे तो चौंक जाएंगे.

आम ब्रितानी नागरिक सबसे ज़्यादा 'सॉरी' शब्द का इस्तेमाल करते हैं!

कभी वो आपसे ख़राब मौसम के लिए माफ़ी मांगेंगे तो कभी कोई और उनसे टकरा गया तो भी कहेंगे, 'सॉरी.' कहते हैं कि ब्रितानी नागरिक घंटे में औसतन एक-दो बार सॉरी बोल ही देते हैं.

हाल ही में एक हज़ार ब्रितानी नागरिकों पर एक सर्वे हुआ. पता चला कि हर अंग्रेज़ दिन में कम से कम आठ बार माफ़ी मांगता है. वहीं क़रीब बारह फ़ीसद ऐसे हैं जो दिन भर में बीस बार सॉरी बोलते हैं. इसी से आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि सॉरी शब्द का ब्रिटिश समाज में किस क़दर चलन है.

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ब्रितानियों की इस आदत के बारे में वहां के लेखक हेनरी हिचिंग्स ने बेहद दिलचस्प टिप्पणी की है.

वो कहते हैं कि अंग्रेज़ अक्सर ऐसी ग़लतियों के लिए माफ़ी मांगने को तैयार रहते हैं जो उन्होंने की ही नहीं. उन्हें उस ग़लती के लिए सॉरी कहने में दिक़्क़त होती है, जो उन्होंने वाक़ई में की होती है.

सवाल ये है कि क्या वाक़ई ब्रितानी लोग, बाक़ी दुनिया के लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा माफ़ी मांगते हैं? अगर सच में ऐसा है तो आख़िर इसकी वजह क्या है? क्या ये अच्छी बात है? या फिर बुरी आदत है?

पता लगाने की कोशिश करते हैं. आदतन सॉरी कहते हैं अंग्रेज़?

आम तौर पर माना जाता है कि ब्रिटेन और कनाडा के लोग, अमरीकियों के मुक़ाबले ज़्यादा सॉरी बोलते हैं. मगर, वो दूसरे देशों के मुक़ाबले ज़्यादा बार माफ़ी मांगते हैं, इसका पता लगाना बेहद मुश्किल है.

अमरीका की पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक करीना शुमन ने इस बारे में काफ़ी काम किया है. वो कहती हैं कि अलग-अलग देशों में कैसा चलन है? लोग किस बात पर माफ़ी मांगते हैं? अंग्रेज़ों से ज़्यादा बार सॉरी कहते हैं या फिर कम. इसके सबूत जुटा पाना बेहद मुश्किल है.

एक तरीक़ा ये हो सकता है कि आप लोगों को कोई सिचुएशन बताएं और फिर पूछें कि ऐसी हालत में आप क्या कहेंगे? ऐसा ही एक सर्वे हुआ 'यूगव पॉल' का.

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इसमें 1600 ब्रिटिश और एक हज़ार अमरीकियों की राय मांगी गई. सर्वे के मुताबिक़ हर दस अमरीकियों के मुक़ाबले पंद्रह ब्रिटिश सॉरी कहने को तैयार थे. यानी अमरीकियों के मुक़ाबले ब्रितानी, पचास फ़ीसद ज़्यादा बार माफ़ी मांगते हैं.

मगर, इसी सर्वे में ब्रिटिश और अमरीकी नागरिकों में कई समानताएं भी देखने को मिलीं. दोनों ही देशों के तीन चौथाई लोग, किसी के काम में दख़ल देने पर सॉरी कहने को राज़ी दिखे. इसी तरह किसी मीटिंग के लिए देर से पहुंचने पर जहां 84 फ़ीसद अंग्रेज़ माफ़ी मांगने को तैयार थे, वहीं केवल 74 फ़ीसद अमरीकी इसके लिए सॉरी कहने को राज़ी थे.

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हालांकि, किसी काल्पनिक हालत में लोग क्या करेंगे और असल ज़िंदगी में क्या करते हैं, इसमें बहुत फ़र्क़ होता है.

ब्रितानियों और अमरीकियों पर हुए 'यूगव सर्वे' को ही लें. किसी और के फूहड़पने के लिए जहां 36 फ़ीसदी अंग्रेज़ माफ़ी मांगने को राज़ी थे, वहीं केवल 24 फ़ीसदी अमरीकियों ने ऐसा करने पर हामी भरी.

इस बारे में मशहूर ब्रितानी सोशल एंथ्रोपोलॉजिस्ट केट फॉक्स ने बड़ा दिलचस्प प्रयोग किया. उन्होंने इसे अपनी किताब 'वाचिंग द इंग्लिश' में बयां किया है.

केट, इंग्लैंड के अलग-अलग शहरों, क़स्बों और गांवों में गईं. वो लोगों से जान-बूझकर टकराती थीं और फिर उनकी प्रतिक्रिया नोट करती थीं. उन्होंने विदेश गए अपने साथियों से भी ऐसा तजुर्बा करने को कहा.

केट के इस प्रयोग के दिलचस्प नतीजे आए. वो बताती हैं कि क़रीब अस्सी फ़ीसद मामलों में अंग्रेज़ों ने केट की ग़लती होने के बावजूद, सॉरी बोला.

अक्सर, ब्रितानियों ने सॉरी ऐसे बोला जैसे, बुदबुदा रहे हों, जिसे सुन पाना कई बार मुश्किल भी लगा. यानी ब्रिटिश, आदतन सॉरी बोल देते हैं, जबकि कई बार उनकी ग़लती नहीं होती. अंग्रेज़ों के मुक़ाबले में सॉरी कहने में अगर किसी और देश के लोग संकोच नहीं करते तो वो हैं जापानी. ऐसा केट अपनी किताब में लिखती हैं.

अंग्रेज़ी के सॉरी शब्द की उत्पत्ति, पुरानी इंग्लिश भाषा के शब्द सेरिग से हुई है. सेरिग का मतलब है दुख या तकलीफ़ में डूबा हुआ इंसान.

ज़बान के मशहूर अमरीकी एक्सपर्ट, एडविन बैटीस्टेला कहते हैं कि हम सॉरी शब्द का इस्तेमाल कई तरह से, कई मक़सद से करते हैं.

एडविन के मुताबिक़, अंग्रेज़ सॉरी ज़्यादा भले बोलते हैं. मगर, हर बार उन्हें अफ़सोस होता हो ये ज़रूरी नहीं. एडविन कहते हैं कि कई बार लोग हमदर्दी जताने के लिए भी सॉरी कह देते हैं.

शायद अंग्रेज़ और कनाडाई, ज़्यादातर इसी इरादे से सॉरी बोलते हों. मगर, इसका मतलब ये नहीं कि हर बार वो माफ़ी मांग रहे होते हैं.

इस बारे में कुछ और जानकार ये भी कहते हैं कि कई बार लोग, अपनी बेहतर सामाजिक हैसियत के लिए भी माफ़ी मांगते नज़र आते हैं.

ब्रितानी समाज में लोग दूसरे के प्रति इज़्ज़त को काफ़ी तरजीह देते हैं. साथ ही, वो दूसरे के पर्सनल स्पेस में दख़ल देना भी पसंद नहीं करते. इसीलिए दूसरे से बात करते वक़्त वो सोचते हैं कि दूसरे के काम में अड़ंगा लग रहा है और इसके लिए वो पहले ही माफ़ी मांग लेते हैं.

वहीं, अमरीकी, खुले दिमाग़ के होते हैं. बिंदास होते हैं. शिष्टाचार के बजाय दोस्त बनाने में ज़्यादा यक़ीन रखते हैं. इसीलिए, कई बार जब अंग्रेज़, सॉरी कहते हैं तो अमरीकियों या कुछ और लोगों को अटपटा लगता है.

किसी अनजान से कोई जानकारी लेने से पहले या फिर उसके पास बैठने के लिए अंग्रेज़ अक्सर सॉरी कहते हैं. उन्हें लगता है कि बिना एडवांस में माफ़ी मांगे वैसा करना, किसी की निजता में दख़ल होगा. जो उनके समाज के हिसाब से बहुत ख़राब बात है.

फॉक्स कहती हैं कि अंग्रेज़ों ने सॉरी का बेजा इस्तेमाल कर इसकी अहमियत घटा दी है. हालांकि वो ये भी कहती हैं कि बार-बार सॉरी कहना इतना भी बुरा नहीं, ख़ास तौर से ब्रिटिश समाज के लिए. वो कहती हैं कि दुनिया में बहुत से शब्दों का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल होता है. मगर, 'सॉरी' इनमें से एक बिल्कुल नहीं.

वैसे, सॉरी कह देने से कई फ़ायदे भी होते हैं. मसलन, बिना अपनी ग़लती के किसी बात के लिए माफ़ी मांगकर आप किसी का भरोसा जीत सकते हैं. ख़राब मौसम के लिए सॉरी बोलकर किसी को दोस्त बना सकते हैं.

हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल की प्रोफ़ेसर एलिसन वुड ब्रुक्स ने इस बारे में बड़े मज़े का तजुर्बा किया.

ब्रुक्स और उनके साथियों ने एक कलाकार को अपने मिशन में शामिल किया. इस कलाकार से कहा गया कि वो बारिश के दिनों में अमरीकी रेलवे स्टेशन पर जाए और लोगों से उनके मोबाइल फ़ोन मांगे, इस्तेमाल के लिए. जब इस कलाकार ने लोगों से मौसम के बारे में सॉरी कहते हुए फ़ोन मांगा तो 47 फ़ीसद ने अपने फ़ोन उसे दे दिए.

वहीं जब इस कलाकार ने लोगों से सीधे-सीधे जाकर पूछा कि आप मुझे अपना फ़ोन दे सकते हैं क्या, तो केवल नौ फ़ीसद लोगों ने हां में जवाब दिया.

मतलब साफ़ है कि अगर आप किसी अनजान से सॉरी कहते हुए बात शुरू करते हैं तो आपके दोस्ताना रवैये, विनम्रता का उसे एहसास होता है. वुड ब्रुक्स कहती हैं कि ख़राब मौसम के लिए माफ़ी मांगकर, आप सामने वाले से हमदर्दी जताते हैं, उसका भरोसा जीत लेते हैं.

अंग्रेज़ों के अलावा महिलाओं के बारे में भी माना जाता है कि वो सॉरी शब्द का ज़्यादा इस्तेमाल करती हैं. अमरीकी मनोवैज्ञानिक करीना शुमन ने इस बारे में एक रिसर्च की थी.

उन्होंने यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों को अपने बारह दिनों के तजुर्बे नोट करने को कहा. शुमन ने ये पाया कि वाक़ई, महिलाएं, मर्दों के मुक़ाबले ज़्यादा बार सॉरी बोलती हैं.

मगर छात्रों ने ये भी महसूस किया कि उन्हें महिलाओं के सॉरी कहने की ज़रूरत महसूस भी हुई. कई बार उनकी ग़लतियों की वजह से, और कई बार जब वो दूसरों की ग़लती का शिकार हुईं.

अब इस हिसाब से तो, मर्द हों या महिलाएं, दोनों ही औसतन बराबर ही सॉरी बोलते हैं. यानी ये कहना कि महिलाएं ज़्यादा सॉरी बोलती हैं, ग़लत है. इसी तरह ये सोचना कि मर्द माफ़ी मांगने में संकोच करते हैं, ग़लत है. उन्हें माफ़ी मांगने की वजह ही कम नज़र आती है.

क्या माफ़ी मांगना कमज़ोरी की निशानी है?

अब, अगर लोगों को माफ़ी मांगने की वजह कम नज़र आती है. तो क्या, वो ये मानते हैं कि सॉरी बोलना उनकी कमज़ोरी की निशानी है? क्या अपने ग़रूर को ताक पर रखकर माफ़ी मांग लेने से कोई छोटा हो जाता है?

हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल की प्रोफ़ेसर एलिसन वुड ब्रुक्स इस बात को समझाती हैं.

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वो कहती हैं कि अक्सर लोग सॉरी कहने को अपनी ख़ुद्दारी से जोड़ लेते हैं. सोचते हैं कि बेवजह माफ़ी मांगने से ग़लती उनकी मानी जाएगी. इसीलिए लोग सॉरी कहने से कतराते हैं.

मगर, ब्रुक्स कहती हैं कि ईमानदारी से माफ़ी मांग लेने से सामने वाले को बेहतर महसूस होता है. उसकी भावनाओं को लगी चोट पर मरहम लग जाता है. सच्चे दिल से माफ़ी मांगकर आप किसी का भरोसा जीतने में कामयाब हो सकते हैं.

तो, सवाल ये है कि माफ़ी कैसे मांगी जाए. ज़बान के अमरीकी एक्सपर्ट एडविन बैटीस्टेला इसका बहुत आसान नुस्ख़ा सुझाते हैं. वो कहते हैं कि बचपन में जैसे आपकी मां ने लोगों से माफ़ी मांगना सिखाया था, वैसे ही दूसरों से माफ़ी मांगो.

जैसे कि, आप किसी के ऊपर पत्थर फेंकते थे, तो आपको कहा जाता था कि जाओ, उससे कहो कि तुमने पत्थर मारकर ग़लती की है. आइंदा से ऐसा नहीं करोगे.

इस तरह से सॉरी कहने का साफ़ सा मक़सद है. सामने वाले को पता चलना चाहिए कि आप अपनी किस ग़लती के लिए, किस बर्ताव के लिए माफ़ी मांग रहे हैं.

अब सवाल ये कि आख़िर कितनी बार सॉरी कहा जाए?

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तो जनाब, सिर्फ़ एक बार सॉरी कहना काफ़ी है, छोटी-मोटी बात के लिए.

अगर आपकी नज़र में आपने बड़ी ग़लती की है तो आप दो बार सॉरी कह सकते हैं. इससे ही आपने दिल में जो अफ़सोस महसूस किया है, वो सामने वाले पर ज़ाहिर हो जाएगा. आप उसका भरोसा फिर से जीत लेंगे.

मगर, अंग्रेज़ों की बात हो तो उनके लिए इससे भी दोगुनी बार सॉरी कहना होगा.

ब्रिटिश मनोविज्ञानी केट फॉक्स कहती हैं कि हमारा एक बार सॉरी कहना, माफ़ी मांगना माना ही नहीं जाएगा.

इसे हमें कई बार दोहराना होगा, लच्छेदार ज़बान में. तब जाकर माना जाएगा कि किसी ब्रितानी ने माफ़ी मांगी है.

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