भारत की जी हुज़ूरी बंद करें: पाक मीडिया

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पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में पठानकोट हमले को लेकर भारत पर तल्ख टिप्पणियां जारी हैं और समंदर में खम्भे लगाने के भारत के फैसले की भी चर्चा है.

‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि पठानकोट हमले के बाद प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की अध्यक्षता में हुई बैठक में जैश-ए-मोहम्मद को हमले में शामिल बताया गया, गिरफ़्तारियां हुईं और गुजरावालां में केस दर्ज हो गया.

अख़बार कहता है कि भारत ने भी इन क़दमों पर संतोष जताया लेकिन भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के पाकिस्तान विरोधी बयानों में कोई कमी नहीं आई और वो पाकिस्तान को लगातार धमकियां दे रहे हैं.

पाकिस्तानी जांच टीम को पठानकोट में न जाने देने के भारतीय रक्षा मंत्री के बयान का हवाला देते हुए अख़बार कहता है कि भारत के आक्रामक रवैए पर पाकिस्तान की तरफ से जी हुजूरी का चलन ठीक नहीं है.

अख़बार ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि पाकिस्तान तो पठानकोट हमले को लेकर हर तरह का सहयोग कर रहा है, लेकिन भारत ने समझौता एक्सप्रेस जांच के बारे में कुछ भी साझा नहीं किया है.

‘जंग’ की राय है कि भारत पठानकोट हमले को सिर्फ़ पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है.

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Image caption पर्रिकर को लेकर पाकिस्तानी मीडिया में लगातार तवज्जो बनी हुई है

अख़बार ने समझौता एक्सप्रेस धमाके की जांच को लेकर भारत पर ढुलमुल रवैया अपनाने का इल्जाम लगाते हुए लिखा है कि उसके इस दोहरे रवैये को पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने रखे और अपने रुख़ पर क़ायम रहे.

अख़बार ने लिखा है कि मनोहर पर्रिकर ने तो यहां तक धमकी दे डाली है कि जितना दर्द उनको पहुंचा है, उससे ज़्यादा दर्द उन लोगों को पहुंचा कर रहेंगे जिन्होंने भारत को ये जख़्म देने की कोशिश की है.

एक्सप्रेस का संपादकीय है – भारत का समंदर में खम्भे लगाने का एलान.

अख़बार के मुताबिक भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय जलसीमा की निशानदेही के लिए खम्भे लगाए जा रहे हैं जिससे मुछआरों को समुद्री सीमा का पता चल सकेगा.

इस क़दम की सराहना करते हुए अख़बार ने लिखा है कि अकसर ग़लती से मछुआरे दूसरे देश की जलसीमा में चले जाते हैं और फिर वहां की जेल में बंद रहते हैं और कई बार तो अपने देश के मछुआरों को छुड़ाने के लिए अधिकारी दूसरे देश के मछुआरों को गिरफ़्तार कर लेते हैं.

इसके अलावा, कराची के पूर्व मेयर मुस्तफ़ा कमाल की तरफ़ से एमक्यूएम पर लगाए गए गंभीर आरोप और अपनी ख़ुद की पार्टी बनाने के ऐलान की भी पाकिस्तानी मीडिया में ख़ूब चर्चा है.

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Image caption एमक्यूएम पर बरसे मुस्तफा कमाल

रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ के मुताबिक़ मुस्तफ़ा कमाल ने एमक्यूएम के नेता अल्ताफ़ हुसैन को भारतीय खुफिया एजेंसी 'रॉ' का एजेंट बताया है और ये भी कहा कि उन्होंने मुहाजिरों की दो नस्लें बर्बाद कर दीं और नौजवानों को क़ातिल बना दिया.

मुस्तफ़ा कमाल ने अपनी पार्टी का एलान करते हुए कहा कि वो देश में राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने के लिए काम करेंगे, लेकिन अख़बार कहता है कि देश के दो ताकतवर जनरल- ज़िया उल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ ऐसा नहीं कर पाए तो मुस्तफ़ा कमाल और उनकी पार्टी कैसे कर पाएगी?

अख़बार कहता है कि राष्ट्रपति प्रणाली लागू कराना तो दूर की बात है, उन्हें तो सियासी तौर पर ज़िंदा रहने के लिए भी संघर्ष करना होगा और कामयाबी पर फिर भी सवालिया निशान रहेगा.

उधर ‘दुनिया’ ने एशिया कप में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के प्रदर्शन पर सवाल उठाए हैं.

अख़बार लिखता है कि एशिया कप में पाकिस्तान के बांग्लादेश से मैच हारने पर अपनी तन्ख़्वाह से जुआ खेलने वाले एक सरकारी कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली जबकि एक शादीशुदा महिला ने नहर में कूद कर जान दे दी.

अख़बार ने एक तरफ़ लोगों को जागरुक करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है ताकि वो ऐसे घातक क़दम न उठाएं, तो दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी क्रिकेट में बदलाव की पैरवी की है.

अख़बार कहता है कि बेशक मैच में दो टीमों में से कोई एक ही जीत सकती है लेकिन पूरी जान लड़ा कर हार जाने और दूसरी टीम को जीत तश्तरी में सजा कर देने में फ़र्क़ होता है.

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रुख़ भारत का करें तो जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की रिहाई पर 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' लिखता है कि देशभक्ति के नाम पर एक खास विचारधारा को थोपने का प्लान फिलहाल फ्लॉप रहा, लेकिन इस वजह से सिस्टम को जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई मुश्किल होगी.

इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए अख़बार लिखता है कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है, लेकिन इसके एक हिस्से ने सरकार के प्रचारक की भूमिका अदा करना ही ज़्यादा बेहतर समझा.

अख़बार के मुताबिक कन्हैया की रिहाई से न सिर्फ़ जेएनयू के छात्रों और अध्यापकों ने बल्कि देश के सभी प्रगतिशील लोगों ने राहत की सांस ली है जो जेएनयू और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों की आज़ादी के समर्थक हैं.

पांच राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु़, पुद्दुचेरी और पश्चिम बंगाल में चुनावों की घोषणा पर रोज़नामा 'ख़बरें' लिखता है- चुनावी बिगुल.

अख़बार लिखता है कि कुल मिलाकर ये मोदी सरकार का इम्तिहान है कि उसकी लोकप्रियता में इज़ाफ़ा हुआ है या फिर उसका ग्राफ़ गिर रहा है.

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