'... पत्थर मार-मार कर औरत की जान ले लो'

  • 9 मार्च 2016
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इस्लामिक स्टेट के कब्ज़े में जो इलाक़ा है, वहाँ चलाए जा रहे शासन की भयावह असलियत का अंदाज़ा लगाना बाहर के लोगों के लिए बेहद मुश्किल है.

लेकिन सीरिया के अंदर कुछ एक्टिविस्ट हैं जो अपने जीवन को ख़तरे में डालकर दुनिया को वहां का हाल बता रहे हैं.

सीरिया डायरी: पहला हिस्सा

बीबीसी पिछले तीन महीनों से इस्लामिक स्टेट की राजधानी रक्क़ा के एक युवक के संपर्क में है. उनके दिल दहला देने वाले अनुभवों की पहली किस्त आप पढ़ चुके हैं.

आज पढ़िए 40 कोड़ों की सज़ा मिलने के बाद इस युवा के साथ आगे क्या हुआ -

ज़रा सी भी दया दिखाए बिना वह मुझे कोड़े मारता रहा. उसकी आंखों में मुझे दिख रहा था कि उसे मुझे कोड़े मारते हुए बहुत गर्व महसूस हो रहा था.

मैं हेस्बा, आईएस की धार्मिक पुलिस के मख्यालय से निकला और अपने घर के दरवाज़े तक पहुंचते पहुंचते गिर गया.

मेरी हालत देखकर और ये सुनने के बाद कि मेरे साथ क्या हुआ, मेरी गर्भवती बहन को शॉक लगा और उसका रक्तस्राव होने लगा.

हम समझ गए कि जितनी जल्दी हो सके उसे गाइनेकॉलोजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) के पास ले जाना होगा.

लेकिन जब हम क्लिनिक पर पहुंचे तो देखा कि वह बंद थी.

बाहर खड़े एक आदमी ने मुझे बताया, "यह डॉक्टर सालों से मेरा पड़ोसी था लेकिन आइएस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया और क्लिनिक बंद कर दिया. उन्होंने पुरुष डॉक्टरों के महिला मरीज़ों के इलाज करने पर प्रतिबंध लगा दिया है."

हमें एक महिला गाइनेकॉलोजिस्ट को ढूंढने निकलना पड़ा. हमने बहन को घर जाकर आराम करने को कह दिया.

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उसी दिन, बाद में, मैं अपने एक पुराने दोस्त से टकरा गया. वह घबराया हुआ दिख रहा था.

उसने मुझे एक कोने में खींचा और फुसफुसाकर कहा, "हमने आइएस के ख़िलाफ़ काम करने वाला एक गुप्त प्रचार दल बनाया है. हम पूरी दुनिया को बताना चाहते हैं कि यह हत्यारे हमारे शहर में क्या कर रहे हैं. इसमें तुम भी अपनी भूमिका निभा सकते हो."

घर लौटते हुए मैं अपने दोस्त मोहम्मद से मिला, जो एक दुकान चलाता है. उसने सड़क के पार एक दुकान की ओर इशारा किया जिसके मालिक को वह सालों से जानता था.

आइएस के कुछ आदमी उससे बात कर रहे थे. उनमें से एक के हाथ में बहुत से काग़ज़ थे. उनमें से एक चीखा, "अरे! इस दुकान का मालिक कौन है?"

मोहम्मद ने जवाब दिया, "ये मेरी है, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?"

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उसने कहा, "हम लोग ज़क़ात से हैं."

यह गरीबों को दिया जाने वाला दान होता है लेकिन आइएस इसे टैक्स की तरह वसूलता है.

वह आगे कह रहा था, "और हम वह पैसा लेने आए हैं जो तुमने हमें देना है."

मोहम्मद ने ज़ोर देकर कहा कि वह पहले ही सब दे चुका है और उस पर कुछ भी बाक़ी नहीं है.

"चुप रहो...!" आइएस का आदमी गरजा. "तुम्हें एक लाख सीरियाई पाउंड देने ही होंगे."

मोहम्मद सदमे में आ गया, "लेकिन यह तो बहुत ज़्यादा पैसा है."

लेकिन उसे जैसे तैसे करके पूरा पैसा देना पड़ा. जिन लोगों ने आइएस का विरोध किया उनके कटे हुए सिर पार्कों की बाड़ और लैंप पोस्ट पर लटके हुए नज़र आए, एक बर्बर चेतावनी की तरह...

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उस रात हमारा घर धमाकों की आवाज़ों से दहल उठा. मैंने ऊपर बमवर्षक विमानों को उड़ते देखा. मैंने टीवी चलाया और समाचार में देखा कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेनाएँ आइएस के ख़िलाफ़ पहला हवाई हमला कर रही थीं.

अगले दिन एक स्थानीय टैक्सी ड्राइवर ने मुझे बताया कि आइएस की बहुत सी इमारतों को निशाना बनाया गया है.

उसने मुझे चेतावनी दी कि पुलिस बड़ी संख्या में गलियों में घूम रही है और उन जासूसों की तलाश कर रही है जिन्होंने हवाई जहाज़ों को जानकारी दी है.

इतने में मैंने देखा कि एक गहरे गड्ढे के पास भीड़ जमा है. अंदर एक महिला दुबकी हुई बैठी है. मैंने लोगों से पूछा कि वह कौन है और वहां क्या कर रही है.

इससे पहले कि मुझे कोई जवाब मिलता नक़ाब पहले एक लंबे आदमी ने पढ़ना शुरू किया, "यह महिला बदचलन है और इसकी सज़ा है कि पत्थर मार-मार इसको जान से मार दिया जाए!"

उसके शब्द ऊपर आ रहे जहाज़ों के शोर में दब गए... एक सामान बेचने वाला चिल्लाया "छुपो, छुपो!"

बाज़ार पर हमला हुआ था. बड़े धमाके हो रहे थे और हर ओर लोगों के शरीर के टुकड़े पड़े थे. ज़्यादातर आम नागरिक थे. यह एक रूसी हवाई हमला था जिसने चरमपंथियों को निशाना बनाना था.

क्या हम ज़मीन पर जिस चरमपंथ का सामना कर रहे हैं वह पर्याप्त नहीं है, जो तुम इसे आसमान से भी बरसा रहे हो?

(अल-शरकिया 24 के एक्टिविस्ट आइएस की कथित राजधानी रक्का में रह रहे हैं. अल-शरकिया 24 आइएस के कब्ज़े वाले स्थानों के हालात के बारे में दुनिया को बताने के लिए काम कर रहे समूहों में से एक है. यह स्टोरी बीबीसी संवाददाता माइक थॉमसन से इस एक्टिविस्ट की लंबी बातचीत पर आधारित है. इस डायरी का तीसरा पन्ना गुरुवार को पढ़िए.)

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