गालियों की दिलचस्प दुनियां की सैर पर चलें

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हम सब कभी न कभी गाली-गलौज करते हैं. कभी ग़ुस्से में, तो कभी दोस्तों के बीच हंसी-मज़ाक़ में. आम-तौर पर बात-बात पर गाली देने वालों को जाहिल, गंवार माना जाता है.

अगर कोई बोलचाल में गालियों का ज़्यादा इस्तेमाल करता है तो उसे भरोसे के क़ाबिल नहीं माना जाता. कुल मिलाकर, गाली-गलौज करना अच्छा नहीं माना जाता है.

जो भी ये करता है उसकी इमेज बाक़ी लोगों की नज़र में अच्छी नहीं होती.

मगर, दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो, जिसने कभी न कभी गालियां न निकाली हों. रिसर्च बताते हैं कि इंसान आम तौर पर छह बरस की उम्र से ही गालियां देना शुरू कर देते हैं.

यही नहीं, हर आदमी अपनी ज़िंदगी का औसतन आधा से पौन फ़ीसदी वक़्त गालियां देने में बर्बाद करता है.

चौंक गए न! गालियों की बात से चौंकने वाली सिर्फ़ यही बात नहीं. जिसे हम गंवारू भाषा कहकर नापसंद करते हैं, असल में वो गालियां देना कई बार फ़ायदे का सौदा भी हो सकता है. कई बार दूसरों से अपनी बात मनवाने के लिए तो कभी दिल के दर्द दूर करने के लिए.

तो चलिए आज आपको गालियों की दुनिया की दिलचस्प सैर कराते हैं.

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पहली बात तो ये कि आम बोलचाल के लिए हम अपने दिमाग़ के जिस हिस्से की मदद लेते हैं, गाली देने में उस हिस्से का कोई रोल नहीं होता. यानी गालियों की हमारे दिमाग़ के अंदर ही अलग दुनिया है.

मनोवैज्ञानिक और लेखक रिचर्ड स्टीफ़ेंस का कहना है कि हमारी ज़ुबान को कंट्रोल करने वाले दिमाग़ का हिस्सा अलग है, जो इंसान के विकास की प्रक्रिया में बाद में विकसित हुआ.

वहीं, दिमाग़ के जिस हिस्से से गालियां निकलती हैं वो इंसान के दिमाग़ का शुरुआती, पुराना इलाक़ा है. स्टीफ़ेंस बताते हैं कि जिन लोगों को आम ज़ुबान बोलने में दिक़्क़त होती है, वो भी फ़र्राटे से गालियां दे लेते हैं, गाना गा लेते हैं.

कई लोगों को तो गालियां निकालने का ख़ब्त होता है. इसका सीधा ताल्लुक़ हमारे दिमाग़ की बनावट से है.

अलग-अलग ज़ुबानों में गालियों को लेकर अलग-अलग सोच भी है. जैसे अंग्रेज़ी में पहले, गाली-गलौज या कोसने का सीधा ताल्लुक़, धार्मिक भावनाओं से था.

मध्य युग में अंग्रेज़, धार्मिक बातों का मज़ाक़ उड़ाने या कोसने को बहुत बुरा मानते थे. उन्हें गालियां देने के बराबर ही माना जाता था.

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आज, शरीर के हिस्सों का नाम लेकर मज़ाक़ बनाना ज़्यादा बुरा माना जाता है. मगर, उस वक़्त औरतों और मर्दों के अंगों को लेकर भद्दे मज़ाक़, गाली देने के दायरे में नहीं आते थे.

ब्रिटिश लेखिका मेलिसा मोर ने गालियों पर किताब लिखी है. वो कहती हैं कि पहले लोगों के बीच इतनी दूरियां नहीं थीं. अक्सर वो एक दूसरे को बिना कपड़ों के देखते थे. इसीलिए एक दूसरे के बदन को लेकर मज़ाक़ बनाने को गाली के तौर पर नहीं गिना जाता था.

हां, धार्मिक भावना पर चोट, ज़रूर गंवारू मानी जाती थी. हालांकि यूरोप में पुनर्जागरण या रेनेसां के दौर के बाद, गालियों का दर्जा बदल गया.

धार्मिक बातों की बजाय, औरतों-मर्दों के शरीर के अंगों के हवाले से गंदी बात कहना ज़्यादा बुरा माना जाने लगा.

वहीं एशिया के तमाम देशों में गाली-गलौज का सीधा ताल्लुक़, सोसाइटी में आपकी हैसियत, आपके पुरखों के रसूख़ से जोड़कर देखा जाता है.

माना जाता है कि जापानी ज़ुबान में गालियां नहीं होतीं. ये धारणा एकदम ग़लत है. उनके यहां सेक्स को लेकर, इतनी गालियां हैं कि गिनना मुश्किल.

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गालियों की दुनिया का दायरा इतना बड़ा है कि बोल और सुन न सकने वालों की सांकेतिक ज़ुबान में भी इसका दख़ल है. इशारों में थोड़े से हेर-फेर से ही सलीक़े की बात कहने वाला जुमला, गाली में तब्दील हो सकता है.

इंसान को गंवारू ठहराने वाली गालियां कई बार बड़े काम की हो सकती हैं. कुछ हालिया रिसर्च से ये बात सामने आई है.

जब हम गालियां देकर बात करते हैं तो इसके हवाले से हम अपना ग़ुस्सा, तकलीफ़ या चिढ़ ज़ाहिर करते हैं. गाली देकर, हम सामने वाले को ये बताते हैं कि उसकी बात, या तरीक़ा हमें पसंद नहीं आया. इस तरह हम हिंसक बर्ताव करने से बच जाते हैं.

गालियों के ज़रिए जो बात हम कहते हैं, वो कई बार आम बोलचाल से ज़्यादा असरदार साबित होती हैं. हम अच्छे से अपनी बात दूसरों को समझा पाते हैं.

नेताओं पर ये बात ख़ास-तौर से लागू होती है. 2014 में इस हवाले से बड़ी दिलचस्प रिसर्च हुई थी. एक ब्लॉग में नेताओं के बारे में कई क़िस्से लिखे गए थे.

जिस भी कहानी में नेता को गाली-गलौज करते हुए बताया गया था, उस पर लोगों ने ज़्यादा यक़ीन किया. हालांकि, इससे लोगों के वोटिंग के इरादे पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.

साफ़ है कि गाली देने वाले नेता पर लोगों ने इसलिए भरोसा किया कि वो बनावटी नहीं लगा. एक बात और है.

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ऑनलाइन बात करने में लोग बेहूदा ज़ुबान का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं. इसलिए भी ब्लॉग में गाली-गलौज वाली कहानी पर लोगों ने ज़्यादा यक़ीन किया. एक रिसर्च के मुताबिक़, ट्विटर पर औसत से क़रीब 64 फ़ीसदी ज़्यादा गालियां देते हैं लोग.

मनोवैज्ञानिक रिचर्ड स्टीफ़ेंस ने इस बारे में एक और दावा किया है. वो कहते हैं कि बात-बात पर गालियां देने वालों की दर्द बर्दाश्त करने की क्षमता ज़्यादा होती है. उन्होंने कॉलेज के छात्रों के साथ एक प्रयोग किया. बेहद ठंडे पानी में उनका हाथ डलवाया और कहा जो दिल में आए वो बोलो.

प्रयोग में शामिल जिन छात्रों ने गाली-गलौज की वो ज़्यादा देर तक ठंडे पानी में हाथ रख पाए. साफ़ है कि गाली देने की वजह से ठंडे पानी से होने वाले दर्द को बर्दाश्त करने में उन्हें मदद मिली. इन लोगों के दिल की धड़कनें भी बढ़ गईं.

मतलब गाली देना एक तरह से पेनकिलर दवा खाने जैसा था, इन छात्रों के लिए.

वैसे, गालियां देकर आप कितनी राहत महसूस करते हैं, ये एक और बात पर निर्भर करता है. वो ये कि आप गालियों को कितना बुरा मानते हैं.

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बचपन में आपको गाली देने के लिए कितनी बार मार पड़ी. अगर मां-बाप ने गाली देने के लिए बचपन में आपको ज़्यादा पीटा है, तो गालियों का आप पर ज़्यादा असर होगा. यानी ग़ुस्से में गालियां देने से आपको दर्द से ज़्यादा राहत महसूस होगी.

यूं तो गाली देना गंवारपन माना जाता है. मगर न्यूज़ीलैंड में हुई एक रिसर्च में इसे विनम्रता का प्रतीक माना गया. वेलिंगटन की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में इस बारे में एक रिसर्च हुई.

ये शोध, कुछ फ़ैक्ट्री मज़दूरों पर हुआ. ये लोग आपस में तो ख़ूब गालियां देकर बात करते थे. मगर दूसरी टीम के सदस्यों के साथ ऐसा नहीं करते थे.

आपस में गाली देकर बात करने को ये अच्छी और ईमानदार बातचीत मानते थे. इससे एक दूसरे के प्रति लगाव ज़ाहिर होता था. काम का तनाव दूर होता था.

ये तो हुई गाली-गलौज के फ़ायदे की बात. मगर, जो लोग गालियां निकालकर बात करते हैं, उनके बारे में लोगों की राय क्या होती है?

हम सब अपने बड़ों के सामने, बॉस के सामने गालियां देने से बचते हैं कि इससे हमारी इमेज ख़राब होगी. गाली देने पर हमें जाहिल, बेसलीक़ा माना जाएगा. कहा जाएगा कि तमीज़ नहीं, तहज़ीब नहीं.

मगर, हालिया रिसर्च इसके उलट कहानी कहते हैं. अब, गालियां देने को कम पढ़े लिखे होने, तमीज़ न होने से जोड़कर नहीं देखा जाता.

ब्रिटेन की लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी में 2004 में हुई रिसर्च बताती है कि आज पढ़े-लिखे अमीर तबक़े के लोग ज़्यादा गालियां देते हैं, बनिस्बत, कम पढ़े-लिखे ग़रीब लोगों के. ऐसे लोगों को गाली-गलौज के इमेज पर असर की भी परवाह नहीं होती.

लेखिका मेलिसा मोर कहती हैं कि ज़रा कल्पना कीजिए. किसी जगह सब पढ़े-लिखे समझदार लोग बैठे हैं.

तमीज़दार दिखने की फ़िक्र में कोई खुलकर बोल नहीं पा रहा, दिल की भड़ास नहीं निकाल पा रहा. ऐसे में खुलकर, ईमानदारी से बात ही नहीं होगी. सब चुपचाप बैठे होंगे, बनावटी मुस्कान बिखेरते.

वो कहती हैं कि गालियां देना, हमारे इंसान होने की निशानी है. अपनी भड़ास निकालने के लिए ये हमारी बुनियादी ज़रूरत है.

तो अगली बार, अगर आपको ग़ुस्सा आए, तो ख़ुद को रोकिएगा नहीं. खुलकर अपनी भड़ास निकाल लीजिएगा. आप गंवार नहीं कहलाएंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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