'पाक टीम को भारत भेजने की क्या मजबूरी है?'

  • 13 मार्च 2016
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भारत में हो रहे टी-20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तानी टीम की भागीदारी और इससे जुड़ी सुरक्षा चिंताएं पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में चर्चा का अहम मुद्दा हैं.

रोज़नामा 'दुनिया' लिखता है कि कई दिनों की कोशिश के बाद सुरक्षा का मसला हल हो गया, लेकिन इस बारे में हुई देरी के लिए अख़बार ने भारत को ज़िम्मेदार बताया है.

अख़बार कहता है कि भारत के ड्रामे की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेश गया कि भारत पाकिस्तान के साथ खेलना ही नहीं चाहता है और ऐसा भी लगा कि पाकिस्तानी टीम के ख़िलाफ़ धमकियां और प्रदर्शनों का जो सिलसिला भारत में जारी है, उसे सरकार का आशीर्वाद प्राप्त है.

अख़बार ने लिखा है कि यह वही भारत है जिसने सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र अपनी टीम को पाकिस्तान भेजने से इनकार कर दिया था, इसलिए अगर वो आगे सभी टीमों, खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों की सुरक्षा की लिखित गारंटी न दे तो भारत में वर्ल्ड कप जैसे आयोजन कराने पर रोक लगा देनी चाहिए.

वहीं रोज़नामा 'इंसाफ़' लिखता है कि भारतीय कट्टरपंथियों ने धमकी दी है कि कोलकाता समेत देश में कहीं भी पाकिस्तानी टीम को नहीं खेलने देंगे.

अख़बार लिखता है कि अगर भारत की सरकार अपने कट्टरपंथियों के आगे बेबस है तो फिर पाकिस्तान की ऐसी क्या मजबूरी है कि टीम को ज़रूर भारत भेजना ही है.

अख़बार कहता है कि देश की जनता अपने प्रधानमंत्री और क्रिकेट बोर्ड से ये तो उम्मीद कर ही सकती है कि वो भारतीय कट्टरपंथियों की धमकियों और वहां की सरकार के बहानों के मद्देनजर ये कहे कि 'हमें आपके साथ क्रिकेट खेलने में कोई दिलचस्पी नहीं है.'

वहीं 'एक्सप्रेस' ने इस मुद्दे पर अपने संपादकीय को शीर्षक दिया- वर्ल्ड टी-20 मैच, भारत के लिए इम्तिहान.

अख़बार लिखता है कि कट्टरपंथी जत्थे पाकिस्तान-भारत टी-20 के बीच में फिर नफरत और तनाव की दीवार खड़ी करने की कोशिश में है.

अख़बार की टिप्पणी है कि पाकिस्तानी टीम ने एक मुश्किल समय में भारत में जाकर खेलने की चुनौती स्वीकार की है और इस क्रिकेट डिप्लोमेसी को जगह दी जानी चाहिए ताकि अन्य मैचों की तरह पाक-भारत मैचों का भी एक नया इतिहास रचा जा सके.

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दूसरी तरफ रोजनामा पाकिस्तान ने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमान बेचने पर रोक लगाने वाला प्रस्ताव अमरीका कांग्रेस में नामंजूर होने पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार कहता है कि अमरीकी सरकार ने हर तरफ से विरोध के बावजूद जब पाकिस्तान को आठ एफ-16 लड़ाकू विमान देने का मन बना लिया को भारतीय लॉबी सक्रिय हो गई और उसने पूरी कोशिश की कि ये डील रुक जाए.

अख़बार ने दोतरफा बातचीत बहाल करने पर ज़ोर देते हुए लिखा है कि अगर दोनों देश अपने संबंधों को सामान्य बनाने में कामयाब रहे तो फिर न तो भारत को खुद हथियारों का अंबार लगाने की जरूरत पड़ेगी और न ही पाकिस्तान को मिलने वाले एफ-16 विमानों से परेशानी होगी.

वहीं नवा-ए-वक्त कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए लिखता है, अगर दुनिया शांति को ज़रूरी समझती है तो फिर वो संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक कश्मीर समस्या के हल के लिए भारत को मजबूर करे.

लेकिन अख़बार ये भी लिखता है कि जिस तरह भारत की मोदी सरकार पाकिस्तान से दुश्मनी को हवा दे रही है, ऐसे में उससे कश्मीर या फिर किसी अन्य मुद्दे पर कोई भी उम्मीद बेमानी होगी.

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रूख भारत का करें तो हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने महाराष्ट्र में गैर मराठियों के ऑटो जलाने की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे की धमकी पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार लिखता है कि नफरत भड़काने के लिए राज ठाकरे पहले से ही मशहूर हैं, लेकिन भाजपा और शिव सेना की सरकार को उन्होंने काफी समय बाद अपने बयान से मुश्किल में डाला है.

अख़बार के मुताबिक जानकार मानते हैं कि राज ठाकरे के बयान का मकसद आगामी बीएमसी चुनावों में अपनी पार्टी में नई जान फूंकने और कामयाबी दिलाना है, लेकिन सवाल ये है कि क्या सियासी फायदे के लिए मराठी और गैर मराठी के बीच खाई पैदा करना और माहौल को खराब करना ठीक है.

वहीं सियासी तकदीर ने 'ये सियासी वादे और मुसलमान' शीर्षक से लिखा है कि पश्चिम बंगाल में चुनावी तारीखों का एेलान होते ही सियासी राजनीतिक मंच सजने लगा है.

अख़बार ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों, सभी को आड़े हाथ लेते हुए कहा है कि सेक्सुलर पार्टियों की सोच मुसलमानों को समस्याओं में उलझाए रखने की है, क्योंकि वो जानती हैं कि अगर समस्याएं हल हो गई तो उन्हें फिर कौन मुंह लगाएगा.

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अख़बार लिखता है कि इन नीति और नजरिए के मुताबिक ये पार्टियां एक बार फिर ऐसे घोषणापत्र ले आई हैं जिनमें वादों की भरमार है.

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