इन्हें है चौबीसों घंटे चुटकुले सुनाने की सनक

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हम सबको ऐसे लोग पसंद आते हैं जो ख़ुशमिज़ाज हों, हंसी मज़ाक़ करते हों, बात-बेबात लतीफ़े सुनाएं.

मगर, कभी सोचा है कि अगर किसी को चौबीसों घंटे चुटकुले सुनाने की सनक हो जाए. वो सोते-जागते किसी को भी पकड़कर लतीफ़े सुनाने लगे.

लोगों की रात की नींदें उड़ा दे. ख़ुद तो लतीफ़े सुना-सुनाकर आपकी नाक में दम कर दे. मगर, जब आप उसको कोई चुटकुला सुनाएं तो वो न हंसे, न कुछ बोले.

ऐसे किसी शख़्स से आप मिले हैं कभी? अगर नहीं, तो चलिए हम आपको मिलाते हैं ऐसे कुछ लोगों से जिन्हें है चुटकुले सुनाने की सनक.

ये क़िस्सा है डेरेक (असली नाम नहीं) नाम के एक अमरीकी नागरिक का.

डेरेक को हर वक़्त, चुटकुले सुनाने की सनक सवार रहती थी. उसकी पत्नी आज़िज आ गईं थीं. अक्सर वो आधी रात को उठकर, बीवी को जगाते और फिर कोई वाहियात क़िस्म का लतीफ़ा सुनाकर बोर करते. नींद उड़ा देते सो अलग.

क़रीब पांच साल तक डेरेक की चुटकुलेबाज़ी बर्दाश्त करने के बाद बीवी ने उनसे कहा कि ऐसा करो कि जो भी लतीफ़ा याद आए, वो लिख डालो.

डेरेक ने कुछ ही दिनों में चुटकुलों से पचास पन्ने भर डाले. इनमें से ज़्यादातर तो ऐसे थे जिन्हें सुनकर आपको उबासी आए. मगर यही चुटकुले लिखकर, दूसरों को सुनाकर डेरेक लोट-पोट हो जाते थे.

लतीफ़ा सुनाने की इस लत से तंग आकर बीवी, डेरेक को कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की न्यूरोलॉजिस्ट मारिया मेंडेज़ के पास ले गई.

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मेंडेज़ बताती हैं कि इस मुलाक़ात के दौरान भी डेरेक के चुटकुले सुनाने का सिलसिला चलता रहा. इस कदर कि सवाल-जवाब करना मुश्किल हो गया.

काफ़ी पड़ताल के बाद मारिया इस नतीजे पर पहुंचीं कि डेरेक की लतीफ़ा सुनाने की ये सनक असल में एक बीमारी है. इस बीमारी का नाम है, 'वित्ज़ेलज़ूख़्त'.

यह बीमारी हमारे दिमाग़ को कोई सदमा या चोट पहुंचने की वजह से होती है. इससे हमारे दिमाग़ के आगे के हिस्से पर असर पड़ता है. दिमाग़ के आगे के ये हिस्से हम सोचने-विचारने और बात को समझने के लिए काम में लाते हैं.

मारिया ने पता लगाया कि डेरेक को क़रीब दस साल पहले ब्रेन हेमरेज हुआ था. इसकी वजह से उसके दिमाग़ के आगे के दाएं हिस्से, या राइट फ्रॉन्टल लोब पर बुरा असर पड़ा था.

इससे उसके बर्ताव में काफ़ी बदलाव आ गया था. वो अक्सर कचरे में से ऐसी चीज़ें तलाशने लगा था, जिन्हें रिसाइकिल किया जा सके.

कुछ साल पहले डेरेक के दिमाग़ को दूसरा दिमाग़ी झटका लगा. इसका असर लेफ्ट फ्रॉन्टल लोब पर हुआ. जिसके बाद डेरेक को सवार हो गई लतीफ़े सुनाने की सनक.

'वित्ज़ेलज़ूख़्त' नाम की इस बीमारी का पहली बार पता एक जर्मन डॉक्टर ऑटफ्रिड फॉर्स्टर को चला था.

बात 1929 की है. डॉक्टर फॉर्स्टर एक मरीज़ का ऑपरेशन कर रहे थे. उस वक़्त जैसा कि चलन था, ऑपरेशन के वक़्त मरीज़ होश में था. जैसे ही वो उसके शरीर से ट्यूमर निकालने वाले थे, दर्द से कराहने के बजाय वो चुटकुला सुनाने लगा. एक के बाद एक वो लतीफ़े सुना-सुनाकर ख़ुद ही हंसते-हंसते बेहाल हो गया.

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बाद में ऐसे ही कुछ लोगों के क़िस्से अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम ब्रिल ने बयां किए, जो ऑपरेशन थिएटर में भी चुटकुले सुनाने की सनक से आज़ाद नहीं हो पाए.

तब से लतीफ़ेबाज़ी के ख़ब्ती ऐसे और भी लोगों की कहानियां सामने आई हैं. दिलचस्प बात ये कि अपने वाहियात क़िस्म के मज़ाक़ पर भी लोट-पोट होने वाले ये लोग, दूसरों के चुटकुले सुनकर चुप बैठे रह जाते हैं.

असल में किसी भी चुटकुले को समझने के लिए हमारे पास 'सेंस ऑफ ह्यूमर' होना ज़रूरी है. मज़ाक़ समझने का ये सेंस, हमारे दिमाग़ के एक ख़ास हिस्से में होता है.

यह हिस्सा दिमाग़ के आगे वाले फ्रॉन्टल लोब में होता है. जो किसी भी जुमले को चीर-फाड़कर, हमें समझने में मदद करता है. जैसे ही बात हमारी समझ में आती है, हमारा दिमाग़ एक गुदगुदी सी महसूस करता है. इसी वजह से कभी हम मुस्कुरा देते हैं. तो कभी ठहाका लगाते हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के जैसन वारेन कहते हैं कि अहा! और हा हा हा के बीच ज़्यादा फ़ासला नहीं. बस दिमाग़ के समझने का फेर भर है.

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न्यूरोसाइंटिस्ट मारिया मेंडेज़ कहती हैं कि दिमाग़ के फ्रॉन्टल लोब, या आगे वाले हिस्से में चोट की बुरा असर होता है. इस वजह से डेरेक जैसे लोग, लतीफ़े को समझ ही नहीं पाते. इसी वजह से वो दूसरों के चुटकुलों पर कोई रिएक्शन नहीं देते.

फ्रॉन्टल लोब की इसी चोट का उल्टा असर, लतीफ़ेबाज़ी की लत के तौर पर दिखता है. वो अपनी ही बात पर ख़ूब हंसते हैं, जैसे ठहाके लगाने का दौरा पड़ गया हो.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के जैसन वारेन इस बारे में रिसर्च कर रहे हैं. असल में वो उन लोगों पर काम कर रहे हैं, जो 'फ्रॉन्टोटेम्पोरल डिमेंशिया' नाम की दिमाग़ी बीमारी के शिकार हैं.

इस बीमारी के असर से लोग दूसरों की बातें और भावनाएं नहीं समझ पाते. इसी का असर, दिखता है डेरेक जैसे लोगों पर, जो दूसरों के लतीफ़ों पर नहीं हंसते. क्योंकि वो दूसरों की बातें समझ नहीं पाते.

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'फ्रॉन्टोटेम्पोरल डिमेंशिया' के सारे मरीज़ों को लतीफ़ेबाज़ी की लत हो, ये ज़रूरी नहीं.

चुटकुले सुनाने, दूसरों की बातें न समझने की ये बीमारी, दिमाग़ी सदमे की वजह से हो सकती है. यह बात अभी अटकलों के ही दौर में है. अभी इस पर बहुत काम किया जाना बाक़ी है.

ख़ुद जैसन ने एक प्रयोग किया तो उन्हें ये रिश्ता साफ़ दिखा. उन्होंने 'फ्रॉन्टोटेम्पोरल डिमेंशिया' के कुछ मरीज़ों को कार्टून दिखाए. मगर ज़्यादातर लोग इनमें छुपे मज़ाक़ समझ में नहीं आए.

जैसन कहते हैं कि उनकी यह रिसर्च डॉक्टरों के काम आ सकती है. जो मरीज़ों के परिजनों से जान सकते हैं कि कब मरीज़ों के अंदर मज़ाक़ या किसी की बात समझने की दिक़्क़त नज़र आई. इससे बीमारी को जल्दी पकड़ा जा सकेगा.

शायद फिर दुनिया भर के डॉक्टर मिलकर किसी 'कॉमेडी टेस्ट' पर रज़ामंद हों.

जैसन को लगता है कि उनकी रिसर्च से और कुछ नहीं तो लोग मज़ाक़ को संजीदगी से लेंगे. लतीफ़ों को, चुटकुलों को, किसी के मज़ाक़ को समझने में हमारे दिमाग़ को अच्छी ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ती है.

तो, अब से जान लीजिए. मज़ाक़ समझना कोई खेल नहीं.

(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है. मूल लेख यहां पढ़ें)

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