जंग के बावजूद घर लौटना चाहते हैं ये बच्चे

  • 19 मार्च 2016

सीरिया में चल रही लड़ाई ने वहां की आधी से अधिक आबादी को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया है और बच्चों की ज़िंदगी अंधकार में बीत रही है, फिर भी इन बच्चों के हौसले अपने आसपास के लोगों पर सकारात्मक असर डाल रहे हैं.

ट्रैवल राइटर कैरोलीन हाउली ने पिछले दिनों सीरिया युद्ध में प्रभावित बच्चों से जॉर्डन की राजधानी अम्मान के अस्पतालों और पुनर्वास केंद्रों में मुलाक़ात की. बच्चों से मिलकर हुए अपने अनुभव उन्होंने बीबीसी से साझा किए.

इब्राहिम 12 साल का है, उसका व्यक्तित्व ऐसा कि वह भविष्य का फ़िल्मस्टार हो, ख़ूबसूरत, लंबा-चौड़ा, दिल जीत लेने वाली मुस्कुराहट, आकर्षण से भरपूर.

इब्राहिम जॉर्डन की राजधानी अम्मान के बाहरी इलाक़े के एक पुनर्वास केंद्र में रह रहा है. इस केंद्र में सीरिया में हुई गोलीबारी से पीड़ित और भी लोग रह रहे हैं.

जब मैं उससे मिलने पहुंची तो वह लहराता हुआ गहरी मुस्कुराहट के साथ मुझसे मिलने आया.

उसने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा कि अगर मुझमें साहस है तो मैं उसके क्षत विक्षत पैर को देखूं. उसने अपना पैर सीरिया में हुए हवाई हमले में लगभग खो दिया है.

इस हमले में उसने अपनी मां, दो बहनें, तीन भाइयों के साथ अपने चाचा और पांच चचेरे भाई-बहनों को भी गंवा दिया. वह जिस तरह से इस युद्ध में मारे गए परिजनों को ऐसे गिना रहा था मानो ये कोई कोई आम सी घटना हो.

इब्राहिम को उसके पिता के साथ कनाडा के एक आश्रय केंद्र में जगह मिल गई है, वह कुछ ही दिनों में वहां चला जाएगा..

मैंने पूछा- यह तो एक अच्छी ख़बर है, तुम वहाँ जाने के लिए बेताब होगे?.

वह तपाक से बोला नहीं, बिलकुल नहीं..मैं सीरिया वापस जाना चाहता हूं, जितनी जल्दी हो सके.

वह एक युद्ध क्षेत्र में कार्य करने वाला संवाददाता यानी वार रिपोर्टर बनना चाहता है. वह कहता है- जो कुछ यहाँ चल रहा है उसका आधा भी बाहरी दुनिया को नहीं पता.

सीरिया से हज़ारों परिवार यूरोप जा रहे हैं, वो युद्ध की भयावह त्रासदी से दूर जाना चाहते हैं. लेकिन बच्चे जिनसे मुझे जॉर्डन और लेबनान में मिलने का मौका मिला वह सभी जल्दी से जल्दी अपने घर वापस जाना चाहते हैं.

Image caption रोउआ सीरिया में अपने घर जाना चाहती है

पांच साल की प्यारी सी रोउआ कहती है कि वह सीरिया वापस जाना चाहती है..अगर वह जा सकती है तो. वह अपनी उस गुड़िया को ढूंढना चाहती है जिसे उसने दराज़ में छुपाया था.

रोउआ का परिवार रासायनिक हमले के बाद घर छोड़ने पर मजबूर हो गया था.

रोउआ का छोटा भाई जो उस समय चार महीने का था कुछ दिनों तक अस्पताल में भी रहा था. रोउआ का घर अब खंडहर बन चुका है. वह अपने परिवार के साथ लेबनान के छोटे से टेंट में अपने माता-पिता और पांच छोटे बच्चों के साथ रह रही है.

वह कहती है कि वह अपना खाना बनाना और उसे बांटना बहुत मिस करती है.

जॉर्डन में ही मेरी मुलाक़ात एक बच्चे से हुई जिसने एक विस्फोट में अपने दोनों पैर, एक आंख और एक हाथ को गंवा दिया है लेकिन उसकी ऊर्जा देखते ही बनती थी.

अपने साथ घटी उस दर्दनाक घटना के बाद भी उसने हार नहीं मानी है. यदि आप कभी उससे मिलते हैं और उसे टेबल फ़ुटबॉल खेलने का ऑफर नहीं करते हैं, तो वह गुस्सा हो जाता है.

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जब मैंने उससे पूछा कि अगर उसे मौका मिले तो वह पिछले पांच सालों में अपनी ज़िंदगी में किन चीजों को बदलना चाहेगा-उसने बहुत ही साधारण लेकिन कठोर लहजे में कहा "मैं आगे देखता हूं, पीछे नहीं."

इन दिनों वह कृत्रिम पैर के सहारे से चल रहा है, वह वहां अपनी देखभाल अकेला ही कर रहा है. उसे देखने के लिए उसके परिवार का वहां कोई नहीं है.

2014 की गर्मियों के बाद वह पहली बार चल पा रहा था और उसने अस्पताल के कर्मचारी को कहा कि वह अस्पताल से बाहर जाना चाहता है.

और उसने ऐसा किया भी. आत्मविश्वास से भरपूर एक एक कदम बढ़ाता गया और चलता गया और उसने करके ही दम लिया.

Image caption मुस्तफा के सिर में कील फंसी हुई है

इसके बाद मेरी मुलाक़ात एक और छोटे बच्चे मुस्तफा से हुई जो पहले से ही जिंदगी से लड़ना सीख चुका था. एलेप्पो में उसके घर पर बम गिराया गया था जिसमें उसके माता-पिता की मौत हो गई थी. वह एक साल तक अस्पताल में भी रहा था.

उसके कूल्हे की रिप्लेसमेंट सर्जरी होनी है. अम्मान में युद्ध पीड़ितों के लिए ऑपरेशन कर रहे अस्पताल में अभी सर्जरी के लिए समान मौजूद नहीं है. उसके शरीर का एक भाग अब भी लकवाग्रस्त है. उसके सिर में एक कील फंसी हुई है.

पांच साल की उस छोटी सी उम्र में मुस्तफा ने अपनी इच्छा शक्ति से दूसरों को भी प्रभावित कर रहा है.

जब वह अस्पताल लाया गया था तब वह खड़ा भी नहीं हो सकता था, वह कुपोषित और कमजोर भी था. वह इतना डरा हुआ था कि कुछ खा भी नहीं पाता था. वह जब भी किसी सफेद कोट वाले को देखता था चिल्लाने लग जाता था.

लेकिन उसकी हरकतों को देख अस्पताल के दूसरे मरीज और कर्मचारी उसे पसंद करने लगे. उसकी बड़ी-बड़ी भूरी आंखे, उसकी मुस्कराहट और उसकी दृढ़निश्चयता ने लोगों का दिल जीत लिया. मेरा भी

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मुस्तफा की ताकत की जरा कल्पना कीजिए. सीरिया युद्ध ने जिस तरह से बच्चों पर मनोवैज्ञानिक असर पर रहा है उसके बारे में सोचिए.

मैं जब पांच दिनों बाद घर वापस आई तो मै रात में अपने दो साल के बेटे के पास लेट गई. जब वह सो गया तो उसके दोनों हाथों को अपने हाथ में ले लिया. उसके दो हाथ हैं. वह शारीरिक रूप से संपूर्ण है. हम सभी साथ हैं और सुरक्षित हैं.

पांच साल के युद्ध के बाद कितने सीरिया के परिवारों के पास यह खुशनुमा अहसास बचा है?

(यह लेखक के निजी अनुभव हैं)

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