क्या औरतों का भी है अफ़ग़ानिस्तान?

  • 19 मार्च 2016
फरखुंदा की बरसी पर प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट GETTY IMAGES

ठीक एक साल पहले अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक दरगाह पर कुछ लोगों की भीड़ ने पत्थर मार-मारकर फ़रखुंदा मलिकज़ादा की हत्या कर दी थी.

फ़रखुंदा पर क़ुरान की एक प्रति जलाने का ग़लत आरोप लगा था. 27 वर्षीय फ़रखुंदा की हत्या के बाद वहाँ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और फ़रखुंदा अफ़ग़ानिस्तान में लिंग समानता की लड़ाई का प्रतीक बन गईं.

पर क्या वाकई अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं के जीवन में कोई बदलाव आया है?

19 मार्च 2015 को काबुल की सड़कों पर कथित तौर पर क़ुरान जलाने की घटना से ग़ुस्साए लोगों की भीड़ फ़रखुंदा को मस्जिद से खींचकर बाहर लाई.

पुलिस ने शुरू में उन्हें बचाने का प्रयास किया, पर जल्द ही भीड़ के आगे वो बेबस हो गए. भीड़ ने फ़रखुंदा को पत्थरों-डंडों से पीटना शुरू किया और उनका हिजाब फाड़ दिया.

लोगों ने उनके बाल खींचे, उन पर थूका, धक्का देकर उन्हें ज़मीन पर गिराया, कुचला और उनके सिर पर ठोकरें मारीं.

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बेहद क्रूर ढंग से उनकी हत्या कर दी गई. उनके शरीर को सड़कों और गलियों में घसीटा गया और कार से कुचला गया.

भीड़ यहीं नहीं रुकी. फ़रखुंदा को जला दिया और लोग देखते रहे. आख़िर उनके शव पर पत्थर फेंके गए.

एक मुल्ला ने आरोप लगाया था कि फ़रखुंदा ने क़ुरान जलाई है, जो आरोप बाद में ग़लत साबित हुआ. घटना के बाद लगभग 50 लोगों को गिरफ़्तार किया गया और कई को सज़ा भी हुई.

तीन पुरुषों को 20 साल की क़ैद और आठ को 16 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई और एक नाबालिग को 10 साल की क़ैद की सज़ा दी गई.

फ़रख़ुंदा को सुरक्षा देने में नाकाम रहने के लिए 11 पुलिसकर्मियों को भी एक-एक साल की सज़ा हुई.

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मगर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर अफ़ग़ानिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने 13 अभियुक्तों की सज़ा कम कर दी.

चार को मिली मौत की सज़ा भी ख़त्म कर दी गई. इसे लेकर ख़ासा विवाद हुआ और मानवाधिकार और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका तीखा विरोध किया.

फ़रखुंदा की मां ने कहा, ''अफ़ग़ानिस्तान में फ़रखुंदा के साथ ही न्याय भी दफ़न हो गया.''

भारी आलोचनाओं की बीच अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने मामले की दोबारा जाँच के आदेश दिए हैं.

फ़रखुंदा की मौत पर न केवल देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे, बल्कि विदेशी मीडिया ने भी इस मुद्दे को काफ़ी तवज्जो दी थी.

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पहली बार, अफ़ग़ानिस्तान के अंदर और बाहर अफ़ग़ानों ने क़ुरान जलाने के वीडियो बनाए और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट किया.

यह ऐसी प्रतिक्रिया थी, जिसके बारे में धार्मिक रूप से कट्टर इस देश में सोचा तक नहीं जा सकता था. फ़रख़ुंदा को दफ़नाने के समय भी अभूतपूर्व घटना घटी.

महिलाओं ने पुरुषों को फ़रखुंदा का ताबूत छूने से रोक दिया. उन्होंने ख़ुद फ़रखुंदा के शव को कंधा दिया. इस तरह शव को पुरुषों के कंधा देने की सदियों पुरानी परंपरा तोड़ दी.

महिला अधिकारों की पैरवी करने वाले संगठनों के मुताबिक़ इस वारदात ने दिखाया कि क्रूरता, स्त्री द्वेष और लैंगिक हिंसा अफ़ग़ान समाज में धंसी हुई है.

हालाँकि एक वरिष्ठ अफ़ग़ान इमाम कहते हैं, ''यदि कोई क़ुरान की बेइज़्ज़ती करता है, तो आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि लोग भावनाओं पर क़ाबू रखेंगे और इंतज़ार करेंगे कि अदालत इसके लिए क्या सज़ा देगी.''

उन्होंने सरकार को चेताया कि भीड़ में शामिल लोगों को गिरफ़्तार करने से बग़ावत होगी. सरकारी अफ़सरों ने भी सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणियां डालीं.

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सवाल ये है कि हत्या के एक साल बाद क्या अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के लिए कुछ बदला है?

इसके बाद सामने आई कुछ घटनाओं को देखें तो जवाब होगा ‘बहुत ज़्यादा नहीं.’

जनवरी में फ़रयाब प्रांत में एक महिला रेज़ा गुल के पति ने पारिवारिक कलह के बाद उसकी नाक और होंठ का ऊपरी हिस्सा काट दिया था.

इसके बाद उसका पति तालिबान के नियंत्रण वाले इलाक़े में चला गया और उसे अब तक गिरफ़्तार नहीं किया जा सका है.

नवंबर 2015 में मध्य अफ़ग़ानिस्तान में व्यभिचार के आरोप में एक युवा महिला रुख़साना की हत्या पत्थर मार-मारकर कर दी गई.

30 सेकंड के इस वीडियो को ऑनलाइन भी पोस्ट किया गया. जिस पुरुष के साथ वह कथित रूप से भागी, उसे भी कोड़े लगाए गए.

अफ़ग़ान मानवाधिकार आयोग का कहना है कि 'ऑनर किलिंग' के मामले बढ़े हैं.

पिछले साल जिन 150 महिलाओं की हत्या हुई, उनमें 101 को इसलिए मारा गया कि उनके परिजनों का मानना था कि उनसे परिवार की बदनामी हुई थी.

इनमें एक लड़की 18 साल की थी. पिता ने उसकी हत्या कुल्हाड़ी से कर दी थी, क्योंकि वह उनकी ‘आज्ञा’ नहीं मान रही थी.

अफ़ग़ानिस्तान में 2015 में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के 5,000 से अधिक मामले दर्ज हुए. पिछले साल के मुक़ाबले यह आंकड़ा पांच फ़ीसदी अधिक है.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ लगभग 90 फ़ीसदी अफ़ग़ान महिलाओं के साथ मारपीट या यौन हिंसा होती है.

सरकार ने हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए कुछ अहम घोषणाएं की हैं. महिलाओं के लिए एक यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा भी की गई है.

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