ओली के चीन दौरे से भारत को है ख़तरा?

केपी ओली

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली 20 मार्च से एक सप्ताह के दौरे पर चीन जा रहे हैं. ठीक एक महीने पहले उन्होंने भारत का भी दौरा किया था.

लेकिन ओली का ये दौरा 'संतुलन साधने' की प्रक्रिया से कुछ बढ़कर है. अपनी भौगोलिक अहमियत के कारण नेपाल 1768 में अपने अस्तित्व में आने से ही भारत और चीन दोनों के लिए ख़ास रहा है.

एकीकृत नेपाल के पहले राजा पृथ्वी नारायण शाह ने इसे 'दो शिलाखंडों के बीच फंसा' बताया था.

1768 के बाद से नेपाल ने सैन्य ताक़त और कूटनीति से ख़ुद को ब्रिटिश साम्राज्य और उसके बाद भारत और चीन से बचाते हुए आज़ाद रखा.

नेपाल ने उसके बाद 'शिलाखंडों के बीच फंसे' सिद्धांत को पुनर्परिभाषित किया और आधिकारिक तौर पर भारत और चीन से 'समान दूरी रखने की नीति' अपनाई.

हालाँकि, ये देखते हुए कि नेपाल और भारत सीमाएं साझा करते हैं और इनकी खुली सीमाएं, साझा संस्कृति, मान्यताएं और जनसांख्यिकी, ख़ासकर बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे क्षेत्र भारत और नेपाल के रिश्तों को ख़ास बनाते हैं.

व्यापार और आवागमन के लिए भारत पर नेपाल की निर्भरता के कारण ही कुछ लोग इसे भारत से बंधा बताते हैं और यही वजह है कि भारत इस मायने में नेपाल के लिए ख़ास बन जाता है.

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हालाँकि नेपाल में भारी राजनीतिक बदलाव ने इसके चेहरे-मोहरे में बदलाव किया है और 2006 में इस हिंदू राज्य ने धर्मनिरपेक्ष राज्य का चोला पहन लिया.

मध्यस्थ के रूप में दिखती भारत की भूमिका ने नेपाल के अधिकांश राजनेताओं का नज़रिया बदला और इसकी वजह रही इस दौर का लंबा खिंचना और नेपाल की अर्थव्यवस्था का तहस-नहस होना.

जहाँ नेपाल की राजनीति में भारत की मौजूदगी दिखती है, वहीं बाद में चीन ने भी नेपाल में दख़ल देना शुरू किया. जबकि पहले चीन की दख़लअंदाज़ी तिब्बती शरणार्थियों की गतिविधियों पर निर्देश देने तक ही सीमित रहती थी.

नेपाल में करीब 20 हज़ार तिब्बती शरणार्थी हैं.

चीन ने अब नेपाल से नई प्रत्यर्पण संधि करने को कहा है. चीन का कहना है कि विदेशों से सहायता प्राप्त ग़ैरसरकारी संगठन यानी एनजीओ और दूसरी ताक़तें चीन में असंतोष को बढ़ावा दे रही हैं और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए आपसी क़ानूनी सहायता समझौता किया जाना चाहिए.

चीन का यह रवैया भारत, नेपाल और चीन रिश्तों पर पहले के नज़रिये के उलट है, जिसमें 'भारत की नेपाल में सबसे अधिक दिलचस्पी रहती थी.'

इससे साफ़ संदेश जाता है कि 'चीन की नेपाल में दिलचस्पी भले अधिक न हो, पर कुछ कम भी नहीं है.'

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भारत ने ओली का ज़ोरदार स्वागत किया, लेकिन दौरे में कुछ ख़ास निकलकर नहीं आया और दोनों देश साझा बयान भी जारी नहीं कर पाए. भारत के शीर्ष राजनयिक ने कहा, 'साझा बयान का मतलब है कि दोनों देशों के पास एक साझा संदेश है.'

स्वाभाविक है कि इस तरह के साझा बयान न होने का मतलब है कि दोनों के बीच फ़ासला बढ़ रहा है.

अक्टूबर में जब नेपाल की संविधान सभा एक अपरिपक्व संविधान लेकर आई, तो भारत ने इस पर आपत्ति जताई. दोनों देशों में तल्खी बढ़ी. भारत की तरफ़ से तेल और ज़रूरी सामानों की आपूर्ति रोकने से नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं गहराईं.

नाकाबंदी तभी हटाई गई, जब ओली ने भारत आने के लिए यह शर्त रखी. इसमें यह संदेश भी छिपा था कि वह पहले भारत का दौरा करने की दशकों पुरानी परंपरा तोड़कर चीन जा सकते हैं.

ओली चीन को नेपाल में पनबिजली योजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश का न्योता देने जा रहे हैं. शुरू में यह निवेश 2200 मेगावाट की तीन परियोजनाओं के लिए होगा.

इसके अलावा, चीन को नेपाल की मुख्य पर्यटन नगरी पोखरा में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने का प्रस्ताव भी दिया जाएगा. ज़ाहिर है ये ऐसे न्योते हैं, जिनसे भारत को खुशी नहीं होगी.

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चीन ने पिछले साल अप्रैल में भूकंप से तबाह हुए नेपाल के इलाक़ों के पुनर्निर्माण में भी दिलचस्पी दिखाई है.

माना जा रहा है कि चीन और भारत नेपाल के विकास, शांति और स्थिरता में सहयोग कर वहां अपनी स्थिति मज़बूत करना चाहते हैं. मगर नेपाल में भारत की लोकप्रियता में गिरावट, इसकी देखरेख में चल रही परियोजनाओं में देरी और सबसे बड़ी बात नेपाल की राजनीति में भारत की बढ़ती मौजूदगी और हाल की नाकेबंदी के कारण को भारत को आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है.

भारत यात्रा में ओली ने कहा था, "मेरी भारत यात्रा सफल रही और इससे द्विपक्षीय रिश्तों को हुए नुक़सान की भरपाई करने में मदद मिली."

मगर चीन यात्रा के लिए ओली की लंबी मांग सूची में यह संदेश साफ़ है कि चीन नेपाल के लिए महत्वपूर्ण है.

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