बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेज रहे मुसलमान?

  • 25 मार्च 2016
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ब्रिटेन में कुछ मुसलमान अभिभावक अपने बच्चों को घरों में ही पढ़ा रहे हैं. इसकी बहुत सी वजहें हैं पर मुख्य वजह यह भी है कि उनके बच्चों को स्कूल में परेशान किया जाता है.

कुछ ने हमें बताया कि ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार की अतिवाद-विरोधी रणनीति के तहत उन पर निगरानी रखी जा रही है.

बीबीसी संवाददाता पूर्वी लंदन के न्यूहैम के ख़ान परिवार से मिलीं. वहां उन्होंने देखा कि पांच साल का मूसा और नौ साल की असिया घर के 'क्लासरूम' में पढ़ रहे थे.

मूसा बताते हैं, "हम विज्ञान, अंग्रेज़ी, गणित, कला, डिज़ाइन और इस्लामिक मामलों की पढ़ाई कर रहे हैं." उनके शिक्षक पारिवारिक मित्र रहमा और उनके पिता हैं.

असिया ने बताया कि क्यों उन्हें घर पर पढ़ना अच्छा लगता है, "मुझे घर पर पढ़ाई के बारे में यह बात पसंद है कि इस तरह मैं घर पर अपने भाई और पिता के साथ ज़्यादा समय बिता पाती हूँ."

बच्चों को घर पर पढ़ा रहीं रहमा कहती हैं, "असिया को नए दोस्त बनाने में दिक़्क़त होती है और मूसा के लिए एक जगह बैठना मुश्किल होता है. इसलिए जब क्लास में 30 बच्चे हों, तो एक शिक्षक के लिए उन पर ख़ास ध्यान देना मुमकिन नहीं."

"अभिभावक यह जानते हैं. इसलिए उन्होंने उन्हें स्कूल से निकालने का फ़ैसला किया और अब वह घर पर अपनी रफ़्तार से सीख रहे हैं."

लेकिन घर पर पढ़ाई सबके लिए माकूल नहीं होती, जिसमें मूसा की सात साल की बहन सुमैया भी शामिल है. उनसे हम उनकी स्कूल की छुट्टी होने के बाद मिले.

उन्होंने बताया, "मुझे अपने दोस्तों की याद आती है और स्कूल में मेरा पसंदीदा विषय इतिहास है."

पिछले छह साल में ब्रिटेन में घर पर पढ़ रहे बच्चों की तादाद काफ़ी बढ़ी है. इसकी वजह स्कूल में परेशान करना, लाइफ़स्टाइल और धर्म है.

इससे ज़्यादा नियंत्रण की ज़रूरत महसूस हो रही है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चों की पढ़ाई तो ठीक से हो रही है और कहीं उन्हें बंद कमरों में कट्टर तो नहीं बनाया जा रहा.

सांसद और एजुकेशन सेलेक्ट कमेटी के अध्यक्ष नील कारमाइकेल कहते हैं कि वह इस मुद्दे को वरिष्ठ मंत्रियों के सामने उठाएंगे.

उन्होंने हमें यह बयान भेजा, "मुझे लगता है कि यह सामाजिक भलाई और शिक्षा के जुड़ा गंभीर मामला है और यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता कि घर पर पढ़ाने वाले अभिभावकों को स्थानीय परिषद के पास रजिस्ट्रेशन की ज़रूरत न हो."

अभी अगर कोई बच्चा स्कूल छोड़ता है और घर पर पढ़ता है तो स्कूलों को इसकी जानकारी देनी होती है पर नील कारमाइकेल कहते हैं कि कितने लोगों को घरों में पढ़ाया जा रहा है इसका सही अंदाज़ा तभी होगा जब अभिभावक स्थानीय परिषद में पंजीकरण कराएंगे.

असिया और मूसा की मां नायला ख़ान पूछती हैं, "अभी तो घर में पढ़ाई के लिए आप अपना पाठ्यक्रम बना सकते हैं लेकिन पंजीकरण के बाद इस पर क्या असर पड़ेगा?"

नायला उन मुसलमान अभिभावकों में हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को घर पर पढ़ाने का फ़ैसला किया और जिनसे हमने फ़ेसबुक पर बात की.

वह कहती हैं कि फ़ेथ स्कूल (किसी एक धर्म के अनुयाइयों के लिए स्कूल) महँगे तो होते हैं पर हमेशा अच्छे नहीं होते.

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नॉन-फ़ेथ स्कूल, जिन्हें प्रिवेंट भी कहते हैं, में शिक्षकों की यह क़ानूनी ज़िम्मेदारी है कि वह कट्टरता के लक्षण देखें तो उसकी जानकारी दें. इसलिए भी घर पर पढ़ाई का आकर्षण बढ़ जाता है.

नायला कहती हैं, "इससे हमें उनकी रोज़मर्रा की उन चीज़ों पर ध्यान देने का समय मिल जाता है जो स्कूल में अलग ढंग से होती हैं. हम चाहते हैं कि वह घर पर करें- जैसे इबादत. जब समय होता है तो इसकी चिंता किए बिना कि दूसरे क्या सोचते हैं."

"दूसरे प्रिवेंट रणनीति भी एक मुख्य वजह है कि लोग स्कूलों पर भरोसा नहीं कर पाते. इससे लगता है कि स्कूलों को परिवारों की जासूसी करने को कहा गया है."

सरकार का कहना है कि वह इस व्यवस्था को जितना हो सकता है, उतना 'मज़बूत' बनाने की कोशिश कर रही है और अभिभावकों को अपने बच्चों को घर में पढ़ाने की आज़ादी भी दे रही है.

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प्रिवेंट रणनीति पर उनका कहना है कि वह बच्चों की रक्षा कर रही है.

उधर, नायला कहती हैं कि उन्हें इसकी चिंता नहीं कि घर पर पढ़ाने से उनके बच्चे समाज में कम घुलमिल पाएंगे क्योंकि वह ऐसे बहुत सी चीज़ें करते हैं जो दूसरे बच्चे भी करते हैं- जैसे कराटे.

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