इंटरनेट पर धौंस क्यों जमाते हैं लोग

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आजकल हम अपना अच्छा ख़ासा वक़्त सोशल मीडिया पर बिताते हैं. यहां पर बहुत से लोगों का सामना 'साइबरबुली' या 'ट्रॉल' से होता है, जो बात-बेबात लोगों से दबंगई करते हैं, धौंस जमाते हैं और कई बार गाली-गलौज भी करते हैं.

इन ट्रॉल्स की वजह से लोगों को कई बार परेशानियों का सामना करना पड़ता. कई लोगों ने तो ट्रॉल्स से परेशान होकर जान तक देने की कोशिश की. तमाम कोशिशों के बावजूद सोशल नेटवर्क साइट्स इन साइबर दबंगों से सही तरीक़े से निपटने में नाकाम रही हैं.

ट्विटर के पूर्व सीईओ डिक कॉस्टोलो ने एक ख़ुफ़िया मेल में लिखा था कि हम ट्रॉल्स से निपटने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं. जब ये मेल लीक हुआ तो किसी को अचंभा नहीं हुआ. किसी न किसी रूप में हर सोशल मीडिया यूज़र, ट्रॉल्स का शिकार होता रहा है.

साइबर दुनिया में लोगों को धमकाने, धौंस जमाने वाले इन दबंगों, या ट्रॉल्स से निपटने का तरीक़ा क्या है?

सोशल मीडिया कंपनियां ऐसा कोई असरदार तरीक़ा निकालने में नाकाम रही हैं. मगर तकनीक की तरक़्क़ी से उम्मीद जगी है कि हम जल्द ही ट्रॉल्स से निपटने में बेहतर होंगे.

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अमरीका की मशहूर कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में हुई रिसर्च के मुताबिक़, हम तमाम वेबसाइट की क़रीब से निगरानी करके ऐसे साइबर दबंगों को शुरू में ही पहचान सकते हैं. इनकी पहचान किसी ख़ास तरह की पोस्ट पर उनके कमेंट से हो सकती है. इससे पता लगाया जा सकता है कि कुछ लोग आगे चलकर ट्रॉल या साइबर दबंग बन सकते हैं. ऐसे लोगों को पहचानकर उन्हें सुधारने की कोशिश की जा सकती है.

सोशल नेटवर्क पर दबंगई दिखाने वाले ये लोग कुछ ख़ास बातों पर ही ज़ोर देते हैं. वो लिखते ख़ूब हैं, मगर कुछ ख़ास विषयों पर ही. इसलिए उनकी पहचान करना आसान होगा.

उनकी बातों में हमेशा गाली-गलौज ही नहीं होगी. बल्कि ख़ास तरह से बात कहने के तरीक़े से भी ऐसे ''साइबरबुली'' की पहचान शुरुआत में ही की जा सकती है ताकि बड़ा ख़तरा बनने से पहले ही उससे निपटा जा सके.

ऐसे लोगों की शुरुआत की आठ-दस पोस्ट से ही ये पता चल जाता है कि आगे चलकर ये सोशल नेटवर्क पर ट्रॉलिंग या दबंगई दिखाने वाले हैं.

हालांकि रिसर्च करने वाले ये साफ़ करते हैं कि उनके डेटा, उन लोगों का विकल्प नहीं हैं जो सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की निगरानी करते हैं और उन पर पाबंदी लगाते हैं. बल्कि ऐसे आंकड़े, इन सोशल मीडिया मॉडरेटर्स को उनका काम करने में मदद करेंगे.

एपल के सीरी सॉफ्टवेयर को डेवलप करने वाली कंपनी एसआरआई ने भी ऐसे आंकड़े जुटाए थे, जिनकी मदद से साइबर दबंगों की पहचान शुरुआत में ही की जा सकती है.

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हाल के दिनों में इंटरनेट ट्रॉल्स से निपटने के लिए लोगों को जागरूक करने की कोशिशें बढ़ी हैं. लोगों को बताया जा रहा है कि कैसे साइबर दुनिया में कुछ लोग धौंस जमाने की कोशिश करते हैं, गाली-गलौज करते हैं. सोशल मीडिया में एक्टिव लोगों को ऐसे ट्रॉल्स के बारे में फ़ौरन ख़बर करने की सलाह दी जाती है.

जैसे ब्रिटेन में सरकार ने ''स्टॉप एब्यूज़ ऑनलाइन'' के नाम से अभियान चलाया है जिससे इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों को ऐसे साइबर दबंगों से बचाया जा सके.

इसी तरह एक ग़ैर-सरकारी संगठन, ''द पेंग कलेक्टिव'' ने इंटरनेट ट्रॉल्स के ख़िलाफ़ ही ट्रॉलिंग का अभियान शुरू किया. ट्रॉल्स की पहचान करके उन्हें संदेश भेजे जाते थे कि वो ट्रॉलिंग से बाज़ आएं. अगर वो ऐसा जान-बूझकर नहीं कर रहे हैं तो इससे निपटने में उन्हें मदद का भी ऑफ़र दिया गया.

ये अभियान शुरू करने वाले एडा स्टोल्ज कहते हैं कि साइबर दबंगों से निपटने के लिए ज़रूरी है कि उनको बताया जाए कि उन्हें अपनी हरकतों की क़ीमत चुकानी होगी.

इसी तरह ब्रिटेन में चाइल्डनेट नाम की ग़ैर-सरकारी संस्था है जो स्कूलों में जाकर बच्चों को ट्रॉलिंग के बारे में बताती है. फिर उन्हें इस तरह के ख़तरों से निपटने के तरीक़े, कभी नाटक तो कभी खेलकूद के ज़रिए सिखाती है.

बच्चों को बताया जाता है कि किसी पर धौंस जमाना, या नुक़सान पहुंचाना ग़लत बात है. ऐसा करके चाइल्डनेट, भविष्य में बच्चों को ''ट्रॉल'' या ''साइबरबुली'' बनने से रोक रही है.

बच्चों में साइबर दबंगई की दिक़्क़त पर नज़र रखने वाली मनोवैज्ञानिक एमा शॉर्ट, चाइल्डनेट की कोशिशों की तारीफ़ करती हैं. वो कहती हैं कि बच्चों के बीच जो ट्रॉलिंग होती है, जो इंटरनेट पर एक-दूसरे को तकलीफ़ देने की कोशिश होती है, उसका पता अक्सर मां-बाप या अध्यापकों को नहीं चल पाता. इसीलिए स्कूलों में ऐसे अभियान की सख़्त ज़रूरत है.

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सवाल ये उठता है कि आख़िर लोग एक-दूसरे पर धौंस जमाते ही क्यों हैं? इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू हैं. पहली बात तो ये कि ऐसा करने वाले लोग अपनी दबंगई ज़ाहिर करने के लिए ऐसा करते हैं. ताकि लोग उनसे डरें, उनके आगे दबे-झुके रहे हैं.

इसके कई मनोवैज्ञानिक पहलू भी हैं. कई लोग बचपन में ऐसी धमकियों-धौंस को झेल चुके होते हैं. या जिन्हें ख़ुद पर भरोसा नहीं होता, अपने आपको कमज़ोर पाते हैं. ऐसे लोग इंटरनेट पर अपने आपको ताक़तवर साबित करने के लिए साइबर दबंगई करते हैं, या फिर, ट्रॉलिंग.

मनोवैज्ञानिक एमा शॉर्ट कहती हैं कि ऐसे लोगों से निपटने के लिए ज़रूरी है कि हम उनके प्रति हमदर्दी रखें. क्योंकि ऐसा करने वाले लोग अक्सर अकेलेपन के शिकार होते हैं. इनसे बात करके, ऐसे लोगों को दूसरों को धमकाने से रोका जा सकता है.

इंटरनेट पर ऐसे बहुत से लोग हैं जो, साइबर दबंगों से बात करके उन्हें लोगों पर धौंस जमाने से, ट्रॉलिंग करने से रोकते हैं. जैसे वेबसाइट ''ए थिन लाइन''.

पिछले साल, मोनिका लेविंस्की ने एक भाषण दिया, जिसकी बड़ी चर्चा हुई. लेविंस्की ने कहा कि हम दूसरों को बदनाम करने में बहुत लुत्फ़ पाते हैं. इससे दूसरे इंसानों की तकलीफ़ का एहसास कम होता जाता है. इससे निपटने का तरीक़ा यही है कि लोगों को समझाया जाए कि उनकी हरकतों से दूसरों को कितनी तकलीफ़ होती है.

इंटरनेट पर ऐसा करने में सबसे बड़ी परेशानी है लोगों की तमाशबीन बने रहने की आदत. अक्सर लोग, दूसरों को ट्रॉल्स से परेशान होते देखते हैं, मगर चुप्पी साध लेते हैं. ज़रूरी है कि लोगों को इन हरकतों का महज़ तमाशबीन बने रहने से रोका जाए. उन्हें लोगों की ऐसी हरकतों की ख़बर करने के लिए कहा जाए.

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हाल में इंटरनेट पर रोल प्लेइंग गेम, ''लीग ऑफ़ लीजेंड्स'' की बड़ी चर्चा हुई. स्पेन की आईटी कंपनी टेलेफोनिका आई प्लस डी में रिसर्चर के तौर पर काम करने वाले जेरेमी ब्लैकबर्न ने इस गेम में शामिल लोगों के बर्ताव को ग़ौर से देखा. जेरेमी कहते हैं कि जब इस खेल में शामिल लोगों को दूसरों के बुरे बर्ताव के बारे में ख़बर करने को कहा गया तो उन्होंने बढ़-चढकर ये काम किया. मतलब मदद मांगने पर इन लोगों ने अपने साथियों की मदद की.

मतलब साफ़ है. लोगों को दूसरों की साइबर दबंगई या ट्रॉलिंग की शिकायत करने के लिए जागरूक किया जाना चाहिए. इससे सोशल नेटवर्क पर गाली-गलौज या दूसरों को तंग करने वालों को पहचानकर उनसे निपटने में आसानी होगी.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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