पाकिस्तान में ईसाइयों पर क्यों हो रहे हैं हमले?

  • 28 मार्च 2016
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लाहौर के एक पार्क में तालिबान का आत्मघाती धमाका पाकिस्तान में ईसाइयों पर हो रहे हमलों के सिलसिले की एक और कड़ी है.

इन हमलों में से कुछ को पाकिस्तान के विवादित ईशनिंदा क़ानून से जोड़कर देखा जाता रहा है जबकि कई हमलों के मक़सद राजनीतिक लगते हैं.

मुस्लिम बहुसंख्यक देश पाकिस्तान में हिंदुओं के बाद ईसाई दूसरा सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह हैं. पाकिस्तान में लगभग 18 करोड़ की आबादी में 1.6 प्रतिशत ईसाई हैं.

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हाल के सालों में ईसाइयों को निशाना बनाकर कई बड़े हमले किए गए हैं.

  • मार्च 2015 में लाहौर के चर्चों में दो बम धमाके हुए थे जिनमें 14 लोग मारे गए थे और 70 घायल हुए थे.
  • 2013 में पेशावर के चर्च में हुए दो आत्मघाती धमाकों में 80 लोग मारे गए थे.
  • 2009 में पंजाब के गोजरा क़स्बे में भीड़ ने 40 घरों को आग लगा दी थी. इस वारदात में आठ ईसाइयों की जलकर मौत हो गई थी.
  • 2005 में क़ुरान जलाने की अफ़वाह के बाद पाकिस्तान के फ़ैसलाबाद से ईसाइयों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा था. हिंसक भीड़ ने चर्चों और ईसाई स्कूलों को आग लगा दी थी.
  • 1990 के बाद से कई ईसाइयों को क़ुरान का अपमान करने और पैगंबर की निंदा करने के आरोपों में दोषी ठहराया जा चुका है.
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जानकारों का कहना है कि ईसाइयों के ख़िलाफ़ ज़्यादातर आरोप व्यक्तिगत नफ़रत और विवादों से प्रेरित थे.

2012 में पाकिस्तान की एक ईसाई स्कूली छात्रा रिम्शा मसीह पहली ग़ैर मुसलमान बनीं थी जिसे ईशनिंदा के आरोपों से बरी किया गया था.

बाद में पता चला था कि एक स्थानीय मौलवी ने उसे ग़लत तरीक़े से ईशनिंदा के आरोपों में फंसाया था.

लेकिन सबसे चर्चित उदाहरण आयशा बीबी का है जिन्हें 2010 में कुछ मुस्लिम महिलाओं से बहस करने के बाद ईशनिंदा के आरोपों में फंसा दिया गया था.

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पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर की उनके बॉडीगार्ड मुमताज़ क़ादरी ने हत्या कर दी थी. तासीर ने कहा था कि आयशा बीबी के मामले में ईशनिंदा क़ानून का दुरुपयोग किया गया है.

क़ादरी को पिछले महीने ही फांसी दी गई है.

पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और ईसाई नेता शाहबाज़ भट्टी की तालिबान ने ईशनिंदा क़ानून का विरोध करने पर 2011 में हत्या कर दी थी.

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हमलों की वजह

कुछ हमले अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी नेतृत्व में चले युद्ध के नतीजे में भी हुए हैं और इनके मक़सद राजनीतिक रहे हैं.

2011 में अमरीकी नेतृत्व के गठबंधन के अफ़ग़ानिस्तान पर हमलों के बाद तक्षिला में ईसाई मिशन अस्पताल पर हुए ग्रेनेड हमले में चार लोग मारे गए थे.

कुछ ही महीनों बाद एक ईसाई संस्था के छह सदस्यों की कराची के उनके दफ़्तर में हत्या कर दी गई थी.

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पाकिस्तान की ईसाई और हिंदू अल्पसंख्यक आबादी पर हमले चरमपंथी समूहों की पश्चिमी देशों को संदेश देने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं.

या फिर ये पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को ऐसे वक़्त में अपमानित करने की कोशिश भी हो सकती है जब वो पश्चिमी देशों के क़रीब जाते प्रतीत हो रहे हैं.

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