अब धर्म से जुड़े जुर्म का हिसाब रखेगी पुलिस

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ब्रिटेन की पुलिस अगले महीने से मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत वाले अपराध अलग श्रेणी में दर्ज करेगी.

इससे मुसलमानों को उनकी धार्मिक आस्था के कारण निशाना बनाने के मामलों की तस्वीर ज़्यादा साफ़ हो पाएगी.

यही नहीं, दूसरे धर्म के लोगों के प्रति अपराध के आंकड़े भी अलग से दर्ज किए जाएंगे.

सरकार के इस फ़ैसले का मुस्लिम संगठनों और समूहों ने स्वागत किया है. ये वो लोग हैं, जो मानते हैं कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध के ज़्यादातर मामले दर्ज नहीं होते.

इस्लामोफ़ोबिया यानी इस्लाम से डर के चलते होने वाले अपराधों को भी अलग से दर्ज किया जाएगा.

एक महिला का उदाहरण लें, जिन्हें कुछ महीने पहले एक कैफ़े में अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ा. वे अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ ब्लैक बर्न इलाक़े के कैफ़े में लंच के लिए गईं, जो उनके लिए बुरा अनुभव रहा.

वह बताती हैं कि बगल की टेबल पर बैठी महिला ने उन्हें भद्दी गालियां देनी शुरू कर दीं क्योंकि उन्होंने सिर पर नकाब डाला हुआ था.

अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर उन्होंने बीबीसी से बताया, ''वह चीख-चीखकर मुझे और मेरे दोस्तों को गंदी-गंदी बातें कह रही थीं और गालियां दे रही थीं.''

इससे यह महिला इतनी डरी हुई हैं कि अकेले बाहर नहीं निकलना चाहतीं. उनकी मां ने इसकी शिकायत पुलिस से की, पर उन्हें ताज्जुब हुआ जब पुलिस वालों ने उनसे कहा कि उनकी बेटी को मुस्लिम होने के चलते निशाना नहीं बनाया गया.

उन्होंने बताया, ''वास्तविकता यही है कि पुलिस इसे इस्लामोफ़ोबिक हमले के तौर पर दर्ज नहीं कर रही थी. उन्हें मालूम भी नहीं था कि ऐसा कुछ होता है. मैंने उन्हें ऐसा बताया पर पुलिस वालों ने मुझे कहा कि उन्होंने तो ऐसा शब्द सुना ही नहीं है.''

यह इसलिए भी अचरज भरा है क्योंकि लंकाशायर पुलिस मुस्लिमों के प्रति होने वाले अपराध के मामले बीते कई सालों से अलग से दर्ज करती रही है.

उन्होंने बीबीसी को अपने बयान में कहा, ''इस घटना को तुरंत इस्लामोफ़ोबिया वाली श्रेणी में डाला गया. हम ऐसे अपराधों की पहचान रखते हैं और यह हमारी रिकॉर्डिंग में दर्ज है.''

बहरहाल, एक अप्रैल 2016 से इंग्लैंड और वेल्स के सभी 43 पुलिस स्टेशनों में मुसलमानों के प्रति नफ़रत वाले अपराध अलग से दर्ज होंगे. इससे किन इलाकों में ऐसे अपराध ज़्यादा होते हैं, उनका भी पता चल पाएगा.

इंग्लैंड और वेल्स में 2013 और 2014 में, धार्मिक विश्वासों के चलते क़रीब 2000 अपराध दर्ज हुए थे. 2015 में इनमें क़रीब 45 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई. माना जाता है कि इसमें से क़रीब आधे मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हुए थे.

नेशनल पुलिस चीफ़ काउंसिल की हेट क्राइम प्रवक्ता पॉल गियानासी के मुताबिक़ बेहतर आंकड़ों से वास्तविकता का पता चलेगा.

मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों पर नज़र रखने वाली संस्था टेल मामा ने इसके लिए काफ़ी कोशिशें कीं. संस्था के फैयाज़ मुगल के मुताबिक़ हर घटना का दर्ज होना ज़रूरी है.

मुगल ने बीबीसी को बताया, ''हम जानते हैं कि कट्टर दक्षिणपंथी समूह हैं. छोटे-छोटे समूह हैं जिनमें कुछ बेहद आक्रामक हैं. इनके निशाने पर इस्लाम और इस्लामी समूह हैं. अगर मुस्लिम रिपोर्ट नहीं करेंगे, तो इनकी समझ के बारे में कभी आवाज़ नहीं उठेगी.''

इस बदलाव के बाद अब सिखों और हिंदुओं के ख़िलाफ़ होने वाले भेदभाव और हमले भी अलग से दर्ज किए जाएंगे.

सिखों के मुताबिक़ 9/11 के चरमपंथी हमले के बाद उनकी पगड़ी के चलते उन्हें भी मुस्लिम मानकर निशाना बनाया जाता रहा है.

उत्तरी इंग्लैंड के मैनचेस्टर स्थित गुरुद्वारे को बनवाने वाले प्रीतपाल सिंह माकन ने बीबीसी को बताया कि उनका समुदाय भी इस बदलाव की लंबे समय से मांग करता रहा है.

प्रीतपाल सिंह ने कहा, ''हमने सिखों के ख़िलाफ़ अपराधों की शिकायत दर्ज कराई है, जो मुस्लिमों या फिर दूसरे धर्म के लोगों के साथ अपराध जैसा ही है. मेरे ख़्याल से अलग-अलग धार्मिक विश्वास वालों को इस मामले में समता और समानता मिलनी चाहिए.''

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