आपकी जीत में बॉस को दिखती है अपनी जीत?

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क्या आपके कोई गुरु, कोई उस्ताद हैं? आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिनसे आप वक़्त आने पर सलाह सकते हैं और ऑफ़िस की सियासत से निपटने में वह आपकी मदद कर सकें.

इन दिनों तमाम कंपनियां, अपने जूनियर कर्मचारियों की मदद के लिए मेंटर या उस्तादों की नियुक्ति करती हैं. इनका काम, छोटे मुलाज़िमों की मदद करना, उनसे बेहतर काम कराना होता है.

वैसे तो हर कंपनी चाहती है कि उसके यहां सबसे अच्छे लोग काम करें, लेकिन अक्सर कंपनियां ऐसा करने में नाकाम रहती हैं. इसके अलावा, नए कर्मचारी आगे बढ़ सकें, इस काम में भी कंपनियां उनकी मदद करने में अक्सर नाकाम रहती हैं.

इसकी वजह ये है कि जूनियर या नए कर्मचारी, अपने सीनियर्स से ज़्यादा मदद की उम्मीद रखते हैं. वह चाहते हैं कि उनका करियर, तेज़ी से तरक़्क़ी की रफ़्तार पकड़ ले. उनकी इच्छा इससे बढ़कर होती है कि बॉस केवल वक़्त-वक़्त पर उनके हाल-चाल पूछ लें.

आज के दौर में कई ऐसे मेंटर हैं जो सुपरबॉस बनकर अपने नीचे काम करने वालों की मदद कर रहे हैं. वो औसत मेंटर से ज़्यादा तेज़-तर्रार हैं. वो छोटे पद पर काम कर रहे लोगों की आगे बढ़कर न सिर्फ़ मदद करते हैं बल्कि उनकी कामयाबी को ही अपना मिशन बना लेते हैं.

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आख़िर वो क्यों कहलाते हैं सुपरबॉस?

अक्सर कॉरपोरेट दुनिया में मेंटर ख़ुद को अपने चेलों से ज़्यादा जोड़कर नहीं रखते. वो कभी-कभार बात करके हौसला बढ़ा देते हैं, कुछ सलाह दे देते हैं और कई बार, जूनियर कर्मचारियों को नेटवर्किंग में मदद कर देते हैं. मगर, इससे ज़्यादा कुछ नहीं करते.

इनके मुक़ाबले, सुपरबॉस, बढ़-चढ़कर अपने जूनियर्स की मदद करते हैं. उनके प्रोजेक्ट में हाथ बंटाते हैं. मुश्क़िल वक़्त में पहुंचकर सहयोग करते हैं और कई बार बिन मांगी सलाह भी देते हैं. काम फंसने पर वो जूनियर्स से अपनी निगरानी में काम भी कराते हैं.

इससे उनके चेलों का हौसला बढ़ता है, वो बेहतर करते हैं तो कंपनी का भी फ़ायदा होता है.

कामयाबी की असल राह, दूसरों को कामयाब बनाकर ही मिलती है. सुपरबॉस इस मंत्र को बख़ूबी समझते हैं.

ऐसे सुपरबॉस भी तीन तरह के होते हैं.

परवरिश करने वाले बॉस

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ये वो लोग होते हैं जो गुरू-चेले की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले होते हैं. वो अपने मातहत काम करने वालों से बेहद क़रीबी ताल्लुक़ रखते हैं. ऐसे गुरु-चेलों के रिश्तों का दायरा तय नहीं होता है. वक़्त-ज़रूरत के हिसाब से बदलता रहता है. मगर वो अपने चेलों को लगातार निगरानी में रखते हैं. लगातार सलाह देते रहते हैं.

ऐसे लोगों की तमाम मिसालें मिलती हैं. मसलन, अमरीका के 'सैन फ्रैंसिस्को फोर्टीनाइनर्स' फुटबॉल टीम के बिल वॉल्श. कॉस्मेटिक मुगल मैरी केय ऐश और अपने दम पर खड़े अमरीकी रेस्टोरेंट कारोबारी नॉर्मन ब्रिंकर.

बुतशिकन सुपरबॉस

सुपरबॉस की ये दूसरी कैटेगरी होती है. इनका मक़सद, किसी की प्रतिभा को निखारना नहीं होता. वो अपने काम के प्रति जुनून रखते हैं. अमरीकी संगीतकार माइल्स डेविस इसकी सबसे बड़ी मिसाल माने जाते हैं. डेविस को संगीत के प्रति इस क़दर जुनून था, अपनी धुनों पर इतना ऐतबार था कि उनके चेले, उनके जुनून से सीखते हैं.

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ऐसे जुनूनी सुपरबॉस क़ाबिलियत के मामले में बेहद ऊंची पायदान पर होते हैं. फ़िल्मकार जॉर्ज लुकास, फ़ैशन गुरू रैल्फ़ लॉरेन और लॉर्न माइकल्स को ऐसे बॉस की कैटेगरी में रखा जाता है.

जो लोग तरक़्क़ी करना चाहते हैं वो ऐसे बॉस से बहुत प्रभावित होते हैं. उनके जुनून से सीखने की कोशिश करते हैं और उनकी एनर्जी की मदद से आगे बढ़ते हैं.

घमंडी सुपरबॉस

ऐसे सुपरबॉस को सिर्फ़ अपनी जीत से मतलब होता है, किसी और की प्रतिभा को निखारने से उन्हें कोई मतलब नहीं होता. वो हर हाल में जीतना चाहते हैं. वो अपनी बातें कहने और मनवाने में बेहद कठोर होते हैं, लेकिन वो हमेशा जीतते हैं. इसी बार-बार की जीत से उनके नीचे क़ाबिलियत की पौध पनपती है.

इसकी वजह भी साफ़ है. हमेशा जीत के लिए क़ाबिल लोगों की ज़रूरत होती है और वो ऐसे ही लोगों को अपने साथ लेकर चलते हैं. उन्हें पता होता है कि जीत अकेले नहीं मिल सकती, इसके लिए अच्छे लोगों की टीम भी चाहिए.

ऐसे सुपरबॉस से लोग डरते भी हैं और उनका सम्मान भी करते हैं. ओरेकल कंपनी के सीईओ रहे लैरी एलिसन, विज्ञापन गुरू जे शियाट और फ़ाइनेंस मैनेजर माइकल मिल्केन इसकी मिसाल माने जाते हैं.

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कुल मिलाकर, ये तीनों सुपरबॉस, गुरू-चेलों की पुरानी परंपरा का पालन नहीं करते. वो समझते हैं कि पुराने तरीक़े से आज के ज़माने में नए लोगों की क़ाबिलियत को नहीं निखारा जा सकता.

इसीलिए बेहतर होगा कि कंपनियां भी मेंटर को नियुक्त करते समय इन बातों का ख़याल रखें. इसी तरह अपने अधीन काम कर रहे लोगों और उन्हें आगे बढ़ाने की सोच रखने वालों को भी इन बातों का ख़याल रखना होगा कि आज उनसे उम्मीदें ज़्यादा हैं.

हां, चेलों को भी अपने सुपरबॉस की कुछ आदतों को नज़रअंदाज़ करना होगा, तभी वो तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ सकेंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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